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Special : मुखौटे के पीछे इंसान, चेहरे पर भगवान…जयपुर की नरसिंह लीला अब दुनिया से कहेगी आस्था की कहानी

Special : मुखौटे के पीछे इंसान, चेहरे पर भगवान…जयपुर की नरसिंह लीला अब दुनिया से कहेगी आस्था की कहानी 'द फेस ऑफ गॉड' अब जयपुर की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक पहुंचेगी. जसवंत सिंह की रिपोर्ट... Publish…

etvbharat.com के अनुसार1 अक्टूबर 2026 को 06:04 am बजे
Special : मुखौटे के पीछे इंसान, चेहरे पर भगवान…जयपुर की नरसिंह लीला अब दुनिया से कहेगी आस्था की कहानी

सौजन्य से:- etvbharat.com

Special : मुखौटे के पीछे इंसान, चेहरे पर भगवान…जयपुर की नरसिंह लीला अब दुनिया से कहेगी आस्था की कहानी

'द फेस ऑफ गॉड' अब जयपुर की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों तक पहुंचेगी. जसवंत सिंह की रिपोर्ट...

Published : October 1, 2026 at 10:31 AM IST

जयपुर: गुलाबी नगरी जयपुर की पुरानी गलियों में जब नरसिंह लीला का मंच सजता है, तो यह सिर्फ किसी पौराणिक कथा का मंचन नहीं होता, बल्कि कुछ देर के लिए समय पीछे लौट जाता है. पात्र बदलते हैं, चेहरे मुखौटों में ढलते हैं और एक कलाकार अपने रोजमर्रा के अस्तित्व से बाहर निकलकर उस भूमिका में प्रवेश करता है, जिसे पीढ़ियों से आस्था के साथ निभाया हो.

जयपुर की ऐतिहासिक नरसिंह लीला अब शहर की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की तैयारी में है. इसी परंपरा पर आधारित डॉक्यूमेंट्री 'द फेस ऑफ गॉड' आस्था, पहचान और कलाकार के भीतर होने वाले बदलाव की कहानी को सामने लाती है. फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों और सांस्कृतिक मंचों तक ले जाने की तैयारी है. क्या इस शॉर्ट फिल्म की कहानी ? किस तरह से युवाओं को संस्कृति से जोड़ती है ? इसको लेकर फिल्म प्रोड्यूसर प्रज्ञा राठौड़ से ईटीवी भारत की टीम ने खास बात की.

परंपरा के पीछे छिपे इंसान की कहानी : डॉक्यूमेंट्री में नरसिंह लीला के मंचन से आगे बढ़कर उन कलाकारों के अनुभवों को केंद्र में रखा गया है, जो भगवान का किरदार निभाते हैं. सवाल यहीं से जन्म लेता है, जब एक इंसान भगवान का रूप धारण करता है, तो उस क्षण उसके भीतर क्या घटता है ? इसी सवाल को अपनी कहानी का केंद्र बनाती है डॉक्यूमेंट्री 'द फेस ऑफ गॉड'. फिल्म जयपुर की नरसिंह लीला को कैमरे में दर्ज करने से आगे जाती है. इसकी दिलचस्पी उस अनुभव में है, जहां अभिनय और आस्था की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं और कलाकार की पहचान उसके निभाए किरदार के साथ एक अलग रिश्ता बनाने लगती है.

फिल्म प्रोड्यूसर प्रज्ञा राठौड़ ने बताया कि यह फिल्म जयपुर की एक स्थानीय परंपरा को अंतरराष्ट्रीय दर्शक के लिए नए संदर्भ में देखने की कोशिश है. कहानी में धर्म है, लेकिन इसका दायरा केवल धार्मिक नहीं है. इसमें पहचान का सवाल है, समर्पण की मन: स्थिति है. पीढ़ियों से हस्तांतरित होती स्मृतियां हैं और उस कलाकार की निजी दुनिया है, जो हर बार मंच पर उतरते हुए अपने भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस करता है.

प्रज्ञा कहती हैं कि 'द फेस ऑफ गॉड' का फोकस नरसिंह लीला के भव्य दृश्य भर नहीं हैं. फिल्म उन लोगों के करीब जाती है जो इस परंपरा को जीवित रखते हैं. फिल्म का केंद्रीय प्रश्न बेहद सरल है, लेकिन उसका जवाब आसान नहीं. अगर किसी किरदार का चेहरा ही आपकी पहचान बन जाए, तो उस चेहरे के पीछे मौजूद व्यक्ति कहां रह जाता है ? यही प्रश्न इस डॉक्यूमेंट्री को सामान्य सांस्कृतिक दस्तावेज से अलग करता है. कैमरा केवल मंच पर होने वाली गतिविधियों को नहीं देखता, बल्कि उस मनुष्य को तलाशता है जो मंच पर आने से पहले और उतरने के बाद भी इस अनुभव को अपने भीतर लेकर चलता है.

जयपुर की गलियों से उठेगा एक बड़ा सवाल : प्रज्ञा राठौड़ ने कहा कि 'द फेस ऑफ गॉड' की असली ताकत शायद नरसिंह लीला के दृश्य वैभव में नहीं, बल्कि उस सवाल में है जो फिल्म दर्शक के सामने छोड़ना चाहती है. हम अपनी पहचान खुद बनाते हैं या कभी-कभी कोई भूमिका हमें बदल देती है? आस्था केवल विश्वास है या अनुभव भी ? और जब एक कलाकार मंच पर भगवान का चेहरा पहनता है, तो क्या वह सिर्फ एक किरदार निभा रहा होता है या कुछ क्षणों के लिए उस पहचान को जी भी रहा होता है ?

उन्होंने कहा कि जयपुर की नरसिंह लीला इन सवालों का अपना सांस्कृतिक जवाब देती है. 'द फेस ऑफ गॉड' अब उसी जवाब को कैमरे के जरिए शहर की सीमाओं से बाहर ले जाने की तैयारी में है. एक ऐसी कहानी के रूप में, जिसकी शुरुआत जयपुर की गलियों से होती है, लेकिन जिसका सवाल किसी एक शहर, धर्म या संस्कृति तक सीमित नहीं है. शायद यही वह बिंदु है जहां एक स्थानीय परंपरा अंतरराष्ट्रीय कहानी में बदल जाती है.

जयपुर से जुड़ा निजी रिश्ता : प्रज्ञा कहती है कि उनके लिए 'द फेस ऑफ गॉड' केवल एक फिल्म प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि जयपुर की सांस्कृतिक स्मृतियों को एक नए नजरिए से देखने का अवसर भी है. आस्था कोई ऐसा विषय नहीं जिसे केवल स्वीकार कर लिया जाए. वह उसके भीतर मौजूद सवालों को समझना चाहती हैं. उनके मुताबिक, विश्वास और अनुभव के बीच एक ऐसी जगह होती है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांधना मुश्किल है. यही जिज्ञासा फिल्म की रचनात्मक दिशा तय करती है.

नरसिंह लीला को समझाने से ज्यादा उसके अनुभव के करीब पहुंचने की है. उस क्षण के करीब, जब कलाकार अपनी भूमिका को सिर्फ अभिनय के रूप में नहीं देखता. प्रज्ञा कहती हैं कि वो जयपुर से हैं, लेकिन उन्हें नही पता था कि पुराने शहर में इस तरह की अद्भुत नरसिंह लीला निकलती है. जब जयपुर की होने के बावजूद वो इस जानकारी से अछूती रहीं. हालांकि, युवाओं की एक बहुत बड़ी तादाद है, जिन्हें इस तरह की संस्कृति की जानकारी होनी चाहिए. ये फिल्म उसी दिशा में उठाया गया एक कदम है

जयपुर की कहानी, दुनिया के लिए सार्वभौमिक सवाल : इस डॉक्यूमेंट्री की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक यही है कि इसका विषय स्थानीय होते हुए भी उसका सवाल वैश्विक है. दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों में इंसान ने सदियों से मुखौटों, अनुष्ठानों, अभिनय और प्रतीकों के जरिए अपने विश्वास को अभिव्यक्त किया है. 'द फेस ऑफ गॉड' इसी व्यापक मानवीय अनुभव से जयपुर की नरसिंह लीला को जोड़ती है.

फिल्म की प्रोड्यूसर प्रज्ञा राठौड़ का अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माण से जुड़ा अनुभव इस परियोजना को एक अलग दिशा देता है. अमेरिका की Bowery Hills Entertainment के साथ कई अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स में काम करने के बाद उन्होंने जयपुर में K10 Tales Entertainment की शुरुआत की है. उन्होंने कहा कि हमारा फोकस राजस्थान की ऐसी कहानियों को सामने लाने पर है, जिनकी जड़ें स्थानीय संस्कृति में हों, लेकिन जिनकी संवेदना दुनिया के दर्शकों तक पहुंच सके.

'द फेस ऑफ गॉड' इसी सोच का एक उदाहरण है. यहां जयपुर को केवल एक लोकेशन के रूप में नहीं, बल्कि कहानी के जीवंत पात्र की तरह देखा गया है. उन्होंने कहा कि नीदरलैंड्स, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, स्पेन, संयुक्त राज्य अमेरिका सहित राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंचों पर इस फिल्म को लेकर जाएंगे.

राजस्थान में बनी, राजस्थान की प्रतिभाओं ने संवारी : फिल्म की एक खास परत इसका निर्माण भी है. रिसर्च और शूटिंग से लेकर संगीत और रचनात्मक कार्यों तक, प्रोजेक्ट में राजस्थान के कलाकारों और स्थानीय प्रतिभाओं को बड़ी संख्या में जोड़ा गया है. इससे फिल्म का स्वरूप केवल राजस्थान पर बनी फिल्म का नहीं, बल्कि राजस्थान के भीतर से तैयार हुई फिल्म का बनता है. फिल्म के अंतिम तकनीकी चरण मुंबई में पूरे किए जाएंगे. कहानी की जड़ें जयपुर में हैं, निर्माण का बड़ा हिस्सा राजस्थान में हुआ है और अब इसकी अगली यात्रा राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर की ओर है.

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लोक संगीत से अंतरराष्ट्रीय साउंडस्केप तक : प्रज्ञा राठौड़ ने बताया कि 'द फेस ऑफ गॉड' के संगीत की जिम्मेदारी बॉलीवुड म्यूजिक प्रोड्यूसर ऐकार्थ पुरोहित संभाल रहे हैं, जो द साबरमती रिपोर्ट से भी जुड़े रहे हैं. संगीत में राजस्थान की लोक परंपराओं की छाप दिखाई देगी. मांगणियार समुदाय के कलाकार हनीफा खान, जाकिर खान और नियाज भी इस संगीत यात्रा का हिस्सा हैं. उनकी आवाज और लोक-संगीत फिल्म के दृश्य संसार को जयपुर की मिट्टी से जोड़े रखते हैं. यहां संगीत महज बैकग्राउंड नहीं, बल्कि कहानी के वातावरण को निर्मित करने वाला माध्यम बनता है. लोकधुनों और आधुनिक सिनेमाई प्रस्तुति के मेल से फिल्म अपने स्थानीय चरित्र को बरकरार रखते हुए अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए एक नया श्रव्य अनुभव तैयार करने की कोशिश करती है.

अब जयपुर से बाहर निकलेगी कहानी : फिल्म का निर्देशन नंदिनी मित्तल ने किया है. नंदनी मित्तल कहती हैं कि फिल्म जयपुर और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ा एक व्यक्तिगत अनुभव भी है. उन्होंने कहा किआस्था मेरे लिए हमेशा एक सवाल रहा है. आखिर वह क्या है जो हमें उस चीज पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है, जिसे हम देख या पूरी तरह समझ नहीं सकते ? इस फिल्म के दौरान मैं विश्वास और अनुभव के बीच की उस जगह को समझने की कोशिश कर रही थी, जहां एक व्यक्ति खुद को पूरी तरह किसी ऐसी चीज के हवाले कर देता है, जिसे वह पूरी तरह परिभाषित नहीं कर सकता. शायद वहीं से समर्पण की शुरुआत होती है. 'द फेस ऑफ गॉड' अब अपने अगले चरण में प्रवेश कर रही है.

उन्होंने कहा कि फिल्म को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों, डॉक्यूमेंट्री प्लेटफॉर्म्स और भारत सहित विदेशों में होने वाली चुनिंदा सांस्कृतिक स्क्रीनिंग के लिए भेजने की तैयारी है. इसके साथ ही फिल्म को उन शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों तक पहुंचाने की योजना है, जहां लोक परंपराओं, प्रदर्शन कलाओं, आस्था, पहचान और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत पर शोध और विमर्श होता है. यह यात्रा केवल फिल्म की स्क्रीनिंग तक सीमित नहीं है. इसके जरिए जयपुर की नरसिंह लीला को उस बड़े विमर्श में शामिल करने की कोशिश है, जिसमें दुनिया की अलग-अलग जीवित परंपराओं को केवल अतीत की निशानी नहीं, बल्कि वर्तमान समाज और मानवीय अनुभव के सक्रिय हिस्से के रूप में देखा जाता है.

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