दुर्लभ लौडांकिया सर्प का फिर से दर्शन: जानिए इसकी विशेषताएं और जैविक महत्व
उदयपुर के उबेश्वर में दुर्लभ लौडांकिया वाइन स्नेक को देखा गया है, जो 30 साल बाद दिखाई दिया है। इसकी विशेषताएं और जैविक महत्व पर चर्चा करने से पहले

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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उदयपुर के उबेश्वर में दिखा दुर्लभ 'लौडांकिया सांप:30 साल बाद फिर दिखा दुर्लभ वाइन स्नेक, जानिए क्या है खासियत
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उदयपुर के उबेश्वर क्षेत्र में 12 जुलाई को दुर्लभ सर्प प्रजाति लौडांकिया वाइन स्नेक को देखा गया है। इस दुर्लभ प्रजाति के सर्प को 30 साल पहले भी देखा गया था।
दुर्लभ सर्प को उदयपुर के वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर रोहित द्विवेदी ने शरद अग्रवाल और दीपाल कालरा के साथ कैमरे में कैद किया। रिटायर्ड वन अधिकारी और वन्यजीव एक्सपर्ट डा. सतीश कुमार शर्मा ने 30 वर्ष पहले इसे उदयपुर में ही देखा और कैमरे में रिकॉर्ड किया था।
डॉ. सतीश शर्मा ने बताया कि उन्होंने 30 साल पहले इसे उदयपुर की फुलवारी की नाल में देखा था। इसके साथ ही उन्होंने माउंट आबू और कुंभलगढ़ में भी उस समय ऐसा सांप देखा था। वे बताते हैं कि यह बहुत दुर्लभ है और बहुत तेजी से भागता है। ये पेड़ों पर ही रहता है। उन्होंने बताया कि इसका वैज्ञानिक नाम ‘अहेतुल्ला’ है।
रोहित द्विवेदी ने बताया कि लौडांकिया वाइन स्नेक भारत में पाई जाने वाली वाइन स्नेक की एक दुर्लभ प्रजाति है, जिसका वैज्ञानिक विवरण 2019 में प्रकाशित हुआ था। इसका प्राकृतिक विस्तार पूर्वी घाट से मध्य भारत होते हुए पूर्वी राजस्थान तक माना जाता है। राजस्थान में इसके रिकॉर्ड अत्यंत सीमित होने के कारण इसे यहां दुर्लभ प्रजातियों में शामिल किया जाता है।
डा. सतीश कुमार शर्मा ने बताया कि यह सर्प अपने अत्यंत पतले, लंबे एवं बेल जैसी आकृति वाले शरीर के कारण आसानी से पहचाना जाता है। इसका रंग सामान्यतः चेस्टनट ब्राउन होता है, जिस पर काले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जबकि सिर के निचले भाग पर हल्के सफेद पैच इसकी विशिष्ट पहचान हैं। इसकी लंबी एवं नुकीली थूथन, बड़ी आंखें तथा क्षैतिज पुतलियां इसे अन्य सर्पों से अलग बनाती हैं। वयस्क सर्प की लंबाई सामान्यतः 80 सेंटीमीटर से 1.5 मीटर तक होती है।
उन्होंने बताया कि यह दिन में सक्रिय तथा वृक्षों और झाड़ियों पर रहने वाला सर्प है, जो शुष्क पर्णपाती वनों, झाड़ीदार क्षेत्रों, पहाड़ी ढलानों एवं प्राकृतिक हरित आवासों में पाया जाता है। इस सांप में जहर कम होता है। यह बेहद खूबसूरत और आकर्षक होता है। ये अमूमन पेड़ों पर पाए जाते हैं। छोटे कीड़े, छिपकली, बर्ड्स एग इनके मुख्य आहार हैं। सामान्य परिस्थितियों में मनुष्यों के लिए गंभीर रूप से खतरनाक नहीं माना जाता। यह स्वभाव से शांत होता है तथा खतरा महसूस होने पर स्वयं को छिपाने का प्रयास करता है।
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर रोहित द्विवेदी ने बताया कि वन्यजीव फोटोग्राफी का उद्देश्य केवल दुर्लभ जीवों की तस्वीरें लेना नहीं, बल्कि उनका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण कर जैव विविधता संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना भी है। उन्होंने कहा कि उबेश्वर क्षेत्र अरावली की समृद्ध जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र है और यहां ऐसी दुर्लभ प्रजातियों का मिलना इस क्षेत्र के प्राकृतिक महत्व को दर्शाता है।
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