जोधपुर में शेखावत-गहलोत फैक्टर से कांटे की टक्कर: उदयपुर में कांग्रेस को बागियों से खतरा; पाली में राठौड़ के गढ़ में निर्दलीयों से बदले समीकरण - Rajasthan News
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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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ग्राउंड रिपोर्टजोधपुर में शेखावत-गहलोत फैक्टर से कांटे की टक्कर:उदयपुर में कांग्रेस को बागियों से खतरा; पाली में राठौड़ के गढ़ में निर्दलीयों से बदले समीकरण
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जोधपुर नगर निगम में 100, उदयपुर में 80 और पाली में 65 वार्ड हैं। अभी तक के समीकरणों में जोधपुर और पाली में कांग्रेस-बीजेपी में टक्कर है। उदयपुर में बीजेपी मजबूत दिख रही है, लेकिन मुकाबला एकतरफा नहीं होगा।
जोधपुर में भाजपा से केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और कांग्रेस से 3 बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत की प्रतिष्ठा दांव पर है।
उदयपुर में दिग्गज नेता और पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के 2 दामादों के भाई चुनावी मैदान में हैं। यहां लगातार 6 बार से बीजेपी का बोर्ड है। करीब 12 बागियों ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
पाली में बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष मदन सिंह राठौड़ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। पार्टी के कई दिग्गज नेता या तो बागी हैं या विरोधी पार्टी से चुनावी मैदान में हैं। हालांकि, 6 वार्डों में कांग्रेस का कोई प्रत्याशी नहीं होने से बीजेपी की चुनौतियां कुछ कम हैं।
जोधपुर
मुकाबला शेखावत बनाम गहलोत
मुकाबला केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत बनाम पूर्व सीएम अशोक गहलोत नजर आ रहा है। दोनों पार्टियों में कांटे की टक्कर है।
भाजपा के दो विधायक अतुल भंसाली और देवेंद्र जोशी भी बोर्ड बनाने के लिए अपनी ताकत लगा रहे हैं। टिकट की पैरवी में इस बार विधायकों के साथ केंद्रीय मंत्री की भी चली। जयपुर में टिकट बंटवारे से पहले संभाग की बैठक में गजेंद्र सिंह शेखावत भी शामिल हुए थे।
इधर, कांग्रेस में फ्रंट फुट पर गहलोत के करीबी नेता राजेंद्र सोलंकी (जेडीए के पूर्व चेयरमैन) और पूर्व विधायक मनीषा पंवार पूरी ताकत के साथ लगे हैं। लेकिन पर्दे के पीछे पूरा चुनावी मैनेजमेंट गहलोत ही संभाल रहे हैं।
इस बार दोनों पार्टियों ने विधानसभावार जिम्मेदारियां सौंपी हैं। यानी टिकट वितरण और जीत की जिम्मेदारी तय की है। अशोक गहलोत के गढ़ सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र के वार्डों की जिम्मेदारी बीजेपी ने जेडीए के पूर्व चेयरमैन महेंद्र राठौड़ को सौंपी है। वहीं कांग्रेस से राजेंद्र सोलंकी इसकी कमान संभाल रहे हैं।
कांग्रेस की माइनॉरिटी और एससी-एसटी वोटरों में मजबूत पकड़ है, वहीं भाजपा जनरल वोटर के सहारे है। गहलोत फैक्टर के चलते ओबीसी वोटर दोनों पार्टियों में बंटा हुआ है।
हालांकि एक निगम पर चुनाव होने से कांग्रेस की चुनौतियां बढ़ेंगी, क्योंकि पिछली बार दो निगम थे। एक में बीजेपी और एक में कांग्रेस का बोर्ड था। तब प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता होने के चलते परिसीमन में वार्डों की सीमा तय करने में पक्षपात के आरोप लगे थे।
जातिगत प्रभाव: जोधपुर नगर निगम की 25 प्रतिशत सीटों पर जीत-हार ओबीसी वोटर तय करते हैं। इनमें माली, जाट, घांची जैसी जातियां आती हैं। निगम चुनाव में दोनों पार्टियों को इस जातिगत वोट बैंक का बराबर लाभ मिलता दिख रहा है।
निगम के 3 बड़े मुद्दे
- शहर में डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन और भीतरी शहर में गंदगी।
- बरसों पुरानी सीवरेज लाइन और लीकेज की समस्या।
- पॉल्यूशन का मुद्दा, योजना आई लेकिन पॉल्यूशन कंट्रोल नहीं कर पाए।
उदयपुर
दिग्गज नेता और उनके करीबी मैदान में
मेयर के लिए ओपन सीट होने से यहां कई बड़े नेता खुद और उनके रिश्तेदार चुनावी मैदान में कूद गए हैं। मेवाड़ के कद्दावर नेता और पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया के दोनों दामाद के भाई अतुल चंडालिया और आकाश वागरेचा पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं।
भाजपा के पूर्व शहर अध्यक्ष दिनेश भट्ट, सहकारिता प्रदेश संयोजक प्रमोद सामर, पूर्व डिप्टी मेयर पारस सिंघवी और महेंद्र सिंह शेखावत चुनावी मैदान में हैं। वहीं, कांग्रेस से शहर अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ की पत्नी डॉ. पूनम कुंवर और पूर्व मेयर पद प्रत्याशी अरुण टांक शामिल हैं।
भाजपा में उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत, शहर विधायक ताराचंद जैन, ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा से लेकर शहर भाजपा अध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़ की प्रतिष्ठा दांव पर है। कांग्रेस से शहरी वार्डों में शहर अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ और ग्रामीण वार्डों में देहात अध्यक्ष व पूर्व सांसद रघुवीर सिंह मीणा पूरी ताकत लगा रहे हैं।
टिकट बंटवारे में बीजेपी ने सभी गुटों को साधा। उदयपुर शहर अध्यक्ष गजपाल सिंह राठौड़, सांसद-विधायकों के करीबी और गुलाबचंद कटारिया गुट के लोगों को भी टिकट मिले हैं। कांग्रेस में रघुवीर मीणा और फतहसिंह राठौड़ ने मिलकर प्रदेश नेताओं की सहमति से टिकट बांटे हैं।
बागी फैक्टर : कांग्रेस 22 बागियों में से 10 को मनाने में कामयाब रही, लेकिन अभी भी 12 बागी उसके लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इधर, भाजपा में महज एक बागी ही चुनावी मैदान में है, जो उदयपुर ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के विधायक फूलसिंह मीणा के वार्ड से है।
बीजेपी नेता 7वीं बार बोर्ड बनाने का दावा कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस के जिला अध्यक्ष फतहसिंह राठौड़ का कहना है- आयड़ नदी और 272 प्लॉट घोटाला बड़ा मुद्दा बनेगा और बदलाव होगा।
जातिगत प्रभाव : यहां जैन, ब्राह्मण वर्ग बड़ा है जो परंपरागत रूप से एकजुट होकर वोट कर सकता है। इसके बाद यहां पर मुस्लिम वोटर आते हैं जो कुछ वार्डों में गणित तय करते हैं। साथ ही ओबीसी, राजपूत, सिंधी वोटर का भी प्रभाव है जो अलग-अलग वार्डों में जीत-हार में अहम भूमिका निभाते हैं।
निगम के सबसे बड़े मुद्दे
- आयड़ नदी को खूबसूरत बनाने का बरसों पुराना वादा अभी पूरा नहीं हुआ है।
- ट्रैफिक जाम की समस्या है। कई जगह एलिवेटेड और फ्लाईओवर की मांग पूरी नहीं हुई है।
- पर्यटन नगरी में साफ-सफाई, कचरा निस्तारण बड़ा मुद्दा है। शिकायतों के समाधान का कोई तकनीकी सिस्टम नहीं है।
पाली
6 वार्डों में कांग्रेस का प्रत्याशी नहीं, दोनों पार्टियों में पुराने नेताओं के टिकट कटे
पाली नगर निगम के 6 वार्डों में कांग्रेस का प्रत्याशी ही नहीं है। 3 के सिंबल जमा नहीं हुए, 3 के नामांकन रद्द हो गए। वार्ड 55 से कांग्रेस प्रत्याशी ने भाजपा जॉइन कर ली। इससे कांग्रेस की चुनौती शुरुआत में ही कमजोर पड़ती दिखती है।
बीजेपी को इन 7 वार्डों से लीड मिल सकती है। लेकिन पूर्व सभापति (2007) राकेश भाटी के नॉमिनेशन से पहले कांग्रेस का हाथ थामने से बीजेपी को भी कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। भाटी वार्ड 32 से चुनाव लड़ रहे हैं।
दोनों पार्टियों में पुराने नेताओं के टिकट कटने से बागी फैक्टर भी मजबूत हो गया है। चर्चा है कि पाली में बिना निर्दलीय कोई भी पार्टी बोर्ड नहीं बना पाएगी।
भाजपा से पूर्व विधायक ज्ञानचंद पारख, जिलाध्यक्ष सुनील भंडारी और सांसद पीपी चौधरी पूरा चुनावी मैनेजमेंट संभाल रहे हैं। गृह जिला होने के चलते पार्टी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की प्रतिष्ठा दांव पर है। राठौड़ लगातार फीडबैक जुटा रहे हैं।
कांग्रेस से जिलाध्यक्ष शिशुपालसिंह निंबाड़ा, विधायक भीमराज भाटी ग्राउंड लेवल पर चुनावी मैनेजमेंट देख रहे हैं। वहीं, लोकसभा प्रत्याशी रहीं संगीता बेनीवाल, पूर्व सभापति प्रदीप हिंगड़, शहर अध्यक्ष हकीम भाई, पीसीसी सदस्य महावीरसिंह सुकरलाई भी ताकत लगा रहे हैं।
जातिगत प्रभाव : पाली नगर निगम क्षेत्र में सबसे ज्यादा ओबीसी वोटर हैं, जो जीत-हार तय करते हैं। इनमें सीरवी, वैष्णव, घांची, माली, कुमावत, सुथार, प्रजापत सहित अन्य जातियां शामिल हैं। कुछ वार्ड अल्पसंख्यक बहुल हैं, जहां कांग्रेस का दबदबा है। कई वार्डों में अल्पसंख्यक जैन अच्छी तादाद में हैं, जिन्हें बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है।
निगम के सबसे बड़े मुद्दे
- शहर में आवारा मवेशी और मोहल्लों में आवारा कुत्तों का आतंक।
- सीवरेज लाइन का अधूरा काम और मोहल्लों में कचरा निस्तारण बड़ी समस्या।
- टूटी सड़कें और बेतरतीब ट्रैफिक व्यवस्था से लोग परेशान।
इनपुट सहयोग : पाली से ओम टेलर और उदयपुर से मुकेश हिंगड़
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कोटा नगर निगम में 100, अजमेर-बीकानेर में 80-80 और भीलवाड़ा में 70 वार्ड हैं। अभी तक के समीकरणों में चारों निगम में भाजपा मजबूत दिख रही है, हालांकि मुकाबला एकतरफा भी नहीं है…(CLICK कर पूरा पढ़ें)
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