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OBC Commission Report: 92 जातियों की राजनीतिक हिस्सेदारी का खुलासा, जाट सबसे आगे, जानिए अन्य का हाल

OBC Commission Report: 92 जातियों की राजनीतिक हिस्सेदारी का खुलासा, जाट सबसे आगे, जानिए अन्य का हाल 92 जातियों की राजनीतिक हिस्सेदारी का खुलासा. 17 जातियों की मजबूत मौजूदगी, 18 जातियों के 100 लोग भी सरकारी नौकरी में नहीं…

ETV Bharat के अनुसार9 अगस्त 2026 को 02:15 pm बजे
OBC Commission Report: 92 जातियों की राजनीतिक हिस्सेदारी का खुलासा, जाट सबसे आगे, जानिए अन्य का हाल

सौजन्य से:- ETV Bharat

OBC Commission Report: 92 जातियों की राजनीतिक हिस्सेदारी का खुलासा, जाट सबसे आगे, जानिए अन्य का हाल

92 जातियों की राजनीतिक हिस्सेदारी का खुलासा. 17 जातियों की मजबूत मौजूदगी, 18 जातियों के 100 लोग भी सरकारी नौकरी में नहीं.

Published : August 9, 2026 at 1:49 PM IST

जयपुर: राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों से पहले ओबीसी की सियासत और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर ओबीसी आयोग (राजनीतिक) की रिपोर्ट सामने आ चुकी है. रिपोर्ट के अनुसार ओबीसी की 92 जातियों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की स्थिति एक समान नहीं है. कुछ जातियों की राजनीतिक भागीदारी मजबूत है, जबकि कई जातियां अब भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में काफी पीछे हैं.

रिपोर्ट में राजनीतिक भागीदारी वाले परिवारों की संख्या के लिहाज से जाट समाज सबसे आगे, गुर्जर दूसरे और माली-सैनी तीसरे स्थान पर है. आयोग की रिपोर्ट में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन के अलग-अलग पहलुओं का अध्ययन किया गया है. खास बात यह है कि 22 जातियां ऐसी हैं, जिनके 100 परिवारों को भी राजनीतिक भागीदारी नहीं मिल पाई. ऐसे में आने वाले पंचायत और निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के निर्धारण के लिए यह रिपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

92 में सिर्फ 17 जातियों की मजबूत सियासी पकड़ : रिपोर्ट के अनुसार ओबीसी की 92 जातियों में केवल 17 जातियां ऐसी हैं, जिनके 2 हजार से ज्यादा परिवार राजनीतिक भागीदारी में शामिल हैं. इसके विपरीत बड़ी संख्या में जातियों की राजनीतिक मौजूदगी सीमित है. आयोग ने इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पिछड़ेपन का आकलन किया है.

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रिपोर्ट सामने आने के बाद ओबीसी के भीतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस शुरू होने की संभावना है. खास तौर पर उन जातियों के लिए रिपोर्ट महत्वपूर्ण है, जिनकी चुनावी राजनीति और सत्ता के विभिन्न स्तरों पर भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है.

राजनीतिक हिस्सेदारी में जाट सबसे आगे : आयोग के आंकड़ों के मुताबिक राजनीतिक भागीदारी वाले परिवारों की संख्या में जाट समाज 22,666 परिवारों के साथ सबसे ऊपर है. इसके बाद गुर्जर 9,628, माली-सैनी और बागवान 5,993 तथा कुम्हार-प्रजापत 5,823 परिवारों के साथ आगे हैं. इसके अलावा अहीर-यादव के 3,826, बढ़ई के 3,727, जांगिड़-सुथार के 2,725, बिश्नोई के 2,401, कली/कुली के 2,326 और पटेल-आंजणा के 2,079 परिवारों की राजनीतिक भागीदारी दर्ज की गई है. रिपोर्ट में मेव 1,906, रावत 1,787, साद-स्वामी-रैणी 1,746, सिखी-मुस्लिम लोहार-सिपाही 1,640, राइका-रैबारी-देवासी 1,607, धाकड़ 1,592, दरोगा-रावणा-राजपूत 1,501 और जोगी-नाथ 1,122 परिवारों की राजनीतिक भागीदारी बताई गई है.

सरकारी नौकरी में भी दिखी बड़ी असमानता : राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ आयोग ने सरकारी सेवाओं में जातियों की भागीदारी का भी अध्ययन किया है. रिपोर्ट के मुताबिक 18 जातियां ऐसी हैं, जिनके 100 लोग भी सरकारी सेवा में नहीं हैं. इससे ओबीसी की अलग-अलग जातियों के बीच सरकारी रोजगार में मौजूद अंतर का पता चलता है. यानी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी सेवाओं- दोनों क्षेत्रों में ओबीसी की सभी जातियों की स्थिति एक जैसी नहीं है. कुछ जातियां जहां अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में हैं. वहीं, कई जातियां अभी भी प्रतिनिधित्व और रोजगार के अवसरों में पीछे हैं.

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एमबीसी की पांच जातियां भी अध्ययन में शामिल : आयोग ने ओबीसी के साथ विशेष पिछड़ा वर्ग यानी एमबीसी की पांच जातियों को भी अपने विश्लेषण में शामिल किया है. इनमें गुर्जर, बंजारा-बालदिया-लबाना, गाड़िया लुहार, रैबारी-रायका-देवासी और गड़रिया शामिल हैं. इन जातियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का भी रिपोर्ट में आकलन किया गया है, ताकि आरक्षण और प्रतिनिधित्व से जुड़े फैसलों के लिए व्यापक तस्वीर सामने रखी जा सके.

19 बिंदुओं पर जुटाए गए आंकड़े : आयोग के अध्यक्ष एमएल भाटी के अनुसार रिपोर्ट केवल बंद कमरे में बैठकर तैयार नहीं की गई है. आयोग ने विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं से जुड़े आंकड़े जुटाए हैं. इसके लिए 19 बिंदुओं पर सर्वे और अध्ययन किया गया. रिपोर्ट में राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को भी आधार बनाया गया है. आयोग का उद्देश्य यह पता लगाना था कि ओबीसी की विभिन्न जातियों को सत्ता, राजनीति और सरकारी सेवाओं में कितना प्रतिनिधित्व मिला है.

5 अगस्त को मुख्यमंत्री को सौंपी थी रिपोर्ट : ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों ने 5 अगस्त को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को रिपोर्ट सौंपी थी. अब इस रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश में शहरी निकायों और पंचायतराज संस्थाओं में ओबीसी आरक्षण को लेकर आगे की प्रक्रिया तय होने की उम्मीद है. रिपोर्ट के आधार पर आरक्षित वार्डों और प्रमुख पदों का निर्धारण भी किया जा सकता है. ऐसे में पंचायत और निकाय चुनाव से पहले यह रिपोर्ट राजनीतिक रूप से काफी अहम हो गई है.

आरक्षण के गणित पर पड़ेगा असर : सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि रिपोर्ट में सामने आए राजनीतिक पिछड़ेपन के आंकड़ों का आरक्षण के निर्धारण पर कितना असर पड़ेगा. आयोग ने जिन जातियों की राजनीतिक भागीदारी कम पाई है, उन्हें आगे लाने की जरूरत पर जोर दिया है.

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