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जयपुर में पहली बार 'वुमन मिडनाइट वॉक', सड़कों पर उतरीं महिलाएं और लड़कियां, गूंजे आजादी और सुरक्षा के नारे

जयपुर में पहली बार 'वुमन मिडनाइट वॉक', सड़कों पर उतरीं महिलाएं और लड़कियां, गूंजे आजादी और सुरक्षा के नारे जयपुर में मिडनाइट वॉक के आयोजन पर महिलाओं ने कहा- सुरक्षा के नाम पर पाबंदियां नहीं, सोच बदलने की जरूरत. Published…

etvbharat.com के अनुसार1 अक्टूबर 2026 को 05:04 am बजे
जयपुर में पहली बार 'वुमन मिडनाइट वॉक', सड़कों पर उतरीं महिलाएं और लड़कियां, गूंजे आजादी और सुरक्षा के नारे

सौजन्य से:- etvbharat.com

जयपुर में पहली बार 'वुमन मिडनाइट वॉक', सड़कों पर उतरीं महिलाएं और लड़कियां, गूंजे आजादी और सुरक्षा के नारे

जयपुर में मिडनाइट वॉक के आयोजन पर महिलाओं ने कहा- सुरक्षा के नाम पर पाबंदियां नहीं, सोच बदलने की जरूरत.

Published : October 1, 2026 at 9:44 AM IST

जयपुर: शहर में पहली बार वुमन मिडनाइट वॉक का आयोजन किया गया. रात करीब साढ़े आठ बजे बड़ी संख्या में महिलाएं और लड़कियां जवाहर सर्किल स्थित पत्रिका गेट पर जुटना शुरू हुईं. हाथों में तख्तियां थीं और उन पर सवाल लिखे थे- 'रात किसकी? शहर किसका? आजादी किसकी?' देखते ही देखते पत्रिका गेट का इलाका नारों से गूंजने लगा. द सिविक वॉयस और जयपुर कॉमन मूवमेंट की ओर से आयोजित इस वॉक में करीब 900 से 1000 महिलाएं और लड़कियां शामिल हुईं. कुछ पुरुषों ने भी महिलाओं की सुरक्षा, बराबरी और सार्वजनिक जगहों पर उनकी स्वतंत्र आवाजाही के समर्थन में वॉक में हिस्सा लिया. पत्रिका गेट से शुरू हुई वॉक जवाहर सर्किल का चक्कर लगाकर वापस समाप्त हुई.

वुमन मिडनाइट वॉक की शुरुआत साल 2016 में दिल्ली में मल्लिका तनेजा ने की थी. निर्भया आंदोलन के बाद शुरू हुई इस पहल का उद्देश्य महिलाओं की रात में सार्वजनिक जगहों पर मौजूदगी और स्वतंत्र आवाजाही को लेकर जागरूकता पैदा करना रहा है. इस पहल का मूल संदेश यह है कि महिलाओं को रात से डराने या उन्हें घर तक सीमित करने के बजाय सार्वजनिक स्थानों को उनके लिए सुरक्षित और समान बनाया जाए. जयपुर में आयोजित पहली वुमन मिडनाइट वॉक में भी यही सवाल प्रमुखता से उठा कि रात, सड़क और शहर पर महिलाओं का भी उतना ही अधिकार है, जितना पुरुषों का.

जे़न जी के नारे सोच पर भारी : वॉक के दौरान महिलाओं ने अलग-अलग नारों के जरिए अपनी बात रखी. 'हम औरतें अपने आप की, ना किसी के बाप की', 'हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी, पितृसत्ता की सोच है छोटी' और 'बेटी की लोकेशन नहीं, बेटे का इंटेंट चेक करो' जैसे नारों ने लोगों का ध्यान खींचा. वॉक आगे बढ़ी तो महिलाओं के नारों की आवाज भी तेज होती गई. 'शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में?' और 'नहीं डरेंगे डर के, मर्द को रखो घर में' जैसे नारों के जरिए महिलाओं ने सुरक्षा के नाम पर उन पर लगाई जाने वाली पाबंदियों और समाज की सोच पर सवाल उठाए. ठहाकों, गीतों और चुटीले नारों के बीच मुद्दा गंभीर था. महिलाओं ने सवाल उठाया कि आखिर उन्हें रात में अपने ही शहर की सड़कों पर निकलने से क्यों रोका जाए? सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की मौजूदगी को सामान्य बनाने और उन्हें बिना डर आवाजाही का अधिकार देने की मांग वॉक का प्रमुख संदेश रही.

स्वतंत्र आवाजाही के लिए माहौल की मांग: आयोजक मुकुल मिश्रा ने कहा कि महिलाओं को कब तक रात में अपने ही शहर में कैद रहना पड़ेगा. सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की मौजूदगी सामान्य होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रता और आवाजाही पर रोक लगाने के बजाय शहरों को ऐसा बनाया जाना चाहिए, जहां महिलाएं दिन हो या रात, सुरक्षित महसूस कर सकें. वॉक के दौरान कहीं गीत गूंजे तो कहीं कविताएं सुनाई गईं. महिलाओं ने अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए. कई महिलाएं अपनी मां, बहन, पिता, भाई और दोस्तों के साथ इस आयोजन में पहुंचीं. हंसी-मजाक और बातचीत के बीच सुरक्षा, बराबरी और महिलाओं की सार्वजनिक जगहों पर स्वतंत्र आवाजाही जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे.

खौफ के साये से निकलकर चाहिए आजादी: मानसरोवर से अपनी बहन के साथ वॉक में पहुंची सुदेश ने कहा कि वह चाहती हैं कि उनकी छोटी बहन सुरक्षित महसूस करे और डर के बजाय आजादी के साथ अपना जीवन जिए. उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की खबरें सामने आने के बाद कई बार रात में बाहर निकलने को लेकर डर महसूस होता है, लेकिन इस डर का समाधान महिलाओं को घर में रोकना नहीं हो सकता. सांगानेर से पहुंचीं प्रमिला और नीतू ने कहा कि रात में सुरक्षित होकर बाहर निकलना सिर्फ पुरुषों का अधिकार नहीं होना चाहिए. महिलाओं को भी अपने शहर की सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर बिना डर आने-जाने का समान अधिकार मिलना चाहिए.

महिला पर नियम कायदों की जगह शिक्षित पुरुष की जरूरत: वॉक में शामिल प्रगति शर्मा और लवलीन शेखावत ने कहा कि समाज में वास्तविक बदलाव के लिए बच्चों को शुरुआत से ही बराबरी और सम्मान की शिक्षा देना जरूरी है. महिलाओं ने कहा कि सुरक्षा के नाम पर लड़कियों के कपड़ों, उनकी आवाजाही और बाहर निकलने के समय पर पाबंदियां लगाने के बजाय लड़कों और पुरुषों को सम्मान, सहमति और बराबरी की समझ देना जरूरी है.उन्होंने कहा कि किसी लड़की की सुरक्षा तय करने के लिए उसकी लोकेशन, कपड़े या समय को जिम्मेदार ठहराने के बजाय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उसके साथ व्यवहार करने वाले व्यक्ति की सोच और इरादा क्या है. मालवीय नगर निवासी विजय त्रिपाठी ने कहा कि महिलाओं की आजादी और सुरक्षा का मुद्दा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है. समाज की सोच में बदलाव के लिए पुरुषों की भागीदारी भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि महिलाओं को सुरक्षित और बराबरी का माहौल देने की जिम्मेदारी पूरे समाज की है.

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