Special: केरोसिन की किल्लत से फीकी पड़ी 'कोटा डोरिया साड़ी' की चमक, उलझ रहे सिल्क के धागे, टूट रहे बुनकर!
Special: केरोसिन की किल्लत से फीकी पड़ी 'कोटा डोरिया साड़ी' की चमक, उलझ रहे सिल्क के धागे, टूट रहे बुनकर! केरोसिन की कमी से सिल्क धागों की मजबूती और कोटा डोरिया साड़ी की चमक अब फीकी पड़ रही है. मनीष गौतम की स्पेशल रिपोर्…

सौजन्य से:- ETV Bharat
Special: केरोसिन की किल्लत से फीकी पड़ी 'कोटा डोरिया साड़ी' की चमक, उलझ रहे सिल्क के धागे, टूट रहे बुनकर!
केरोसिन की कमी से सिल्क धागों की मजबूती और कोटा डोरिया साड़ी की चमक अब फीकी पड़ रही है. मनीष गौतम की स्पेशल रिपोर्ट.
Published : June 7, 2026 at 2:19 PM IST
कोटा:रेशम के धागे, सोने-चांदी के तार और उंगलियों का वो जादुई हुनर, इसी ताने-बाने से मिलकर तैयार होती है विश्वप्रसिद्ध कोटा डोरिया साड़ी, लेकिन अफसोस आज इन बुनकरों की उम्मीदें और धागे दोनों एक साथ टूट रहे हैं. केरोसिन न मिलने के चलते मजबूरन पानी का इस्तेमाल हो रहा है, जिसने धागों को उलझा दिया है और साड़ियों की चमक छीन ली है. काम की रफ्तार आधी रह गई है और बुनकरों का आर्थिक नुकसान दोगुना हो चुका है.
दुनिया भर में स्टेटस सिंबल मानी जाने वाली विश्वप्रसिद्ध 'कोटा डोरिया साड़ी' आज एक बड़े संकट के दौर से गुजर रही है. कॉटन और सिल्क के महीन धागों के साथ सोने और चांदी के तारों से बुनी जाने वाली इस अनूठी साड़ी की रौनक अब फीकी पड़ने लगी है. वजह बेहद व्यावहारिक है, हैंडलूम पर कताई और बुनाई के दौरान सिल्क के धागों को टूटने से बचाने और उन्हें साफ करने के लिए इस्तेमाल होने वाला केरोसिन (मिट्टी का तेल) बाजार से गायब है. केंद्र सरकार की 'एक जिला एक उत्पाद' योजना में शामिल होने के बावजूद, कोटा जिले के हजारों बुनकर इस समय केरोसिन न मिलने से बेहद परेशान चल रहे हैं.
इसे भी पढ़ें-Explainer : लाख रुपये कीमत, कोटा डोरिया साड़ी में दक्षिण के सिल्क के साथ पूर्वोत्तर का भी लगेगा एरी सिल्क...
सिल्क के लिए केरोसिन जरूरी: कोटा डोरिया हाड़ौती फाउंडेशन के पूर्व चेयरपर्सन और नेशनल अवॉर्डी बुनकर नसरुद्दीन अंसारी का कहना है कि ताना बाना केरोसिन के अभाव में मजबूत नहीं हो रहा है, जिस तरह कॉटन के धागे को मजबूत मांड लगाकर मजबूती दी जाती है, जिसमें प्याज के रस, चावल या आटा से यह किया जाता है, वहीं सिल्क के धागे को मजबूती मांड लगाकर नहीं दी जाती है. मांड से उसकी चमक कमजोर हो जाती है. इस चमक को बरकरार रखने के लिए केरोसिन का उपयोग किया जाता है.
हर महीने 500 लीटर की जरूरत: नसरुद्दीन अंसारी ने बताया कि पूरे कैथून में करीब 2500 से 3000 साड़ियां 1 महीने में तैयार हो रही है. ऐसे में करीब 500 लीटर के आसपास केरोसिन की आवश्यकता बुनकरों को पड़ती है. नसरुद्दीन अंसारी का कहना है कि आने वाले दिनों में सरकार पूर्वोत्तर राज्यों के एरी सिल्क का उपयोग करने की सलाह दे रहा है. यह बैंगलोर से आने वाले सिल्क से भी पतला होता है और इसमें मजबूती भी कम होती है, जिससे समस्या ज्यादा होगी और केरोसिन की सख्त जरूरत है.
इसे भी पढ़ें-पूर्वोत्तर का 'एरी सिल्क' और राजस्थान का 'कोटा डोरिया' आएंगे साथ: वैश्विक स्तर पर बढ़ेगा भारतीय हथकरघा
दूसरे राज्यों से लेकर आ रहे:अफरोज बानो का कहना है कि राजस्थान में केरोसिन नहीं मिलता है, ऐसे में कई बार दूसरे राज्यों से यह लाना पड़ता है. महंगा भी काफी होता है, जहां पर पहले 30 से 40 रुपए लीटर केरोसिन उन्हें मिल जाया करता था, लेकिन अब यह केरोसिन 300 रुपए लीटर से भी ज्यादा आ रहा है, यहां तक की आने और जाने का भाड़ा भी उन्हें वहन करना पड़ता है. अधिकांश बुनकर इसको लेने के लिए जाते हैं और वहां से इसे लेकर आते हैं.
हर स्तर पर पहुंचा दी है बात: नसरुद्दीन अंसारी का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में जिला अधिकारियों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी बात को पहुंचा दिया है, जिसमें जिला उद्योग केंद्र के अधिकारी, जिला प्रशासन, राजस्थान सचिवालय से लेकर मंत्रियों तक भी बात कर ली है. यहां तक की केंद्रीय टैक्सटाइल मंत्रालय तक भी अधिकारियों से बातचीत की है, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला है. राज्य सरकार के अधिकारियों से जब बात की जाती है तो वह कहते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली केंद्र सरकार के अधीन है. ऐसे में हम मांग करते हैं की पीडीएस सिस्टम के तहत कोटा जिले के बुनकरों को यह लाभ दिलाया जाए, ताकि यहां की साड़ी की चमक फीकी ना हो. सिल्क के धागे को पानी में डालने से इसकी चमक वर्तमान में फीकी हो रही है.
इसे भी पढ़ें-Kota Doria Challenges: पावरलूम बना चुनौती, लाखों की साड़ी बनाने वाले 2 जून रोटी को मोहताज
पांच साड़ी के लिए 1 लीटर केरोसिन:कैथून के बुनकर अख्तर हुसैन का कहना है कि पांच साड़ी तैयार करने में करीब 1 लीटर के आसपास केरोसिन की आवश्यकता पड़ती है. हालांकि, पांच साड़ी बनाने में ही काफी समय लग जाता है. 15 दिन से डेढ़ महीने तक का समय एक साड़ी में लगता है. इस बीच केरोसिन उड़ भी जाता है. सिल्क का धागा मजबूत केरोसिन से ही होता है. चमक भी इसी से आती है. सिल्क के धागे को बोनिन (गिट्टी) में भरने के बाद केरोसिन में गला दिया जाता है, फिर उसको धूप में सुखाया जाता है, ताकि अच्छी चमक आ जाए. इसके बाद धागा उलझता नहीं है और चिपकता भी नहीं है.
पानी का उपयोग करने से आ रही समस्या:बुनकरअफरोज बानो ने बताया कि केरोसिन नहीं मिलने पर पानी से काम चलाना पड़ता, जिसमें कई समस्याएं आती हैं. लूम पर धागा उलझता भी है और टूटता भी है, साड़ी में भी चमक नहीं आ रही है. पानी में बोनिन को छोड़ने पर वह उलझ जाती है या फिर चिपककर चलती है, जिसे भी धागा टूट जाता है. हमने कई बार पिता को बोला है कि केरोसिन को ही लेकर आए, अब दूसरे राज्यों से लेकर आ रहे हैं और काम चला रहे हैं. अच्छी साड़ी बनने के लिए केरोसिन की काफी जरूरत है.
इसे भी पढ़ें-Theft of Kota Doria Sarees : लाखों रुपए की कोटा डोरिया की साड़ियां चुरा ले गई साउथ गैंग, सीसीटीवी में हुई कैद
बुनकर आकर मिले तो सरकार तक पहुंचाएं बात: इस पूरे मामले पर कोटा जिले के रसद अधिकारी कार्तिकेय मीणा से ईटीवी भारत में बातचीत की. मीणा का कहना है कि उनके पास अभी तक किसी ने भी इस संबंध में संपर्क नहीं किया है. हालांकि, पूरे राजस्थान में ही राज्य सरकार ने केरोसिन को बंद कर दिया है, प्रदेश को केरोसिन मुक्त किया गया है. इसी के चलते केरोसिन की सप्लाई नहीं हो रही है. कोटा डोरिया एक जिला एक उत्पाद में भी शामिल है. ऐसे में अगर बुनकर या उनकी कोई संस्था हमसे संपर्क करती है तो उच्च अधिकारियों से बातचीत करेंगे. इस संबंध में हम राज्य सरकार को अवगत कराएंगे. हो सकता है, इसका कोई समाधान निकल जाए, फिलहाल मुझे किसी ने संपर्क नहीं किया है.
साफ है कि पानी का उपयोग बुनकरों की मजबूरी है, लेकिन यह मजबूरी उनके समय, पैसे और कला तीनों को भारी नुकसान पहुंचा रही है. आधुनिक दौर में जब हस्तशिल्प को बढ़ावा देने की बात हो रही है, तब केरोसिन जैसी बुनियादी जरूरत का न मिलना इस कुटीर उद्योग की रफ्तार को रोक रहा है. प्रशासन को जल्द ही इसका कोई स्थायी या वैज्ञानिक विकल्प बुनकरों को देना होगा.
इसे भी पढ़ें-जयपुर: सोने और चांदी से बनी कांजीवरम हैंडमेड साड़ी, जिसके दाम सुनकर आप चौंक जाएंगे
Powered by Reporting Rajasthan Files
संबंधित ख़बरें

89K views · 2.2K reactions | राजस्थान के झुंझुनूं ज़िले का एक गांव, इस्लामपुर, इन दिनों प्रदेश की राजनीति और सामाजिक बहस का केंद्र बना हुआ है. गांव का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने की मांग हो रही है. इसकी चर्चा गांव की गलियों से लेकर राजधानी जयपुर तक है. रिपोर्टः मोहर सिंह मीणा वीडियो एडिटिंगः निमित वत्स | BBC News हिन्दी

जयपुर: पाकिस्तान तक फेसबुक से बना कॉन्टेक्ट, कलमा पढ़कर बनी 'खदीजा', महिला स्लीपर सेल गिरफ्तार

जयपुर के न्यू सांगानेर रोड पर जाम खत्म करने का ब्लूप्रिंट तैयार; 24 करोड़ होंगे खर्च


