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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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झीलों-तालाबों को बचाने के लिए हाईकोर्ट ने लिया प्रसंज्ञान:आदेश में शायर की नज़्म से उदयपुर की असली पहचान बताई; कलेक्टर से मांगी रिपोर्ट
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राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने उदयपुर की झीलों, तालाबों और अन्य जल निकायों के संरक्षण को लेकर स्वतः संज्ञान लिया। कोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उदयपुर जिला कलेक्टर से रिपोर्ट तैयार करने को कहा है।
हाईकोर्ट में अवकाशकालीन खंडपीठ में जस्टिस डॉ पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस रेखा बोराणा ने अपने आदेश में कहा- उदयपुर की झीलें केवल पर्यटन का केंद्र नहीं हैं, बल्कि भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
झीलों को लेकर ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा- शहर की पहचान और झीलें एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़ी हैं। कोर्ट ने शायर जयकृष्ण चौधरी 'हबीब' की नज्म "उदयपुर" का हवाला देते हुए झीलों के संरक्षण को पर्यावरणीय और संवैधानिक जरूरत बताया।
इस नज्म का किया जिक्र
हाईकोर्ट ने मशहूर कवि और विद्वान जयकृष्ण चौधरी 'हबीब' की नज्म "उदयपुर" का जिक्र किया। हबीब ने उदयपुर की दिव्य सुंदरता की तारीफ करते हुए लिखा था: "खुशनुमा झीलों में लर्ज़ां जिन का है अक्स-ए-जमील यानी जिसकी खूबसूरत छवि सुहावनी झीलों में थरथराती है।
खंडपीठ ने कहा- उदयपुर को "रश्क-ए-फ़िरदौस-ए-ज़माना" बताया गया यानी "ऐसा स्थान जिसकी सुंदरता पर जन्नत भी रश्क करे। हाईकोर्ट ने कहा- ये शेर सिर्फ सौंदर्य की तारीफ नहीं है। ये उदयपुर की असली पहचान है। उदयपुर की झीलें, नहरें, पाल और इर्द-गिर्द का इकोलॉजिकल लैंडस्केप शहर से अलग नहीं किए जा सकते।
हाईकोर्ट ने माना- ये जलाशय सिर्फ पानी के कुंड नहीं हैं। ये सदियों से क्षेत्र के इतिहास, अर्थव्यवस्था और लोगों की सामूहिक चेतना को आकार देते आए हैं। इन झीलों की वजह से भूजल रिचार्ज और वॉटर सिक्योरिटी जैव विविधता संरक्षण बाढ़ नियंत्रण और क्लाइमेट रेजिलिएंस इकोलॉजिकल बैलेंस बनाए रखने का काम हो रहा है।
प्रस्तावित नाइट फूड हब भी शामिल
हाईकोर्ट ने माना- उदयपुर की पहचान उसकी झीलों से जुड़ी हुई है और इन जल स्रोतों पर बढ़ता अतिक्रमण, प्रदूषण और अनियंत्रित विकास पर्यावरण, जल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसलिए इनका संरक्षण वर्तमान और भावी पीढ़ियों के स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार से जुड़ा विषय है। इनमें रूपसागर तालाब की सीमाओं को लेकर लंबे समय से चल रही अनिश्चितता, मदार नहर की मरम्मत में सामने आई खामियां तथा फतहसागर झील के किनारे प्रस्तावित नाइट फूड हब से जुड़े पर्यावरणीय सवाल प्रमुख थे।
कोर्ट ने माना कि ये घटनाएं केवल अलग-अलग मामले नहीं हैं, बल्कि उदयपुर की संपूर्ण झील प्रणाली और जल संसाधनों के संरक्षण से जुड़े व्यापक मुद्दों की ओर संकेत करती हैं।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार, पर्यावरण विभाग, जल संसाधन विभाग, नगरीय विकास विभाग, स्थानीय स्वशासन विभाग, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल, जिला प्रशासन और उदयपुर विकास प्राधिकरण सहित विभिन्न एजेंसियों को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट में झीलों की वर्तमान स्थिति, जल गुणवत्ता, अतिक्रमण, प्रदूषण, संरक्षण उपाय, सीमांकन, कैचमेंट क्षेत्र और विकास परियोजनाओं का पूरा ब्यौरा देने को कहा गया है।
भौतिक स्वरूप में बदलाव की अनुमति नहीं दी जाए
कोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए निर्देश दिए कि किसी भी झील, तालाब, नहर, फीडर चैनल या कैचमेंट क्षेत्र में नए अतिक्रमण, भराव, निर्माण या भौतिक स्वरूप में बदलाव की अनुमति नहीं दी जाए। साथ ही प्रमुख झीलों का निरीक्षण कर उनकी पारिस्थितिक स्थिति, जल गुणवत्ता और अतिक्रमण की जानकारी अदालत में प्रस्तुत करने को कहा गया है।
इन जलाशयों की वर्तमान स्थिति जांचें और रिपोर्ट बनाएं
हाईकोर्ट ने उदयपुर स्थित पिछोला झील, फतहसागर झील, स्वरूपसागर झील, रंगसागर झील, रूपसागर तालाब, दूध तलाई, गोवर्धन सागर झील, बड़ी झील, उदयसागर झील, मदार नहर, बड़ा मादर तालाब, छोटा मदार तालाब, कुम्हारिया तालाब और अन्य आपस में जुड़ी हुई झीलों व जलाशयों का निरीक्षण करने और उनकी वर्तमान पारिस्थितिक स्थिति, जल की गुणवत्ता, जलग्रहण क्षेत्र की स्थिति, अतिक्रमण की स्थिति तथा संरक्षण की आवश्यकताओं के संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।
मांगी रिपोर्ट, अगली सुनवाई 13 जुलाई को
राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल को झीलों के जल की गुणवत्ता की जांच कर प्रदूषण के स्तर और आवश्यक सुधारात्मक उपायों पर रिपोर्ट देने के निर्देश भी दिए गए हैं। वहीं जिला कलेक्टर उदयपुर को सभी विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर समेकित रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को होगी।
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