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Sawan 2026 : जयपुर का रामेश्वर मंदिर, जहां एकल शिवलिंग की होती है आराधना, आज भी कुएं के जल से होता है अभिषेक

Sawan 2026 : जयपुर का रामेश्वर मंदिर, जहां एकल शिवलिंग की होती है आराधना, आज भी कुएं के जल से होता है अभिषेक प्राचीन रामेश्वर मंदिर...जिसका इतिहास राजघराने से जुड़ा हुआ है. पूजा पद्धति अलग परंपराओं को संजोए हुए है. अंकुर…

ETV Bharat के अनुसार25 अगस्त 2026 को 03:55 am बजे
Sawan 2026 : जयपुर का रामेश्वर मंदिर, जहां एकल शिवलिंग की होती है आराधना, आज भी कुएं के जल से होता है अभिषेक

सौजन्य से:- ETV Bharat

Sawan 2026 : जयपुर का रामेश्वर मंदिर, जहां एकल शिवलिंग की होती है आराधना, आज भी कुएं के जल से होता है अभिषेक

प्राचीन रामेश्वर मंदिर...जिसका इतिहास राजघराने से जुड़ा हुआ है. पूजा पद्धति अलग परंपराओं को संजोए हुए है. अंकुर जाकड़ की रिपोर्ट...

Published : August 25, 2026 at 8:41 AM IST

जयपुर: आपने तमिलनाडु के रामेश्वरम का नाम तो जरूर सुना होगा, लेकिन जयपुर में भी एक ऐसा प्राचीन रामेश्वर मंदिर है, जिसका इतिहास राजघराने से जुड़ा हुआ है और जिसकी पूजा पद्धति आज भी अपनी अलग परंपराओं को संजोए हुए है. सावन के अवसर पर ईटीवी भारत की टीम जयपुर के इसी ऐतिहासिक रामेश्वर मंदिर पहुंची और मंदिर की मान्यताओं, परंपराओं और इतिहास को करीब से जाना.

सवाई राम सिंह ने कराई थी शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा : रामेश्वर मंदिर का निर्माण जयपुर के तत्कालीन शासक सवाई राम सिंह के समय हुआ था. आमेर में स्थित इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के एकलिंग स्वरूप की प्राण प्रतिष्ठा कराई गई थी. मंदिर के पुजारी सुरेश कुमार शर्मा ने बताया कि यहां भगवान शिव एकल स्वरूप में विराजमान हैं. मंदिर परिसर में माता पार्वती, भगवान गणेश और नंदी के विग्रह जरूर हैं, लेकिन सभी अलग-अलग स्थानों पर विराजमान हैं, जबकि भगवान कार्तिकेय का विग्रह यहां मौजूद नहीं है. यही विशेषता इस मंदिर को पारंपरिक शिव पंचायत वाले मंदिरों से अलग बनाती है.

दक्षिणमुखी जलहरी, तंत्र साधना से जुड़ी मान्यता : रामेश्वर मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में से एक यहां स्थित दक्षिणमुखी जलहरी है. पुजारी के अनुसार जयपुर के इस प्राचीन मंदिर की पूजा परंपरा का संबंध राजा सवाई राम सिंह की तंत्र साधना में आस्था से भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि दक्षिणमुखी जलहरी वाले शिवलिंग की आराधना तंत्र साधना के लिए विशेष मानी जाती रही है. मंदिर में इसी परंपरा के चलते भगवान शिव की विशेष साधना की जाती थी. स्थानीय मान्यता में इसे अकाल मृत्यु से बचाव से भी जोड़कर देखा जाता है.

प्राचीन कुआं आज भी मंदिर की पहचान : मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआं भी मौजूद है. इस कुएं का जल मंदिर की पूजा परंपरा का अहम हिस्सा रहा है. बताया जाता है कि सवाई राम सिंह स्वयं इसी कुएं के जल से भगवान भोलेनाथ का अभिषेक किया करते थे और इस जल का इस्तेमाल पीने के लिए भी करते थे. आज भी मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालु इसी प्राचीन कुएं से निकाले गए जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं. श्रद्धालु तेज प्रकाश अग्निहोत्री बताते हैं कि स्थानीय लोगों के बीच इस कुएं के जल को गंगा स्वरूप मानने की मान्यता भी है.

चारों ओर बेलपत्र के पेड़, इन्हीं से होती है शिव की सेवा : मंदिर परिसर की प्राकृतिक खूबसूरती भी इसे खास बनाती है. मंदिर के चारों ओर बड़ी संख्या में बेलपत्र के पेड़ मौजूद हैं. भगवान शिव को बेलपत्र अत्यंत प्रिय माना जाता है. ऐसे में श्रद्धालुओं को पूजा के लिए बेलपत्र भी मंदिर परिसर में ही उपलब्ध हो जाते हैं. मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इन्हीं पेड़ों से बेलपत्र लेकर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं. परिसर में बेलपत्र के अलावा अशोक के पेड़ भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं. पुराने समय में यहां केले के पेड़ों और सुंदर बगीची का भी उल्लेख मिलता है. हालांकि, समय के साथ मंदिर परिसर का स्वरूप बदलता गया.

महिलाओं के लिए अलग पूजा परंपरा : रामेश्वर मंदिर की सबसे अलग परंपराओं में से एक महिलाओं की पूजा से जुड़ी है. मंदिर की मान्यता के अनुसार महिलाएं सामान्य तौर पर यहां मुख्य शिवलिंग का जलाभिषेक नहीं करतीं. हालांकि, महिलाएं भगवान भोलेनाथ के दर्शन कर सकती हैं. पुजारी सुरेश कुमार शर्मा के अनुसार किसी विशेष अनुष्ठान, रुद्राभिषेक, सहस्त्रघट या मन्नत पूरी होने के अवसर पर महिलाएं विशेष अनुमति और परंपरा के अनुसार भगवान शिव का जलाभिषेक करती हैं.

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स्थानीय मान्यता के मुताबिक जिन मंदिरों में भगवान भोलानाथ 'शिव पंचायत' के साथ विराजमान होते हैं. वहां महिलाओं की सेवा-पूजा की अलग परंपरा है, जबकि एकल शिवलिंग वाले मंदिरों में पूजा की ये परंपरा अलग मानी जाती है. इसी मान्यता के चलते रामेश्वर मंदिर में भी ये परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. हालांकि, इसमें महिलाओं से आग्रह ही किया जाता है.

पुरुष पारंपरिक परिधान में करते हैं गर्भगृह में पूजा : मंदिर की एक और परंपरा है कि पुरुष श्रद्धालु पारंपरिक परिधान में ही गर्भगृह में जाकर भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं. श्रद्धालुओं के अनुसार ये परंपरा मंदिर की प्राचीन पूजा व्यवस्था का हिस्सा रही है और आज भी कई श्रद्धालु इसका पालन करते हैं. वहीं, मंदिर में अलग से विराजमान माता पार्वती के विग्रह की महिलाएं पूजा और शृंगार कर सकती हैं.

इस तरह मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा को लेकर अलग-अलग पारंपरिक व्यवस्थाएं देखने को मिलती हैं. मंदिर में नियमित आने वाली श्रद्धालु वंदना शर्मा ने बताया कि ये आमेर क्षेत्र के प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है, लेकिन मुख्य शिवलिंग पर जलाभिषेक को लेकर पुरानी परंपरा है, जिसके चलते जलाभिषेक महिलाओं के लिए निषेध बताया गया है. हालांकि, माता पार्वती के अलग विग्रह का महिलाएं शृंगार और पूजन जरूर करती हैं.

सावन में रुद्राभिषेक और सहस्त्रघट का आयोजन : सावन के महीने में रामेश्वर मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं. रुद्राभिषेक और सहस्त्रघट जैसे अनुष्ठानों में श्रद्धालु शामिल होते हैं. इसके अलावा महाशिवरात्रि पर भी यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है. मंदिर में पौष बड़ा, अन्नकूट प्रसादी और जन्माष्टमी के अवसर पर भी आयोजन होते हैं. होली के मौके पर स्थानीय लोगों की ओर से भांग घोटकर पारंपरिक ठंडाई तैयार करने की परंपरा भी बताई जाती है. वहीं, मंदिर के बाहर स्थित चौक में तमाशा शैली के पारंपरिक मंचन भी होते आएं हैं.

देवस्थान विभाग के अधीन है मंदिर : बहरहाल, वर्तमान में रामेश्वर मंदिर राजस्थान सरकार के देवस्थान विभाग के अधीन है. समय के साथ मंदिर परिसर में कई बदलाव हुए हैं, लेकिन इसके प्राचीन स्वरूप और पूजा परंपराओं को बचाए रखने की कोशिश जारी है. आज भी सावन में यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं, प्राचीन कुएं के जल से भगवान शिव का अभिषेक करते हैं, परिसर के बेलपत्र से भगवान की पूजा करते हैं और मंदिर से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताओं का निर्वहन भी करते हैं.

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