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माथे पर लहू का तिलक और सिर सजी पगड़ी... 13 साल की तेजस्वी कुमारी जोधा बनीं शाही परिवार की उत्तराधिकारी, राजस्थान में टूटा सदियों पुराना रिवाज

Sign In Advertisement X राजस्थान की माटी और वहां के राजपूत समाज में परंपराओं को बेहद सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, लेकिन समय के साथ इन परंपराओं को समानता के आध…

AajTak के अनुसार27 जून 2026 को 05:19 am बजे
माथे पर लहू का तिलक और सिर सजी पगड़ी... 13 साल की तेजस्वी कुमारी जोधा बनीं शाही परिवार की उत्तराधिकारी, राजस्थान में टूटा सदियों पुराना रिवाज

सौजन्य से:- AajTak

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राजस्थान की माटी और वहां के राजपूत समाज में परंपराओं को बेहद सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, लेकिन समय के साथ इन परंपराओं को समानता के आधुनिक मूल्यों में ढालने की एक बेहद खूबसूरत मिसाल पाली जिले से सामने आई है. यहां के ऐतिहासिक खेरवा गाँव में सदियों पुरानी पुरुष-प्रधान प्रथा को दरकिनार करते हुए एक 13 साल की मासूम लड़की को औपचारिक रूप से पुराने शाही परिवार का उत्तराधिकारी घोषित किया गया है. मारवाड़ के इस पूरे क्षेत्र में यह अपनी तरह का पहला और ऐतिहासिक बदलाव है.

खेरवा गांव में पारंपरिक 'पाग का दस्तूर' के तहत तेजस्वी कुमारी जोधा को औपचारिक पगड़ी पहनाई गई. यह उनके पिता, हरीश चंद्र जोधा की मृत्यु के बाद खेरवागढ़ वंश के उत्तराधिकार का प्रतीक था.

यह समारोह ऐतिहासिक खेरवा किले में आयोजित किया गया था, जिसके बारे में माना जाता है कि यह 17वीं सदी का है. इसमें सैकड़ों ग्रामीण और दर्शक शामिल हुए. इस क्षेत्र में यह पहली बार था जब राजपूतों की इस पुरानी परंपरा के तहत किसी लड़की को उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी गई.

इस रस्म के हिस्से के तौर पर वैदिक मंत्रों का पाठ किया गया, जबकि तेजस्वी शांति और धैर्य के साथ समारोह में बैठी रहीं. उनके सिर पर एक औपचारिक गुलाबी पगड़ी रखी गई, जो शोक की समाप्ति और जिम्मेदारी संभालने का प्रतीक थी.

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यह पगड़ी परंपरा के अनुसार जोधपुर-मारवाड़ के पूर्व शाही परिवार द्वारा भेजी गई थी. पुरानी परंपराओं को निभाते हुए, एक रस्मी तरीके से निकाले गए खून से उनके माथे पर 'तिलक' भी लगाया गया. देखें VIDEO:-

'पाग का दस्तूर' ऐतिहासिक रूप से पाली के उन हिस्सों में निभाया जाता रहा है जो कभी जोधपुर राज्य का हिस्सा थे. यहां परिवार के दिवंगत मुखिया का उत्तराधिकारी उत्तराधिकार के प्रतीक के तौर पर पगड़ी पहनता है.

यह रस्म न केवल विरासत का, बल्कि समुदाय के भीतर सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी के हस्तांतरण का भी प्रतीक है. हालांकि, पारंपरिक रूप से यह सिर्फ पुरुष उत्तराधिकारियों के लिए ही आरक्षित रही है.

65 साल बाद क्यों करना पड़ा यह आयोजन?

समुदाय के बुजुर्गों ने कहा कि तेजस्वी को उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता देने का फैसला सामूहिक रूप से लिया गया, क्योंकि उनके पिता का कोई बेटा नहीं था. पुरुष उत्तराधिकारी न होने के कारण खेरवागढ़ परिवार ने लगभग 65 वर्षों से यह समारोह नहीं किया था, जिससे यह अवसर दुर्लभ और प्रतीकात्मक बन गया.

ग्रामीणों ने इस कदम को प्रगतिशील और बदलती सामाजिक सोच का प्रतिबिंब बताया. पड़ोसी गांव के निवासी रवींद्र सिंह ने कहा कि समुदाय ने परंपरा को बनाए रखने के साथ-साथ उसे समानता के आधुनिक मूल्यों के अनुरूप ढालने का फैसला किया.

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एक और निवासी अजय सिंह ने कहा कि इस फैसले का मकसद तेजस्वी के पिता की विरासत का सम्मान करना भी था, जो अपने सामाजिक योगदान के लिए जाने जाते थे और दो बार सरपंच रह चुके थे.

पूर्व सरपंच कन्हैया लाल ने पत्रकारों से कहा, "हम सभी के लिए यह गर्व की बात है कि इस इलाके में पहली बार किसी बेटी को परिवार का मुखिया माना गया है."

पिता के विजन को पूरा करूंगी: तेजस्वी कुमारी

7वीं कक्षा की छात्रा तेजस्वी ने पत्रकारों से कहा कि वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान देते हुए ही उसे सौंपी गई जिम्मेदारी को निभा रही है. उसने गांव के विकास के लिए अपने पिता के विजन को पूरा करने की दिशा में काम करने की इच्छा जताई.

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