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नवजात बच्चों की मांओं ने डायलिसिस बंद कर दी, सरकार से इच्छा मृत्यु की मांग

गठजोड़ के विभाजन के बावजूद किडनी ट्रांसप्लांट नहीं होने पर पांच प्रसूताओं ने दवाओं और डायलिसिस का सहारा छोड़ दिया है।

AajTak के अनुसार15 जुलाई 2026 को 01:57 pm बजे
नवजात बच्चों की मांओं ने डायलिसिस बंद कर दी, सरकार से इच्छा मृत्यु की मांग

सौजन्य से:- AajTak

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कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पिछले करीब 70 दिनों से किडनी फेलियर से जूझ रही पांच प्रसूताओं का धैर्य अब जवाब देता नजर आ रहा है. लगातार डायलिसिस, शारीरिक पीड़ा और भविष्य को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच महिलाओं ने बड़ा फैसला लिया है. जिला प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेटम देने के बावजूद कोई ठोस निर्णय या आश्वासन नहीं मिलने पर पांचों महिलाओं ने डायलिसिस करवाने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी किडनी ट्रांसप्लांट नहीं करवा सकती तो उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी जाए.

सोमवार को पांचों प्रसूताओं और उनके परिजनों ने जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर ज्ञापन सौंपा था. ज्ञापन में प्रशासन को 48 घंटे का समय देते हुए मांग की गई थी कि किडनी ट्रांसप्लांट सहित उनकी अन्य मांगों पर तत्काल फैसला लिया जाए. परिवारों ने साफ कहा था कि यदि तय समय में कोई कार्रवाई नहीं हुई तो महिलाएं डायलिसिस बंद कर देंगी. अब अल्टीमेटम की अवधि पूरी होने के बाद पांचों महिलाओं ने डायलिसिस नहीं करवाने का फैसला लिया है. उनका कहना है कि हर दो-तीन दिन में डायलिसिस की पीड़ा सहना अब उनके लिए संभव नहीं है.

48 घंटे का अल्टीमेटम खत्म, डायलिसिस से किया इनकार

ज्ञापन में पीड़ित परिवारों ने सरकार से भावुक अपील करते हुए कहा कि उनकी बेटियां और बहुएं पिछले 70 दिनों से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही हैं. यदि उनका स्थायी इलाज संभव नहीं है तो उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति दे दी जाए. परिजनों का कहना है कि अब लगातार दर्द, मानसिक तनाव और भविष्य की अनिश्चितता के साथ जीना बेहद कठिन हो गया है.

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पीड़ित परिवारों का आरोप है कि 4 से 8 मई 2026 के बीच प्रसव के लिए न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती होने के दौरान अस्पताल की कथित लापरवाही और कथित नकली दवाओं के इस्तेमाल से महिलाओं की दोनों किडनियां खराब हो गईं. परिवारों का कहना है कि इसी वजह से पिछले करीब 70 दिनों से उन्हें हर दो-तीन दिन में डायलिसिस करानी पड़ रही है.

महिलाओं की अपील, ट्रांसप्लांट कराइए या इच्छा मृत्यु दीजिए

रागिनी मीणा, आरती चौबदार, पिंकी ऐरवाल, सुशीला महावर और धन्नी सुमन पिछले दो महीने से अधिक समय से अस्पताल में भर्ती हैं. परिवारों का कहना है कि घर लौटने की उम्मीद हर दिन कमजोर होती जा रही है. अस्पताल का बिस्तर ही अब उनका घर बन गया है. इलाज तो चल रहा है, लेकिन भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा. धन्नी सुमन ने बताया कि वह 4 मई को अस्पताल में भर्ती हुई थीं. 70 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब डॉक्टर उन्हें घर जाकर डायलिसिस करवाने की सलाह दे रहे हैं.

उन्होंने कहा कि प्रशासन को ज्ञापन देने के बावजूद कोई अधिकारी मिलने तक नहीं आया. ऐसे में उन्होंने डायलिसिस बंद करने का फैसला लिया है. धन्नी ने कहा, अगर किडनी ट्रांसप्लांट नहीं होगा तो चाहे हमारी जान चली जाए, लेकिन अब डायलिसिस नहीं करवाएंगे. पिंकी ऐरवाल ने बताया कि उन्हें हर सप्ताह तीन बार डायलिसिस करानी पड़ती है. इसके बाद तेज बुखार, उल्टी, चक्कर और कमजोरी हो जाती है. दो महीने से अधिक समय से अस्पताल में भर्ती हैं और अब यूरिन भी नहीं आ रहा. इसके अलावा उन्होंने कहा कि मुझे अब डायलिसिस नहीं करवानी. हर बार इतनी तकलीफ होती है कि सहन नहीं होता.

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अस्पताल की लापरवाही और कथित नकली दवाओं का लगाया आरोप

सुशीला महावर ने कहा, अब यह दर्द नहीं सहा जाता. बताया जा रहा है कि वह 3 मई से अस्पताल में भर्ती हैं. लगातार डायलिसिस का दर्द अब असहनीय हो चुका है. उन्होंने कहा कि सरकार हमारी किडनी ट्रांसप्लांट कराए. तड़प-तड़प कर जीने से अच्छा है मौत आ जाए, लेकिन अब डायलिसिस नहीं करवाऊंगी. महिलाओं का कहना है कि वो दवाइयों और डायलिसिस के सहारे जिंदगी काट रही हैं. उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि वे स्वस्थ होकर अपने बच्चों और परिवार के पास लौट सकें.

एक महिला ने कहा कि उसका बच्चा जन्म के बाद से अस्पताल में है और वह अब तक उसे ठीक से देख भी नहीं पाई. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उनके साथ कुछ हो गया तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा. महिलाओं ने कहा कि यदि सरकार उनकी किडनी ट्रांसप्लांट नहीं करवा सकती तो उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए. उन्होंने बताया कि अब राष्ट्रपति के नाम भी पत्र भेजा जाएगा. न्यू मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नीलेश जैन ने कहा कि पांचों महिलाओं की स्थिति फिलहाल स्थिर है और आवश्यकता के अनुसार उनकी डायलिसिस की जा रही है.

साथ ही उन्होंने कहा कि अभी यह बताना संभव नहीं है कि डायलिसिस कितने समय तक चलेगा. जब तक किडनी पूरी तरह रिकवर नहीं होती, तब तक डायलिसिस जरूरी है. डॉ. जैन के अनुसार, इन महिलाओं को अस्पताल में भर्ती रहने की चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं है. अधिकांश मरीज घर से आकर डायलिसिस करवाते हैं. यदि ये महिलाएं भी चाहें तो घर से आकर डायलिसिस करवा सकती हैं. हालांकि यदि वे अस्पताल में भर्ती रहना चाहती हैं तो अस्पताल को इससे कोई आपत्ति नहीं है.

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अस्पताल का बिस्तर ही बन गया घर

उन्होंने कहा कि मीडिया के माध्यम से उन्हें जानकारी मिली है कि महिलाएं डायलिसिस बंद करना चाहती हैं. यदि ऐसा होता है तो उनकी जान बचाने के लिए प्रशासन को इसकी सूचना दी जाएगी. डॉ. नीलेश जैन ने बताया कि चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार किडनी ट्रांसप्लांट पर फैसला लेने से पहले तीन से छह महीने तक इंतजार करना पड़ता है. अभी यह कहना संभव नहीं है कि ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होगी या नहीं.

उन्होंने बताया कि पांचों महिलाओं को पिछले लगभग 20 दिनों से डिस्चार्ज किया जा सकता है और वे घर से आकर डायलिसिस करवा सकती हैं. इलाज मुख्यमंत्री आयुष्मान योजना के तहत पूरी तरह नि.शुल्क चल रहा है और आगे भी मरीजों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा.

क्या है पूरा मामला

कोटा के जेके लोन शिशु अस्पताल और न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्रसव के बाद कुल 12 महिलाएं गंभीर रूप से बीमार हुई थीं. इनमें से पांच महिलाओं की मौत हो चुकी है. दो महिलाओं को इलाज के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया, जबकि पांच महिलाएं अब भी इलाजरत हैं और किडनी ट्रांसप्लांट की मांग को लेकर संघर्ष कर रही हैं. इसी बीच पीड़ित परिवारों का आरोप है कि अस्पताल की कथित लापरवाही और कथित नकली दवाओं के कारण महिलाओं की किडनियां खराब हुईं. वहीं अस्पताल प्रशासन इन आरोपों से इनकार करते हुए कह रहा है कि सभी मरीजों का इलाज चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार जारी है.

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