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उदयपुर भी मानसून के बारे में चिंतित, पानी की समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा रहा ह?

उदयपुर को झीलों का शहर कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि आज यही शहर अपनी प्यास को लेकर सबसे अधिक असुरक्षित दिखाई दे रहा है। यदि मानसून कमजोर रहा तो उदयपुर की झीलों और शहर की पेयजल व्यवस्था पर सबसे पहला और सबसे गंभीर असर पड़ेगा। स्थानीय जलदाय विभाग ने झीलों में पानी नहीं आने पर अल्प जलापूर्ति करने की संभावना जताई है।

Dainik Bhaskar के अनुसार20 जुलाई 2026 को 04:36 am बजे
उदयपुर भी मानसून के बारे में चिंतित, पानी की समस्या से निपटने के लिए क्या किया जा रहा ह?

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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क्या फिर प्यासा रहेगा उदयपुर या फिर नेताओं के वादे ही हिलोरे लेंगे?

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संत कबीर की यह रचना झीलों के शहर उदयपुर के नेतृत्व पर बिल्कुल फिट बैठती है। कबीर कहते हैं कि जैसे मछली पानी में रहते हुए भी यदि प्यासी हो, तो यह आश्चर्य और हंसी की बात है। उदयपुर को झीलों का शहर कहा जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि आज यही शहर अपनी प्यास को लेकर सबसे अधिक असुरक्षित दिखाई दे रहा है। मौसम विभाग पहले ही संकेत दे चुका है कि इस वर्ष मानसून कमजोर रह सकता है। यदि ऐसा होता है तो इसका सबसे पहला और सबसे गंभीर असर उदयपुर की झीलों और शहर की पेयजल व्यवस्था पर पड़ेगा।

जलदाय विभाग द्वारा झीलों में इस माह पानी नहीं आने पर अब 48 घंटे के बजाय 72 घंटे में अल्प जलापूर्ति करने की संभावना जताई जा रही है। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि पिछले कई दशकों की जल नीति की विफलता का सार्वजनिक स्वीकार है। वर्षों तक जनता को बताया गया कि देवास प्रथम, देवास द्वितीय, मानसी-वल्कल योजना और जयसमंद परियोजना उदयपुर की पानी की समस्या का स्थायी समाधान हैं। हर नई योजना को चुनावी मंचों पर उपलब्धि बताकर प्रस्तुत किया गया। अरबों रुपये खर्च हुए, लेकिन आज भी शहर सूखे की आशंका से कांप रहा है। यदि इन योजनाओं के बाद भी नागरिकों को 72 घंटे में पानी मिलने की नौबत आ रही है, तो यह पूछना जनता का अधिकार है कि आखिर सफलता किसे कहा जाए?

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि देवास परियोजना का पानी बीसलपुर के लिए तभी स्थानांतरित किया जाना चाहिए जब देवास प्रथम और द्वितीय पूरी तरह भर जाएं। यदि जल्दबाजी में पानी बीसलपुर भेज दिया गया और बाद में मानसून कमजोर रहा, तो उदयपुर के हिस्से में केवल खाली जलाशय और सरकारी सफाई बचेगी। पानी का हर निर्णय आंकड़ों और दीर्घकालिक जल सुरक्षा को ध्यान में रखकर होना चाहिए, न कि प्रशासनिक जल्दबाजी या राजनीतिक दबाव में। और यह भी याद रखना होगा कि वैपकॉस ने वर्षों पहले अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि देवास तृतीय और चतुर्थ बनने के बाद भी उदयपुर के लिए अतिरिक्त जल स्रोतों की तलाश अनिवार्य होगी। यदि विशेषज्ञ वर्षों पहले भविष्य की चुनौती बता चुके थे, तो आज तक नए स्रोतों की दिशा में ठोस प्रयास क्यों नहीं हुए? क्या रिपोर्टें केवल अलमारियों में धूल खाने के लिए बनती हैं?

सवाल केवल पानी का नहीं, जवाबदेही का भी है। चुनाव आते हैं तो झीलों के किनारे मंच सजते हैं, विकास के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब जल संकट होता है तो सभी मौन हो जाते हैं। जनता को टैंकर, कटौती और इंतजार मिलता है, जबकि योजनाओं की फाइलों में सब कुछ सफल घोषित कर दिया जाता है।

यह समय श्रेय लेने का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी निभाने का है। जनता अब आश्वासन नहीं, परिणाम चाहती है। यदि इस वर्ष भी चेतावनियों को अनसुना किया गया, तो इतिहास यह दर्ज करेगा कि उदयपुर पानी की कमी से नहीं, बल्कि दूरदृष्टि की कमी से प्यासा हुआ। याद रखिए प्रकृति अवसर बार-बार नहीं देती। यदि आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि झीलों के शहर को प्यासा बनाने का अपराध आखिर किसने किया?

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