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प्रसिद्ध मस्जिदों के बेदखली नोटिस पर हाई कोर्ट का फैसला, क्यों नहीं रोकीं अदालत ने सरकार की कार्रवाई?

राजस्थान हाई कोर्ट ने मस्जिद मदरसों के बेदखली नोटिस के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। अदालत ने सरकार के पास उपलब्ध खुफिया सूचनाओं और सीमा सुरक्षा संबंधी घटनाओं के आधार पर नीति बनाने की क्षमता को मान्यता दी।

Navbharat Times के अनुसार15 जुलाई 2026 को 07:29 am बजे
प्रसिद्ध मस्जिदों के बेदखली नोटिस पर हाई कोर्ट का फैसला, क्यों नहीं रोकीं अदालत ने सरकार की कार्रवाई?

सौजन्य से:- Navbharat Times

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राजस्थान बार्डर का संवेदनशील इलाका

बार्डर से जुड़े इलाकों में कई अवैध और मदरसों से जुड़ी शिकायतों के मद्देनजर जब अधिकारियों ने कई धार्मिक ढांचों और वहां रहने वाले लोगों को नोटिस जारी किए, तब से मामले का शुरुआत हुई। संवेदनशील सीमावर्ती इलाके से जुड़े इन मदरसों और मस्जिदों को भेजे गए इन नोटिसों में सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे, अवैध निर्माण और जरूरी मंजूरी न होने का आरोप लगाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि ये नोटिस इंटरनेशनल बॉर्डर के पास सुरक्षा इंतजाम कड़े करने के बाद ढांचों को हटाने की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा थे। उन्हें डर था कि इसके बाद ढांचों को गिरा दिया जाएगा। मुख्य याचिका जैसलमेर में पीर मोहम्मद शाह जिलानी दरगाह की ओर से दायर की गई थी, जबकि इससे जुड़ी अन्य याचिकाओं में जैसलमेर और बाड़मेर जिलों के कई मदरसे, मस्जिदें, दरगाहें और व्यक्ति शामिल थे।नागरिकता का फैसला 'निष्पक्ष प्रक्रिया' से ही होगा, सुप्रीम कोर्ट ने खींच दी लकीर, गौहाटी हाईकोर्ट का आदेश रद्द

हाई कोर्ट में सुनवाई और टिप्पणियों पर गौर करने की जरूरत

- राजस्थान हाई कोर्ट मे जस्टिस समीर जैन ने मदरसों, मस्जिदों और दरगाहों की उन याचिकाओं पर सुनवाई की, जो भारत-पाकिस्तान सीमा से लगभग 50 किलोमीटर के दायरे में मस्जिद मदरसों को बेदखली के नोटिस से जुड़ी थी।

- तथ्यों पर ध्यान देने के बाद, अदालत का मानना था कि सरकार के पास उपलब्ध खुफिया सूचनाएं, सीमा पार तस्करी और सुरक्षा संबंधी घटनाओं के आधार पर नीति बनाई गई है। ऐसे मामलों में अदालत नीति के गुण-दोष की समीक्षा नहीं करेगी, जब तक स्पष्ट रूप से कानून का उल्लंघन सिद्ध न हो।

- फिर अदालत ने गृह मंत्रालय की साल 2021 की अधिसूचना का हवाला दिया, जो 'सीमा सुरक्षा बल अधिनियम' की धारा 139 के तहत जारी की गई थी। जिसमें केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा सुरक्षा बल के अधिकार क्षेत्र और परिचालन शक्तियों का विस्तार किया था।

- अदालत ने याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इनमें से कई संस्थान दशकों से मौजूद थे। अधिकारियों ने मनमाने ढंग से और पहले से तय इरादे के साथ, उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना इन ढांचों को गिराने की कार्रवाई की।

- लेकिन बेंच ने साफ कर दिया और कहा कि रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री से पता चलता है कि संवेदनशील सीमावर्ती इलाके में जहां भी अनधिकृत ढांचे पाए गए हैं, वहां बिना किसी खास समुदाय का भेदभाव किए सभी को नोटिस जारी किए गए। इसलिए यह सावधानीपूर्वक और स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और नियमों के पालन का है, न कि धार्मिक भेदभाव का।

फैसले का कानूनी और संवैधानिक महत्व

दरअसल, हाई कोर्ट के इस फैसले से राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम मौलिक अधिकारों से जुड़े मामलों में न्यायपालिका के दृष्टिकोण साफ होता है। अदालत ने संकेत दिया कि सीमा सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को व्यापक नीति-निर्माण का अधिकार प्राप्त है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि नागरिकों के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। यदि प्रशासनिक कार्रवाई मनमानी या कानून के विपरीत पाई जाती है तो न्यायिक हस्तक्षेप संभव रहेगा।50 किलोमीटर सीमा क्षेत्र में कार्रवाई का आधार क्या है?

- राज्य सरकार और प्रशासन ने अदालत को बताया कि भारत-पाकिस्तान सीमा से 50 किलोमीटर के दायरे को अत्यंत संवेदनशील माना गया है।

- इस क्षेत्र में अवैध निर्माण, अतिक्रमण और अनधिकृत गतिविधियों पर निगरानी बढ़ाई गई है। प्रशासन का तर्क था कि कुछ निर्माण सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं।

- सरकार ने कहा कि कार्रवाई किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं बल्कि सुरक्षा और नियामकीय अनुपालन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जा रही है।

- अदालत ने माना कि सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी निर्णय विशेषज्ञ एजेंसियों के मूल्यांकन पर आधारित होते हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय प्रशासनिक विवेक का सम्मान करेगा।

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