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Special: हाथों की भाषा को लाइसेंस की 'दरकार' ताकि सुना सकें राजस्थान के इतिहास की 'दास्तान'

Special: हाथों की भाषा को लाइसेंस की 'दरकार' ताकि सुना सकें राजस्थान के इतिहास की 'दास्तान' International Day of Sign Languages साइन लैंग्वेज में इतिहास बताने का हुनर रखते हैं जयपुर के दीपेश. पेश है जसवंत सिंह की रिपोर्ट…

ETV Bharat के अनुसार23 सितंबर 2026 को 05:05 am बजे
Special: हाथों की भाषा को लाइसेंस की 'दरकार' ताकि सुना सकें राजस्थान के इतिहास की 'दास्तान'

सौजन्य से:- ETV Bharat

Special: हाथों की भाषा को लाइसेंस की 'दरकार' ताकि सुना सकें राजस्थान के इतिहास की 'दास्तान'

International Day of Sign Languages साइन लैंग्वेज में इतिहास बताने का हुनर रखते हैं जयपुर के दीपेश. पेश है जसवंत सिंह की रिपोर्ट...

Published : September 23, 2026 at 9:31 AM IST

जयपुर : शब्दों से नहीं, हाथों से आमेर किले से लेकर राजस्थान के इतिहास की कहानी बयां करते हैं. हवामहल की खिड़कियों के पीछे छिपा वास्तुशिल्प समझाते हैं. जयपुर की विरासत को उस भाषा में बताते हैं, जिसे सुना तो नहीं जाता, लेकिन सैलानी आसानी से समझ सकें. दीपेश अरोड़ा का सपना भी कुछ ऐसा ही है. दीपेश खुद बधिर हैं, उन्होंने इंडिगो की नौकरी की, लेकिन पर्यटन के प्रति जुनून ने उन्हें अलग रास्ता चुनने को प्रेरित किया. अब वे टूरिस्ट गाइड बनना चाहते हैं. किताबों, विजुअल सामग्री और वर्षों के अनुभव से राजस्थान के पर्यटन स्थलों और इतिहास को समझा है. वर्ष 2016-17 से अपने स्तर पर पर्यटकों और कॉलेज टूर से जुड़े लोगों को राजस्थान के अलग-अलग स्थलों का भ्रमण कराते रहे हैं. अब वे इसी अनुभव को पेशेवर करियर में बदलना चाहते हैं. समस्या यह नहीं कि उनके जुनून में कमी है. दिक्कत है कि जिस क्षेत्र में वे अपना भविष्य देख रहे हैं, वहां उनके लिए सरकारी लाइसेंस का रास्ता स्पष्ट नहीं है.

लाइसेंस मांग नहीं, अधिकार : 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस पर दीपेश अरोड़ा की कहानी सिर्फ युवा की नौकरी या लाइसेंस की मांग नहीं है. यह उस बड़े सवाल से जुड़ती है कि राजस्थान आने वाला बधिर पर्यटक अपनी भाषा में यहां के इतिहास और विरासत को कब और कितनी स्वतंत्रता से समझ पाएगा. संयुक्त राष्ट्र ने 2026 के अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस की थीम ‘Declaring Deaf People’s Human Rights’ रखी है. इसमें बधिर लोगों के अधिकारों को सभी क्षेत्रों में वास्तविक रूप से सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय सांकेतिक भाषाओं तक पहुंच को महत्व दिया गया है. इस दिन को बधिर समुदाय के अधिकारों, मुख्यधारा से जोड़ने और उनके मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए मनाया जाता है. दीपेश जैसे कई युवा हैं जो पर्यटन क्षेत्र में अपने करियर को आगे बढ़ाना चाहते हैं.

इंडिगो से पर्यटन तक का सफर : दीपेश के लिए यह फैसला अचानक नहीं था. उन्होंने पहले नौकरी की, लेकिन पर्यटन और लोगों को ऐतिहासिक स्थलों के बारे में बताने का शौक लगातार बना रहा. कॉलेज टूर और पर्यटकों के साथ काम करते हुए उन्हें महसूस हुआ कि उनकी सांकेतिक भाषा की जानकारी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है. उनका कहना है, बधिर पर्यटक जब राजस्थान आते हैं तो उन्हें अक्सर सामान्य गाइड के साथ अलग इंटरप्रेटर की जरूरत पड़ती है. गाइड इतिहास बताता है और इंटरप्रेटर उस जानकारी को सांकेतिक भाषा में समझाता है.एक पर्यटक को यात्रा समझने के लिए दो लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है. दीपेश इस व्यवस्था में खुद को विकल्प के तौर पर देखते हैं. वे कहते हैं कि अगर उन्हें आधिकारिक तौर पर प्रशिक्षित और प्रमाणित गाइड बनने का अवसर मिले तो बधिर पर्यटकों से सीधे सांकेतिक भाषा में संवाद कर सकते हैं. उनके लिए इतिहास, संस्कृति और विरासत की जानकारी को समझना आसान होगा और पर्यटन का अनुभव भी ज्यादा स्वतंत्र होगा.

इंटरप्रेटर की जरूरत नहीं पड़ेगी: दीपेश के सामने सबसे बड़ा तर्क है कि उनकी शारीरिक स्थिति ही इस काम में विशेष क्षमता बन सकती है. सामान्य गाइड के लिए भाषा संवाद का माध्यम है, जबकि दीपेश के लिए सांकेतिक भाषा ही संवाद की भाषा है. दीपेश का कहना था, विदेशों में बधिर पर्यटकों के लिए सांकेतिक भाषा में सेवाओं पर काफी काम हुआ है. भारत में यदि पर्यटन को वास्तव में समावेशी बनाना है तो बधिर पर्यटकों को सिर्फ स्मारक तक पहुंच उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा. उन्हें उस स्मारक की कहानी समझने का अधिकार भी मिलना चाहिए. कोई बधिर पर्यटक आमेर किला देखने पहुंचता है. वह दीवारें देख सकता है, महल देख सकता है, तस्वीर खींच सकता है, लेकिन निर्माण के पीछे की कहानी, वास्तुकला, राजपरिवार का इतिहास और उस जगह का सांस्कृतिक महत्व उसे उसकी भाषा में कौन समझाए ? यही वह जगह है जहां हम जैसे गाइड की जरूरत सामने आती है .

राजस्थान की विरासत दिखे ही नहीं, समझ भी आए : राजस्थान देश-विदेश के पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन स्थान है. आम पर्यटक के लिए गाइड स्मारक को सिर्फ दिखाता नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति भी समझाता है, लेकिन बधिर पर्यटक के सामने पहला सवाल ही संवाद का होता है. गाइड सांकेतिक भाषा नहीं जानता तो पर्यटक को इंटरप्रेटर की जरूरत पड़ती है . कई बार मोबाइल पर लिखकर बातचीत होती है. इससे तत्काल संवाद, सवाल-जवाब और किसी ऐतिहासिक घटना की बारीक व्याख्या कठिन हो सकती है. दीपेश और बधिर समुदाय से जुड़े लोगों का तर्क है कि राजस्थान के पर्यटन स्थलों को सिर्फ समावेशी बनाना पर्याप्त नहीं है, पर्यटन की जानकारी भी समावेशी होनी चाहिए. तब ही बधिर पर्यटक देखने के साथ समझ पाएगा. नहीं तो विरासत को देखेगा और फोटो खींचकर चला जाएगा. उसकी समझ में कुछ नहीं आएगा.

पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर गाइडों की सूची : राजस्थान पर्यटन विभाग अपनी वेबसाइट पर अलग-अलग शहरों के पंजीकृत गाइडों की सूचियां उपलब्ध कराता है.वर्तमान वेबसाइट पर अजमेर, बीकानेर, झुंझुनू, जोधपुर, चित्तौड़गढ़, कोटा, टोंक, आबू, उदयपुर और जैसलमेर सहित कई स्थानों की गाइड सूचियां उपलब्ध हैं. दीपेश जैसे युवाओं का सवाल यह है कि इस व्यवस्था में सांकेतिक भाषा में विशेषज्ञता रखने वाले बधिर गाइड के लिए स्पष्ट रास्ता कहां है ? यहीं से बधिर समुदाय के युवाओं के गाइड बनने के सपनों को रोका जा रहा है. इस वेबसाइट पर अगर बधिर समुदाय को सरकारी प्रशिक्षण के साथ लाइसेंस उपलब्ध कराएं तो ये भी समय की तरह अधिकृत गाइडों की श्रेणी में आ सकते हैं.

साइन लैंग्वेज की विशेष व्यवस्था नहीं : बधिर समुदाय के अधिकारों के लिए लम्बे समय से काम कर रहे नूपुर संस्था के संस्थापक मनोज भारद्वाज कहते हैं, राजस्थान के 2021 के गाइड नियमों में राज्य स्तर और स्थानीय स्तर के गाइड प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए प्रवेश परीक्षा, उम्र, शैक्षणिक योग्यता और प्रशिक्षण से जुड़ी प्रक्रिया निर्धारित है. नियमों में प्रशिक्षण के लिए आवेदन, पात्रता जांच और परीक्षा के आधार पर मेरिट तैयार करने की व्यवस्था है. यहीं बधिर समुदाय से जुड़े लोगों का सवाल उठता है कि जब गाइडिंग का क्षेत्र पर्यटन की बदलती जरूरतों के साथ आगे बढ़ रहा है तो क्या सांकेतिक भाषा को भी गाइडिंग की विशेषज्ञता के रूप में जगह नहीं मिलनी चाहिए? उन्होंने कहा कि दीपेश जैसे सैकड़ों बधिर युवाओं की मांग मौजूदा गाइड व्यवस्था को खत्म करने की नहीं है. उनकी मांग है कि उनकी योग्यता को भी उसी तरह जांचा जाए जैसे दूसरे गाइडों की होती है. उन्हें इतिहास, पर्यटन स्थलों, सुरक्षा और गाइडिंग का प्रशिक्षण दिया जाए, परीक्षा ली जाए और योग्य पाए जाने पर प्रमाणपत्र या लाइसेंस दिया जाए .

मांग रियायत की नहीं, अवसर की है : बधिर समुदाय की समस्या को लेकर अधिकारियों से जानकारी चाही, लेकिन उनके पास कोई जवाब नहीं. आधिकारिक तौर पर कोई भी जिम्मेदार इस पर बोलने को तैयार नहीं. ऐसे में आरटीआई से जानकारी मांगी तो सामने आया कि विभाग में बधिर व्यक्ति को अधिकृत लाइसेंस देने का नियम नहीं है. सवाल यह भी था कि जब समावेशी पर्यटन की बात होती है, तब बधिर पर्यटकों के लिए प्रशिक्षित और अधिकृत गाइड की व्यवस्था को स्पष्ट रूप से शामिल क्यों नहीं किया जाता, लेकिन जवाब कुछ नहीं. बस, नियमों का हवाला दिया गया. मनोज भारद्वाज कहते हैं, दीपेश जैसे युवाओं की समस्या को वे सिर्फ व्यक्तिगत मामला नहीं मानते हैं. दिव्यांगों के अधिकारों को लेकर देश में कानून और नीतियां मौजूद हैं, लेकिन किसी अधिकार का वास्तविक अर्थ तभी है जब वह व्यक्ति के जीवन में अवसर में बदल सके. मनोज के मुताबिक पर्यटन ऐसा क्षेत्र है जहां ऐसे युवाओं के लिए बड़ी संभावनाएं हैं, क्योंकि यहां सांकेतिक भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक विशेष कौशल बन सकती है.

पढ़ें: आठ साल से बधिर समुदाय की जुबान और कान बनीं नूपुर भारद्वाज, जानिए कैसे...

हजारों युवाओं के लिए खुल सकता है नया करियर : मनोज का कहना है, यदि पर्यटन विभाग सांकेतिक भाषा में गाइडिंग के लिए औपचारिक व्यवस्था शुरू करता है तो बधिर युवाओं के लिए करियर का नया क्षेत्र खुल सकता है. इसमें केवल गाइड ही नहीं, बल्कि इंटरप्रिटेशन, पर्यटन प्रशिक्षण, ट्रैवल प्लानिंग, हेरिटेज इंटरप्रिटेशन, डिजिटल कंटेंट और समावेशी पर्यटन से जुड़े दूसरे काम भी शामिल हो सकते हैं. राजस्थान के पास इसके लिए सामग्री भी बहुत है. आमेर, हवामहल, सिटी पैलेस, जंतर-मंतर, चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, जैसलमेर, जोधपुर, उदयपुर और सैकड़ों अन्य ऐतिहासिक स्थल. जरूरत है तो सिर्फ तय करने की कि इन कहानियों को अलग-अलग भाषाओं और संचार माध्यमों में पर्यटकों तक कैसे पहुंचाया जाए?.

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