Special: कचरे के बोरे से कलम तक का सफर, जयपुर की यह पाठशाला बदल रही खानाबदोश बच्चों की तकदीर
Special: कचरे के बोरे से कलम तक का सफर, जयपुर की यह पाठशाला बदल रही खानाबदोश बच्चों की तकदीर सावित्रीबाई फुले पाठशाला खानाबदोश बच्चों को मुफ्त शिक्षा और घायल बेजुबानों को सहारा दे रही है. पढ़िए फिरोज शैफी की स्पेशल रिपोर…

सौजन्य से:- ETV Bharat
Special: कचरे के बोरे से कलम तक का सफर, जयपुर की यह पाठशाला बदल रही खानाबदोश बच्चों की तकदीर
सावित्रीबाई फुले पाठशाला खानाबदोश बच्चों को मुफ्त शिक्षा और घायल बेजुबानों को सहारा दे रही है. पढ़िए फिरोज शैफी की स्पेशल रिपोर्ट.
Published : August 27, 2026 at 8:59 AM IST
जयपुर: क्या आपने कभी ऐसा स्कूल देखा है जहां बच्चे सुबह कचरा बीनने के बाद पढ़ाई करने आते हैं, ताकि उनका पेट भी भरे और भविष्य भी संवरे? जयपुर की सावित्रीबाई फुले पाठशाला आज कुछ ऐसा ही अनोखा काम कर रही है. यहां बच्चे केवल साक्षर ही नहीं हो रहे, बल्कि नशे के दलदल को पीछे छोड़कर सरकारी दफ्तरों में बड़े अफसर बनने का सपना भी देख रहे हैं. इतना ही नहीं, यह स्कूल बच्चों के साथ-साथ सैकड़ों बेजुबान जानवरों को भी नया जीवन दे रहा है.
जयपुर के गुर्जर की थड़ी स्थित 'सावित्रीबाई फुले पाठशाला' आज समाज के उस अंतिम छोर पर खड़े बच्चों के लिए उम्मीद का नया सूरज बनकर उभरी है, जिनके जीवन में कभी सिर्फ गरीबी, अशिक्षा और नशे का अंधेरा था. पिछले 7 सालों से चल रही इस अनूठी पाठशाला ने महज 3 बच्चों से अपना सफर शुरू किया था, जो आज समाज के सामूहिक सहयोग और भामाशाहों के दम पर 70 से अधिक बच्चों का भविष्य संवार रही है. संस्था का यह प्रयास सिर्फ बुनियादी शिक्षा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां से निकले बच्चे मुख्यधारा के स्कूलों में 87 प्रतिशत तक अंक लाकर यह साबित कर रहे हैं कि अगर सही अवसर मिले तो झोपड़ियों से भी देश के बड़े अफसर निकल सकते हैं.
इसे भी पढ़ें- ट्रैफिक इंचार्ज सोनचंद वर्माः जयपुर की सड़कों पर भटकते भारत के भविष्य को निखारने में लगे हैं...
पहले सुबह कचरा, फिर किताबों से दोस्ती: संस्था की संचालक और शिक्षिका संतोष सैनी बताती हैं कि इन खानाबदोश बच्चों की सबसे बड़ी मजबूरी उनके परिवार का रोजगार है. बच्चे और उनके माता-पिता सुबह करीब 4 बजे से लेकर 11 बजे तक कचरा इकट्ठा करने का काम करते हैं. यही वजह है कि सुबह 7 बजे शुरू होने वाले सरकारी स्कूलों में ये बच्चे चाहकर भी नहीं पढ़ पाते थे, क्योंकि स्कूल जाने का सीधा मतलब था परिवार की रोजी-रोटी का प्रभावित होना. रोजगार और पढ़ाई के इसी टकराव को खत्म करने के लिए संस्था ने एक रास्ता निकाला. पाठशाला का समय सुबह 10 बजे के बाद तय किया गया, ताकि ये बच्चे कचरा बीनने का काम निपटाकर सीधे यहां पढ़ने आ सकें. यहां इन्हें बिल्कुल नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है, जिससे अब इनका पेट भी भर रहा है और ये शिक्षित भी हो रहै हैं.
तीन बच्चों से शुरू हुई थी पाठशाला: संतोष सैनी का कहना है कि शुरुआती दौर में इन खानाबदोश परिवारों का भरोसा जीतना एक बड़ी चुनौती थी, जिसके कारण पहले दिन सिर्फ तीन बच्चे ही पढ़ने आए थे, लेकिन संस्था की नि:स्वार्थ भावना को देखकर धीरे-धीरे माता-पिता का विश्वास बढ़ता गया और आज यहां 70 बच्चे पूरी लगन से पढ़ाई कर रहे हैं. इस पाठशाला में बच्चों को तीसरी कक्षा तक की बुनियादी शिक्षा दी जाती है और इसके बाद उनका दाखिला दूसरे बड़े स्कूलों में करा दिया जाता है. सबसे खास बात यह है कि संस्था केवल दाखिला कराकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटती, बल्कि इन बच्चों की आगे की पढ़ाई का पूरा खर्च भी खुद वहन करती है. इसी का नतीजा है कि आज करीब 10 बच्चे दूसरे स्कूलों में पांचवीं तक पढ़ रहे हैं, जबकि तीन बच्चे इस बार दसवीं क्लास की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, जो स्कूल के बाद वापस इसी संस्था में आकर मुफ़्त ट्यूशन भी लेते हैं.
इसे भी पढ़ें- 38 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर दुर्गम इलाके में पहुंचे स्वास्थ्यकर्मी, खानाबदोश बच्चों को टीका लगाया
नशे की गिरफ्त में थे बच्चे और मां-बाप: शिक्षिका संतोष सैनी बताती हैं कि इस सफर में सबसे बड़ी चुनौती केवल अशिक्षा नहीं, बल्कि नशे की वह खतरनाक लत थी, जिसने इन बच्चों और उनके माता-पिता को अपनी गिरफ्त में ले रखा था. संस्था ने अपनी काउंसिलिंग और सकारात्मक माहौल के दम पर इन बच्चों को नशे के उस भयानक दलदल से पूरी तरह बाहर निकाला. हालांकि, यह राह इतनी आसान नहीं थी. उन्होंने एक वाकया साझा करते हुए बताया कि यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक बच्चे का दाखिला दूसरे स्कूल में कराया, लेकिन वह वहां जाकर दोबारा नशे की गिरफ्त में आ गया. स्कूल से लगातार शिकायतें आने के बाद उसे वहां से हटाना पड़ा, जिससे उसका एक साल भी बर्बाद हुआ, लेकिन जब उस बच्चे को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने रोकर माफी मांगी कि वह आगे से कभी नशा नहीं करेगा, तो संस्था ने एक बार फिर एक अभिभावक की तरह उसका हाथ थामा और दूसरे स्कूल में उसका दाखिला कराया. आज वही बच्चा पूरी मेहनत और लगन से अपनी पढ़ाई में जुटा हुआ है.
ये साबित किया कि प्रतिभा गरीबी की मोहताज नहीं: संस्था के निदेशक भवानी शंकर माली बताते हैं कि खानाबदोश परिवारों के इन बच्चों में असाधारण प्रतिभा छिपी हुई है, जरूरत सिर्फ उन्हें एक सही अवसर और मंच देने की है. संस्था की यह सोच आज जमीन पर सच साबित हो रही है. यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद जिन बच्चों का दाखिला दूसरे स्कूलों में कराया गया, वे अपनी कक्षाओं में अव्वल आ रहे हैं और परीक्षाओं में 87 प्रतिशत तक अंक हासिल कर रहे हैं. पिछले वर्ष से लेकर अब तक संस्था द्वारा 11 बच्चों का सीनियर सेकेंडरी स्कूल में दाखिला कराया जा चुका है, जबकि तीन होनहार बच्चों को CBSE बोर्ड की दसवीं कक्षा की परीक्षा के लिए विशेष तैयारी कराई जा रही है. भवानी शंकर माली का कहना है कि संस्था का एकमात्र उद्देश्य इन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना है. वे कहते हैं, "हम चाहते हैं कि ये बच्चे केवल पढ़-लिखकर अपनी जिंदगी ही न सुधारें, बल्कि जब ये बड़े होकर सरकारी दफ्तरों में ऊंचे पदों पर बैठेंगे और देश के हित में आदेश जारी करेंगे, तब हमारी इस मुहिम का असली सपना पूरा होगा."
इसे भी पढ़ें- Special: कचरा बीनने वाले बच्चों का भविष्य संवारने वाली 'दादी मां' बनी समाज के लिए मिसाल
जो अभद्र भाषा बोलते थे, आज 'जय हिंद' बोलते हैं: भवानी शंकर माली बताते हैं कि बच्चों के व्यवहार, भाषा और संस्कारों में आया यह ऐतिहासिक बदलाव ही संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि है. पहले जो बच्चे चौबीसों घंटे अभद्र भाषा बोलते थे, बात-बात पर गालियां देते थे, नशे में डूबे रहते थे और साफ-सफाई से कोसों दूर थे, आज वे अनुशासन की मिसाल बन चुके हैं. आज यही बच्चे गर्व से 'जय हिंद' बोलते हैं, उन्हें देश का पूरा राष्ट्रगान याद है और वे अपनी स्वच्छता का पूरा ध्यान रखते हैं. निदेशक ने बताया कि चूंकि ये खानाबदोश परिवारों के बच्चे हैं, इसलिए इनके पास रहने को अपना कोई स्थायी घर नहीं है. कई बच्चों के माता-पिता आज भी नशे की लत से जूझ रहे हैं, तो कुछ बच्चों के सिर से माता-पिता का साया ही उठ चुका है. ऐसे बेसहारा और अनाथ बच्चों के लिए संस्था ने एक विशेष आश्रय गृह का निर्माण किया है, जहां एक सहायिका चौबीसों घंटे इनकी देखभाल करती है और इनके रहने व खाने-पीने का पूरा प्रबंध संभालती है. संस्था का यह संकल्प है कि कोई भी बच्चा केवल इसलिए शिक्षा से वंचित न रहे क्योंकि उसके पास घर, पैसा या कोई पारिवारिक सहारा नहीं है.
भामाशाहों का मिलता है सहयोग: भवानी शंकर माली का कहना है कि खानाबदोश बच्चों की जिंदगी बदलने की इस कठिन मुहिम को अकेले अंजाम देना मुमकिन नहीं था, लेकिन समाजसेवियों और दानदाताओं ने इस राह को आसान बना दिया. बच्चों की कॉपियां-किताबें, स्कूल यूनिफॉर्म, बिजली का खर्च, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और यहां तक कि पाठशाला की टीन शेड जैसी हर बुनियादी जरूरत को पूरा करने के लिए समाज के संवेदनशील लोग समय-समय पर आगे आते हैं. समाज के इसी सामूहिक और नि:स्वार्थ सहयोग के भरोसे इस सेवा अभियान के कारवां को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है.
इसे भी पढ़ें- मिलए राजस्थान के कचरा बीनने वाले बुजुर्ग से, इनका IQ लेवल देखकर आप भी कहेंगे जबरदस्त -
बेजुबानों का भी सहारा बनी पाठशाला: सावित्रीबाई फुले पाठशाला सिर्फ शिक्षा का एक केंद्र नहीं है, बल्कि इसके परिसर में ही घायल और बीमार पशु-पक्षियों के लिए एक शेल्टर होम भी चलाया जा रहा है. यहां बिल्ली, बंदर, कबूतर, तोता, खरगोश, मुर्गी, स्ट्रीट डॉग और चूहे सहित कई अन्य पशु-पक्षियों को आश्रय दिया जाता है. यहां रहने वाले ज्यादातर पशु-पक्षी ऐसे हैं जो या तो बीमार हैं या किसी सड़क हादसे का शिकार हो गए हैं. ऐसे जीवों को यहां रखकर उनका उचित इलाज किया जाता है और जब वे पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं, तो उन्हें वापस खुले वातावरण में छोड़ दिया जाता है या फिर पशु प्रेमी उन्हें गोद ले लेते हैं. संतोष सैनी का कहना है कि कई स्ट्रीट डॉग्स तो उन्हें बोरियों में बंद क्रूर स्थिति में मिले थे, जिन्हें संस्था ने अपने शेल्टर में लाकर नया जीवन दिया और उनकी पूरी देखभाल की. आज कई पशु प्रेमी यहां से स्ट्रीट डॉग्स को गोद भी ले चुके हैं.
6 महीने में 40 बिल्लियों को मिला नया घर: संस्था के निदेशक भवानी शंकर माली बताते हैं कि पिछले 6 महीनों के भीतर ही करीब 40 बिल्लियों को पशु प्रेमियों ने गोद लिया है, फिलहाल इस शेल्टर होम में करीब 25 बिल्लियां मौजूद हैं, जबकि कुल मिलाकर 250 से अधिक पशु-पक्षियों की यहां दिन-रात देखभाल की जा रही है. भवानी शंकर माली ने बताया कि अब तक उनके इस केंद्र से 250 से ज्यादा बेजुबान जीवों को लोगों द्वारा अडॉप्ट किया जा चुका है. इसके लिए संस्था सोशल मीडिया के जरिए लगातार लोगों से इन लाचार जीवों को गोद लेने की भावुक अपील करती है, जिसे देखकर बड़ी संख्या में पशु प्रेमी यहां पहुंचते हैं.
भवानी शंकर माली ने बताया कि बेजुबानों की सेवा के इस सफर को और मजबूत करने के लिए अगले दो से तीन महीनों में यहां पशु-पक्षियों के त्वरित इलाज और जटिल सर्जरी के लिए एक आधुनिक ऑपरेशन थिएटर भी तैयार हो जाएगा. जयपुर के गुर्जर की थड़ी की यह पाठशाला आज शिक्षा और मानवीय सेवा की एक ऐसी बेमिसाल नजीर बन चुकी है, जहां एक तरफ खानाबदोश बच्चों के हाथों में किताबें थमाकर उनका भविष्य संवारा जा रहा है, तो दूसरी तरफ तड़पते हुए बेजुबानों को जिंदगी की नई उम्मीद दी जा रही है.
इसे भी पढ़ें- Special: कोटा नगर निगम की अनूठी पहल, कचरा बीनने वालों को मिल रहा रोजगार... जानिए कैसे ?
इसे भी पढ़ें- Special: कोटा नगर निगम की अनूठी पहल, कचरा बीनने वालों को मिल रहा रोजगार... जानिए कैसे ?
Powered by Reporting Rajasthan Files
संबंधित ख़बरें

राजस्थान के रामपुरा में सरकारी स्कूल की असुरक्षित इमारत गिराई, CJP के अभियान के बाद प्रशासन की कार्रवाई - the unsafe building of a government school in rampura rajasthan was demolished

सुप्रीम-कोर्ट कॉलेजियम ने राजस्थान-हाईकोर्ट के नए CJ की सिफारिश की: एडवोकेट्स में खुशी; 6 सितंबर तक जारी रहेगा न्यायिक बहिष्कार - Jodhpur News

अजमेर में कल 4 घंटे तक रहेगा पावर कट: 40 से ज्यादा इलाके होंगे प्रभावित; जानिए कब कहां रहेगा शटडाउन - Ajmer News


