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राजस्थान में मां बनने के बाद डायलिसिस पर पांच महिलाएं: इच्छामृत्यु की मांग

राजस्थान के सरकारी अस्पताल में डायलिसिस के सहारे जीवन गुज़ार रहीं पांच महिलाओं ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छामृत्यु की मांग की है. इन महिलाओं ने कहा है कि उन्हें किडनी ट्रांसप्लांट या इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए.

BBC के अनुसार18 जुलाई 2026 को 02:02 pm बजे
राजस्थान में मां बनने के बाद डायलिसिस पर पांच महिलाएं: इच्छामृत्यु की मांग

सौजन्य से:- BBC

'हमें नई ज़िंदगी दीजिए या इच्छामृत्यु': राजस्थान में मां बनने के बाद डायलिसिस पर पांच महिलाएं

- Author, मोहर सिंह मीणा

- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

- ........से, जयपुर

- प्रकाशित

- पढ़ने का समय: 11 मिनट

"हमें नई ज़िंदगी दीजिए या फिर इच्छामृत्यु की अनुमति."

यह अपील राजस्थान के सरकारी अस्पताल में डायलिसिस के सहारे जीवन गुज़ार रहीं पांच महिलाओं ने की है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को लिखे पत्र में इन महिलाओं ने इच्छामृत्यु की मांग की है.

इन महिलाओं का कहना है कि उन्होंने बच्चों को जन्म देने के लिए अस्पताल का रुख़ किया था. लेकिन, अब उनकी ज़िंदगी हफ़्ते में दो बार होने वाली डायलिसिस के भरोसे रह गई है.

इन्हीं में से एक महिला धन्ली सुमन कहती हैं, "डायलिसिस से हम पांच से छह महीने तक ही जिएंगे. हमें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए या हमारी किडनी ट्रांसप्लांट करवाई जाए."

हालाँकि इन महिलाओं के साथ वास्तव में क्या हुआ है, इसे लेकर जो जांच कराई गई है, वह रिपोर्ट ख़बर लिखे जाने तक सार्वजनिक नहीं की गई है.

राजस्थान के अलग-अलग ज़िलों में ऑपरेशन से बच्चों को जन्म देने के बाद महिलाओं की तबियत बिगड़ने और मौत के मामले लगातार सामने आए हैं.

इन मामलों पर जहां सरकार अपने तर्क दे रही है, वहीं विपक्ष सरकार पर मामले को दबाने के आरोप लगा रहा है.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, "अगर सत्ता के अहंकार में डूबी बीजेपी सरकार ने समय रहते विपक्ष और पीड़ितों की आवाज़ सुनी होती तो आज यह शर्मनाक नौबत नहीं आती. आज हालात यह है कि मजबूर पीड़िताओं को राष्ट्रपति से इच्छामृत्यु मांगनी पड़ रही है."

इस मामले पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने सरकार का पक्ष जानने के लिए राज्य के मुख्य सचिव वी श्रीनिवास, चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर और चिकित्सा विभाग की सचिव गायत्री राठौड़ से कई बार संपर्क करने का प्रयास किया. लेकिन, उनसे संपर्क नहीं हो सका.

कोटा से बीकानेर तक कैसे फैला मामला

पिछले ढाई महीनों के दौरान राजस्थान के कोटा, बीकानेर, जोधपुर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा ज़िलों में प्रसव के बाद महिलाओं की तबियत बिगड़ने और मौत की घटनाएं सामने आई हैं.

इसकी शुरुआत चार से सात मई के दौरान कोटा में हुई. सरकारी अस्पताल में 18 महिलाओं को प्रसव पीड़ा के बाद भर्ती किया गया था. इन महिलाओं ने ऑपरेशन के ज़रिए बच्चों को जन्म दिया.

कोटा के सरकारी सुपर स्पेशलिटी न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर नीलेश जैन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा है, "पांच महिलाओं की मौत हो गई थी. अभी पांच महिलाओं का डायलिसिस जारी है."

कोटा की इन पांच महिलाओं की किडनियां फ़ेल हो चुकी हैं और उन्हें बीते 72 दिनों से सप्ताह में दो बार डायलिसिस दिया जा रहा है.

कोटा के बाद बीकानेर में भी इसी तरह के मामले सामने आए और पांच महिलाओं की मौत हुई है.

जोधपुर में भी ऐसे ही मामले मीडिया रिपोर्ट में सामने आए, हालांकि यहां किसी महिला की मौत नहीं हुई.

इसके बाद भीलवाड़ा में पांच और बांसवाड़ा में भी चार मौतों की ख़बर बीते दिनों मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आई.

जांच कमेटियां बैठीं पर नहीं मिला सुराग़

इस मामले को लेकर लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किए, जांच कमेटियां बनाई गईं. हॉस्पिटल के ऑपरेशन थिएटर बंद कर दिए गए और सैंपल जांच के लिए भेजे गए.

सैंपल की दिल्ली एम्स और जयपुर की टीमों से अस्पतालों की जांच करवाई गई.

लेकिन, दो महीने बाद भी सरकार यह बताने की स्थिति में नहीं है कि आख़िर जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया है?

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीते दिनों कोटा में इन महिलाओं से मुलाक़ात के बाद जांच रिपोर्ट की सच्चाई छिपाने के आरोप भी सरकार पर लगाए थे.

प्रसूतियों के ऑपरेशन के दौरान उपयोग होने वाली कुछ दवाओं को बैन भी किया गया. चिकित्सा विभाग के स्तर से तुरंत मामला शांत करने के लिए दो चिकित्सा कर्मचारियों को सस्पेंड करने की कार्रवाई की गई.

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने इन मामले में मीडिया से बातचीत में कहा है, "सभी घटनाओं को एक ही कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा."

उन्होंने कहा, "एक्सपर्ट्स की राय में कई मामलों में गंभीर हाई बीपी, अत्यधिक ब्लीडिंग, संक्रमण और अन्य कई हेल्थ इशू समाने आए हैं जो लीवर और किडनी फ़ेल होने तक की स्थिति पैदा कर सकते हैं."

किडनी फ़ेल होने के बाद राष्ट्रपति को लिखा पत्र

न्यू अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर निलेश जैन ने बीबीसी से बातचीत में स्वीकार किया है कि11 में से पांच प्रसूताओं की मौत और पांच की किडनी फ़ेल होने के बाद उनकी लगातार डायलिसिस की जा रही है.

उन्होंने बताया कि पांच महिलाएं बीते 72 दिनों से अस्पताल में भर्ती हैं, जिनकी हफ़्ते में दो बार डायलिसिस की जा रही है.

ये महिलाएं अपने नवजात बच्चों को भी नहीं देख पाई हैं. पांचों महिलाएं कोटा के ही आम परिवारों से हैं.

रागिनी मीणा, धन्ली सुमन, पिंकी ऐरवाल, आरती चोबदार और सुशीला महावर ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर बताया है कि प्रसव के दौरान चिकित्सकों की लापरवाही और प्रशासन की ओर से ध्यान नहीं दिए जाने के कारण तंग आकर वे इच्छामृत्यु की अनुमति मांग रही हैं.

इन महिलाओं ने संयुक्त रूप से एक पत्र लिखकर राष्ट्रपति को स्पीड पोस्ट से भेजा है.

इन महिलाओं ने राष्ट्रपति को लिखा है, ''हमें शारीरिक, मानसिक और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है. किडनी फ़ेल होने के कारण हम दो महीनों से चौबीस घंटे में पांच सौ एमएल पानी पर ज़िंदा हैं. हमें सांस लेने में परेशानी होती है, हर 48 घंटे में डायलिसिस हो रहा है. हमारे पतियों के प्राइवेट काम-धंधे छूट गए हैं. असहाय और घुट-घुटकर जीने वाली स्थिति में गरिमापूर्ण जीवन जीने का कोई मार्ग शेष नहीं बचा है.''

महिलाओं ने राष्ट्रपति से अंतिम प्रार्थना करते हुए लिखा है, "उनकी किडनी ट्रांसप्लांट करवाकर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और मुआवज़ा दिया जाए. अगर शासन प्रशासन हमें न्याय दिलाने में असमर्थ है तो हमें ससम्मान अपना जीवन समाप्त करने के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति प्रदान की जाए."

इधर, न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल कोटा के सुपरिटेंडेंट डॉक्टर नीलेश जैन ने बीबीसी से फोन पर कहा, "पांच महिलाओं का डायलिसिस चल रहा है. वह चाहती हैं कि उनका किडनी ट्रांसप्लांट निशुल्क और जल्दी होना चाहिए. उसके बाद का इलाज भी निशुल्क होना चाहिए."

बीमार धन्ली सुमन ने मीडिया से बातचीत में रोते हुए कहा, "हम डायलिसिस के भरोसे कब तक जिएंगे, ज़्यादा से ज़्यादा छह महीने."

वहीं, एक अन्य महिला रागिनी ने बीबीसी से फोन पर कहा, "डायलिसिस से बेहतर तो हमें मौत दे दी जाए. डायलिसिस से हमें उल्टी, बुखार, सिर और हाथ-पैर में असहनीय दर्द होता है. हमारी किडनियां ख़राब हो चुकी हैं, हम ही जानते हैं हमारे साथ क्या बीत रहा है. इसलिए हमने इच्छामृत्यु की मांग की है."

डायलिसिस से इनकार पर मिला आश्वासन

महिलाओं ने 13 जुलाई को डायलिसिस कराने से अस्पताल प्रशासन के सामने इनकार कर दिया था. इसके बाद इन महिलाओं ने 15 जुलाई को राष्ट्रपति को पत्र लिखा, तब जाकर प्रशासन ने इन महिलाओं की सुध ली है.

16 जुलाई को कोटा के अतिरिक्त ज़िला कलेक्टर विनोद मल्होत्रा, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर नीलेश कुमार जैन और नेफ़्रोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉक्टर विकास खंडेलिया ने महिलाओं और उनके परिजनों से बातचीत की है.

इस बातचीत के बाद रागिनी मीणा के पति लोकेश मीणा ने बीबीसी से कहा कि, "हमारी अस्पताल और ज़िला प्रशासन से बात हुई है. लिखित आश्वासन के बाद महिलाओं की डायलिसिस की गई."

आश्वासन पत्र में लिखा है कि "प्रसूताओं को अस्पताल में डायलिसिस एवं अन्य चिकित्सकीय सुविधाएं पूर्ण रूप से नि:शुल्क प्रदान करने, किडनी ट्रांसप्लांट करवाने के लिए रजिस्ट्रेशन और नि:शुल्क किडनी ट्रांसप्लांट करवाया जाएगा."

इसके साथ ही आश्वासन में आगे लिखा है कि "परिजनों की सुविधा के हिसाब से जोधपुर एम्स समेत राज्य के किसी भी अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट कराने और उसके बाद भी सभी इलाज निशुल्क रहेगा."

वहीं धन्ली ने रोते हुए मीडिया से बातचीत में अपनी पीड़ा ज़ाहिर की है.

उन्होंने कहा, "डायलिसिस से बदन ठंडा पड़ जाता है, उल्टियां होती हैं. हमें चक्कर आते हैं और शरीर बेजान हो जाता है."

कोटा के ज़िला कलेक्टर पीयूष सामरिया ने बीबीसी से फ़ोन पर कहा, "किडनी ट्रांसप्लांट के लिए एक मेडिकल बोर्ड होता है. हमने स्वास्थ्य विभाग को रेफ़र किया है. लेकिन डायलिसिस जब फ़ेल हो जाता है और डायलिसिस को बॉडी रिस्पॉन्ड नहीं करती है तब ट्रांसप्लांट की ज़रूरत पड़ती है."

नवजात से दूर रहने को मजबूर बीमार माएं

रागिनी मीणा की पहले से दो बेटियाँ थीं और अब उन्होंने तीसरे बच्चे को जन्म दिया. लेकिन, वह इसके बाद से ही अपने नवजात बेटे का चेहरा नहीं देख सकी हैं. उनके भाई विकास अस्पताल में ही मौजूद हैं.

विकास ने बीबीसी से कहा, "चार मई को बहन ने बच्चे को जन्म दिया था. उसके कुछ घंटे बाद से ही तबियत बिगड़ी तो सात मई से डायलिसिस शुरू कर दिया गया."

विकास बताते हैं, "मेरी बहन जब अस्पताल आईं थी तो 63 किलो वज़न था और आज घटकर 41 किलो रह गया है. नवजात बच्चे की देखभाल ससुराल वाले कर रहे हैं."

रागिनी के पति लोकेश ने कहा, "मैं प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. शुरू में मेडिकल लीव पर रहा. कुछ दिन तक छुट्टी पर रहने के कारण सैलरी काटी गई और अब नौकरी ही छूट गई. परिवार का ख़र्चा मेरी नौकरी से ही चलता था."

यह हालात सिर्फ़ रागिनी के परिवार के ही नहीं हैं, बल्कि पांचों परिवारों की स्थिति यही है.

धन्ली सुमन के पति मोहन लाल सुमन कहते हैं, "हमारे पहले से दो बच्चे हैं और दोनों ही सिज़ेरियन से जन्मे थे. बच्चे के जन्म के कुछ घंटों बाद ही उन्हें अपनी मां से दूर करना पड़ा था, धन्ली सुमन की यह पीड़ा मैं भी नहीं समझ सकता."

वह कहते हैं, "चार मई की शाम पांच बजे धन्ली ने बच्चे को जन्म दिया, तब दोनों ठीक थे और रात भी सब ठीक रहा. पांच जुलाई की सुबह पांच बजे के क़रीब ब्लीडिंग हो रही थी. एक बार फिर धन्ली सुमन का ऑपरेशन हुआ. जिसके बाद उन्हें गायनी वार्ड में शिफ़्ट किया गया फिर शाम को पीलिया हो गया."

मोहन कहते हैं, "पांच जुलाई की रात को नेफ़्रोलॉजी में सीधा वेंटिलेटर पर रखा गया, चार दिन वेंटिलेटर पर रहे. उन्होंने बच्चे को आईसीयू में देखा उसके बाद नहीं देखा. बच्चे की बुआ संभाल रही हैं."

सुशीला के पति ओम प्रकाश ने बीबीसी से फ़ोन पर बताया, "यह हमारा पहला बच्चा है. सुशीला अस्पताल में ज़िंदगी की जंग लड़ रही हैं और अब बच्चे को भी कल अस्पताल में भर्ती कराया गया है. मां का दूध नहीं मिलने के कारण क़रीब ढाई महीने के बच्चे को पाउडर का दूध पिलाया था, जिससे उसके पेट में गांठ पड़ गई है."

विशेषज्ञ ने उठाया बुनियादी ढांचे का मुद्दा

राजस्थान में महिला स्वास्थ्य के मुद्दों पर काम करने वाली संस्था 'जन स्वास्थ्य अभियान राजस्थान' की समन्वयक छाया पचौली ने बीबीसी से बातचीत में इस मामले को बेहद गंभीर बताया.

उन्होंने कहा, "कोटा और अन्य जगहों पर हुई मातृ मृत्यु की घटनाओं को सिर्फ़ अस्पताल की लापरवाही कहकर नहीं टाला जा सकता. ये हमारी मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था की ज़मीनी स्तर से लेकर मेडिकल कॉलेजों तक की कमियों को दिखाती हैं. "

उनके मुताबिक़, "सवाल यह है कि जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की पहचान, निगरानी और समय रहते बड़े अस्पतालों में रेफ़र करने की व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं रही."

छाया पचौली ने कहा, "जिन अस्पतालों में महिलाओं का इलाज हुआ, वहां यह देखना ज़रूरी है कि क्या सभी तय नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा था और साथ ही, क्या वहां पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर, नर्सें और अन्य स्वास्थ्यकर्मी मौजूद थे, क्या मरीज़ों को गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराई गई थीं."

वह कहती हैं कि अगर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों तक स्वास्थ्य व्यवस्था मज़बूत होती, तो कई महिलाओं की जान बचाई जा सकती थी और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को भी रोका जा सकता था.

उन्होंने कहा, "सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन घटनाओं की जांच के लिए बनाई गई विशेषज्ञ समितियों, जिनमें एम्स दिल्ली की टीम भी शामिल थी, उनकी रिपोर्टें अब तक सार्वजनिक नहीं की गई हैं."

पचौली ने मांग की कि सरकार पारदर्शिता दिखाए और इन रिपोर्टों को सार्वजनिक करे, ताकि मौतों के असली कारण सामने आ सकें, ज़िम्मेदारी तय हो सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके.

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