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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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सरकार ने हाईकोर्ट में बताई पंचायत-निकाय चुनाव की तारीख:ओबीसी आयोग 5 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट देगा, जानें- कब से हो सकती है वोटिंग
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राजस्थान में लंबे समय से पंचायत-निकाय चुनाव की घोषणा को लेकर इंतजार किया जा रहा था। वो इंतजार आज खत्म हो गया है। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद आज सरकार ने पंचायत और निकाय चुनाव की डेट और शेड्यूल को कोर्ट के सामने रखा। इसके अनुसार अगस्त में प्रक्रिया शुरू
हाईकोर्ट ने सरकार के जवाब पर कहा कि हमें चुनाव की तारीख जाननी है। इस पर सरकार ने कहा कि 17 अगस्त को निकाय चुनाव की घोषणा कर देंगे और 23 सितंबर को पंचायत चुनाव की घोषणा हो जाएगी। पहले निकाय चुनाव होंगे और उसके बाद पंचायत चुनाव होंगे।
ओबीसी आयोग 5 अगस्त तक सब्मिट करेगा रिपोर्ट
स्वायत्त शासन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर ने कोर्ट मे जवाब पेश करते हुए कहा- कोर्ट के 16 जुलाई के आदेश की पालना में शनिवार को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित हुई। इसमें राज्य चुनाव आयोग के सचिव, ओबीसी आयोग सचिव, स्वायत्त शासन विभाग और पंचायतीराज विभाग के सचिव शामिल हुए।
बैठक में तय किया गया कि ओबीसी आयोग 5 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट सब्मिट करेगा। इसके बाद स्वायत्त शासन विभाग और पंचायतीराज विभाग 15 अगस्त तक एससी-एसटी, ओबीसी और महिला आरक्षण की लॉटरी निकालेंगे।
लॉटरी निकालने की डेट से राज्य चुनाव आयोग 90 दिन में प्रदेश में पंचायत-निकाय चुनाव करा लेगा। अगर हाईकोर्ट इस शेड्यूल को स्वीकार कर लेता है तो 15 नवंबर तक अलग-अलग चरणों में वोटिंग हो सकती है।
बता दें कि प्रदेश में पंचायत चुनावों में देरी को लेकर गिर्राज सिंह देवंदा और निकाय चुनाव में देरी को लेकर पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने जनहित याचिका दायर की थी।
मुख्यमंत्री हार के डर से चुनाव नहीं करवा रहे थे
पंचायत निकाय चुनाव को लेकर याचिकाकर्ता रहे पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने कहा- दिल्ली में छात्रसंघ चुनाव हो रहे हैं, लेकिन यहां नहीं हो रहे हैं। गुजरात, हरियाणा और अन्य राज्यों में पंचायत-निकाय चुनाव हो रहे हैं। लेकिन यहां कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री को डरा रखा है कि पंचायत-निकाय चुनाव के परिणाम विपरीत आएंगे और आपको पद से हटा दिया जाएगा। इस डर से सरकार किसी न किसी बहाने से चुनाव टाले जा रही थी।
संयम लोढ़ा ने कहा- मुख्यमंत्री को यह समझना चाहिए कि इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों के कारण हर पांच साल में चुनाव होने पर वह स्वयं सरपंच बन पाए थे। ऐसे में उन्हें समय पर चुनाव कराकर दूसरों को भी मौका देना चाहिए था।
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