भारत का अदृश्य दुनिया में तेजी से डिजिटलीकरण: मानवेंद्र सिंह शेखावत का रोमांचक सफर
जयपुर के मानवेंद्र सिंह शेखावत ने भारत में अदृश्य पगडंडियों को डिजिटल नक्शे पर लाने का बीड़ा उठाया है. उन्होंने भारत में करीब 14,000 किलोमीटर से अधिक पैदल यात्रा की और 5,000 किलोमीटर के ट्रेल्स को ओपनस्ट्रीटमैप पर दर्ज किया. उनका लक्ष्य भारत में सुरक्षित, सुलभ और जिम्मेदार हाइकिंग संस्कृति विकसित करना है.

सौजन्य से:- ETV Bharat
गुमनाम पगडंडियों को डिजिटल नक्शे पर ला रहे जयपुर के मानवेंद्र सिंह शेखावत, भारत को बना रहे 'हाइकिंग डेस्टिनेशन'
राजस्थान के मानवेंद्र गुमनाम जगह पर हाइकिंग डेस्टिनेशन तलाश रहे हैं. पेश है अश्विनी पारीक की रिपोर्ट.
Published : July 7, 2026 at 7:06 AM IST
जयपुर : भारत के पहाड़ों, जंगलों और दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में सदियों से इस्तेमाल हो रही हजारों पारंपरिक पगडंडियां आज भी मौजूद हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश किसी आधिकारिक नक्शे या गाइडबुक में दर्ज नहीं हैं. इन्हीं 'अदृश्य ट्रेल्स' को डिजिटल दुनिया में पहचान दिलाने का बीड़ा उठाया है. जयपुर के स्पीड हाइकर, ट्रेल मैपर और आउटडोर एजुकेटर मानवेंद्र सिंह शेखावत (मानव) ने. उनका मकसद सिर्फ ट्रेल्स को मैप करना नहीं, बल्कि भारत में सुरक्षित, सुलभ और जिम्मेदार हाइकिंग संस्कृति विकसित करना है.
400 फीट ऊंची चट्टानों से लेकर हजारों किमी की पदयात्रा तक : मानवेंद्र का सफर किसी रोमांचक फिल्म की कहानी जैसा है. महाराष्ट्र के सह्याद्रि पर्वतों की लगभग 400 मीटर (करीब 1,300 फीट) ऊंची ज्वालामुखीय चट्टानों से उतरते समय उनके सामने सुरक्षा रेलिंग जैसी कोई सुविधा नहीं होती. केवल पत्थरों में बने पुराने पैरों के निशान और सदियों पहले लगाए गए लोहे के खूंटे ही सहारा बनते हैं. एक मील से कुछ अधिक दूरी तय करने में उन्हें चार घंटे तक लग जाते हैं.
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दिनभर की कठिन पदयात्रा के बाद भी उनका काम खत्म नहीं होता. रात में वे जीपीएस ट्रैक साफ करते हैं, फील्ड नोट्स अपडेट करते हैं. भू-भाग का डेटा सिंक करते हैं और अगले दिन की यात्रा की योजना बनाते हैं. उनके लिए जंगल और पहाड़ केवल रोमांच नहीं, बल्कि जीवन और काम दोनों हैं. उन्होंने ईटीवी भारत को बताया कि करीब 2000 किलोमीटर का सफर उन्होंने 70 दिन की मियाद में पूरा किया है.
इंजीनियरिंग और सिविल सर्विस छोड़ चुना पहाड़ों का रास्ता : मानवेंद्र बताते हैं कि उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी की, लेकिन उनका मन कहीं नहीं लगा. पहाड़ों के प्रति बढ़ते आकर्षण ने उन्हें पूरी तरह नई दिशा दी. उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी छोड़कर पर्वतारोहण का प्रशिक्षण लिया और हैदराबाद में दोस्तों के साथ ट्रेकिंग क्लब शुरू किया. यहीं से उन्हें एहसास हुआ कि हल्के सामान के साथ लंबी दूरी की तेज पदयात्रा संभव है. मात्र 10 लीटर के डे-पैक के साथ वे चार दिन के ट्रेक को एक दिन में पूरा करने लगे. यही अनुभव आगे चलकर उनके ट्रेल मैपिंग मिशन की नींव बना.
भारत का पहला स्वतंत्र हाइकिंग फील्ड कोर्स : मानवेंद्र ने 'हाइकिंग फील्ड कोर्स' की स्थापना की, जिसे भारत का पहला स्वतंत्र रूप से संचालित सप्ताहभर का आउटडोर प्रशिक्षण कार्यक्रम माना जाता है. इसमें प्रतिभागियों को नेविगेशन, कैंपिंग, रूट प्लानिंग, जंगल में सुरक्षा, मौसम की समझ और आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने जैसी व्यावहारिक ट्रेनिंग दी जाती है. उनका मानना है कि भारत में लोग प्रकृति से प्रेम तो करते हैं, लेकिन सुरक्षित तरीके से जंगल और पहाड़ों में घूमने के लिए आवश्यक कौशल की कमी है. उनका मकसद लोगों को आत्मनिर्भर और जिम्मेदार हाइकर बनाना है.
14 हजार किलोमीटर से अधिक की पदयात्रा : पिछले एक दशक में मानवेंद्र भारत, नेपाल और इंडोनेशिया में लगभग 14,000 किलोमीटर से अधिक पैदल यात्रा कर चुके हैं. इनमें से करीब 5,000 किलोमीटर के ट्रेल्स उन्होंने ओपनस्ट्रीटमैप पर डिजिटल रूप से दर्ज किए हैं. उन्होंने लद्दाख और लाहौल क्षेत्र की लगभग 20 ऊंचाई वाली झीलों और 6,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली 21 पर्वत चोटियों का भी विस्तृत मैप तैयार किया है. इन डिजिटल नक्शों का उपयोग भविष्य में हाइकर्स, शोधकर्ताओं और बचाव दलों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है.
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गांवों की सदियों पुरानी पगडंडियां हैं सबसे बड़ा खजाना : मानवेंद्र का कहना है कि भारत में हजारों ऐसे रास्ते हैं, जिनका उपयोग सदियों से ग्रामीण समुदाय करते आ रहे हैं. ये रास्ते लकड़ी लाने, मवेशी चराने, धार्मिक यात्राओं और गांवों के बीच आवाजाही के लिए बनाए गए थे. उनके मुताबिक यही पारंपरिक रास्ते भविष्य में भारत के सबसे बड़े हाइकिंग नेटवर्क बन सकते हैं. पश्चिमी देशों की तरह भारत में फ्रंट कंट्री और बैक कंट्री की स्पष्ट सीमाएं नहीं हैं. यहां गांवों को जोड़ने वाली जीवित पगडंडियां ही वास्तविक ट्रेल सिस्टम हैं.
HikeX बना रहा देश का सबसे बड़ा ट्रेल नेटवर्क : साल 2023 में मानवेंद्र ने अपने मित्र शुभ्रांक मुखिया के साथ मिलकर HikeX की शुरुआत की. यह एक ऑनलाइन समुदाय है, जिसका उद्देश्य ट्रेल मैपिंग, आउटडोर शिक्षा और सुरक्षित हाइकिंग को बढ़ावा देना है. HikeX की टीम किसी भी ट्रेल का केवल जीपीएस ट्रैक रिकॉर्ड नहीं करती, बल्कि रास्ते में आने वाले जल स्रोत, कैंपिंग स्थल, आश्रय स्थल, खतरे वाले हिस्से और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां भी दर्ज करती है. इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा स्थानीय लोगों से बातचीत है. गांवों के बुजुर्ग और अनुभवी चरवाहे अक्सर ऐसे रास्तों की जानकारी देते हैं जो किसी भी नक्शे में दर्ज नहीं हैं.
गायब हो रही हैं सदियों पुरानी पगडंडियां : मानवेंद्र के अनुसार भारत की अनेक ऐतिहासिक पगडंडियां आज दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं. एक ओर उन पर सड़कें बन रही हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण आबादी शहरों की ओर पलायन कर रही है. जब इन रास्तों पर लोगों का आना-जाना बंद हो जाता है तो धीरे-धीरे जंगल उन्हें ढक लेते हैं और वे हमेशा के लिए गायब हो जाते हैं. उनका मानना है कि इन ट्रेल्स का दस्तावेजीकरण समय की सबसे बड़ी जरूरत है.
2,000 किलोमीटर लंबा 'एपिक सह्याद्रि ट्रेल' : इसी सोच के तहत HikeX ने अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है 'एपिक सह्याद्रि ट्रेल' (EST). करीब 2,033 किलोमीटर लंबा यह पैदल मार्ग महाराष्ट्र के सह्याद्रि पर्वतों के समानांतर अरब सागर के तट के साथ चलता है. यह पश्चिमी घाट की जैव विविधता, घने मानसूनी जंगलों, ज्वालामुखीय चट्टानों, झरनों और मराठा काल के ऐतिहासिक किलों को जोड़ता है. मानवेंद्र ने इस पूरे मार्ग का सर्वेक्षण मात्र 70 दिनों में पूरा किया. इस दौरान उन्होंने 93,288 मीटर की कुल ऊंचाई चढ़ी, जिसे वे समुद्र तल से हर सप्ताह एवरेस्ट शिखर तक पहुंचने के बराबर बताते हैं.
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हर किसी के लिए बनाया गया ट्रेल : हालांकि, EST सुनने में बेहद चुनौतीपूर्ण लगता है, लेकिन इसे केवल अनुभवी साहसिक यात्रियों के लिए नहीं बनाया गया है. पूरे मार्ग को 11 सेक्शन और 40 चरणों में विभाजित किया गया है ताकि शुरुआती हाइकर भी अपनी क्षमता के अनुसार छोटे हिस्सों में इसे पूरा कर सकें. HikeX इसके लिए एक ऑनलाइन एक्सपीडिशन प्लेटफॉर्म भी तैयार कर रहा है, जिसमें ट्रेल नोट्स, संभावित खतरे, ऑडियो गाइड, विस्तृत रूट मैप और 40 भागों की निःशुल्क वॉकथ्रू सीरीज उपलब्ध होगी.
गांवों में विकसित होगी नई अर्थव्यवस्था : मानवेंद्र का सपना है कि 'एपिक सह्याद्रि ट्रेल' भारत का सबसे बड़ा होमस्टे ट्रेक बने. उनके अनुसार हाइकर हर शाम किसी गांव में ठहर सकेंगे, स्थानीय भोजन का स्वाद लेंगे और अगले दिन फिर यात्रा शुरू करेंगे. इससे गांवों में होमस्टे, स्थानीय गाइड, भोजन और परिवहन जैसी नई आर्थिक गतिविधियां विकसित होंगी. साथ ही यात्रियों को स्थानीय संस्कृति, बोली, खानपान, पारंपरिक घरों और ग्रामीण जीवन को करीब से समझने का अवसर मिलेगा.
पर्यटन और बचाव व्यवस्था दोनों को मिलेगा लाभ : मानवेंद्र मानते हैं कि ट्रेल मैपिंग केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है. किसी ट्रेल पर कोई दुर्घटना होती है तो डिजिटल मैपिंग के कारण बचाव दल सटीक स्थान तक जल्दी पहुंच सकता है. ट्रेल मैपिंग भविष्य की आपदा एवं रेस्क्यू व्यवस्था की भी मजबूत आधारशिला बन सकती है. इसी उद्देश्य से वे अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से देशभर में ट्रेल मैपर्स की नई पीढ़ी तैयार कर रहे हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता की मांग : मानवेंद्र और उनकी टीम चाहते हैं कि 'एपिक सह्याद्रि ट्रेल' को अमेरिका के National Scenic Trails System की तर्ज पर राष्ट्रीय पर्यटन धरोहर का दर्जा मिले. उनका मानना है कि यदि इस मॉडल को पूरे भारत में लागू किया जाए तो देश में हजारों किलोमीटर लंबा ट्रेल नेटवर्क विकसित हो सकता है, जिससे साहसिक पर्यटन, ग्रामीण रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय संस्कृति—चारों क्षेत्रों को नई पहचान मिले. उनका भरोसा है कि भारत में प्रकृति की कोई कमी नहीं है. जरूरत केवल उन रास्तों को पहचानने, सुरक्षित बनाने और दुनिया के सामने लाने की है, जिन पर सदियों से लोग चलते आ रहे हैं, लेकिन जो आज भी अधिकांश नक्शों से गायब हैं.
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