राजस्थान के इस गांव में धूमधाम से हुई बछड़ा-बछड़ी की शादी, बैंड-बाजे के साथ निकली बारात, वैदिक मंत्रों के बीच लिए फेरे
Wedding of a Calf and Heifer राजस्थान के पाली जिले के बाड़सा गांव में पशु प्रेम और लोक परंपरा का अनूठा उदाहरण देखने को मिला. यहां ग्रामीणों की सहमति से एक बछड़ा और बछड़ी का विवाह पूरे रीति-रिवाजों के साथ सं…

सौजन्य से:- gnttv.com
Wedding of a Calf and Heifer
राजस्थान के पाली जिले के बाड़सा गांव में पशु प्रेम और लोक परंपरा का अनूठा उदाहरण देखने को मिला. यहां ग्रामीणों की सहमति से एक बछड़ा और बछड़ी का विवाह पूरे रीति-रिवाजों के साथ संपन्न कराया गया. शादी की रस्में ठीक उसी तरह निभाई गईं, जैसे किसी परिवार में बेटे-बेटी का विवाह होता है. तीन दिन तक चले इस आयोजन में पूजा-पाठ, बैंड-बाजा, बारात, फेरे, कन्यादान और विदाई जैसी सभी परंपराएं निभाई गईं. ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह के आयोजन पशुओं के प्रति प्रेम, गौ संरक्षण और लोक संस्कृति को जीवित रखने का संदेश देते हैं.
शादी से पहले हुई पूजा, चुनरी ओढ़ाकर कराया पाट बैठाने का आयोजन
विवाह समारोह की शुरुआत पारंपरिक रस्मों के साथ हुई. सबसे पहले बछड़ा और बछड़ी को चुनरी ओढ़ाई गई और तिलक लगाकर पाट बैठाने की रस्म निभाई गई. इसके बाद महिलाओं ने मंगल गीत गाए. आयोजन के दौरान भगवान गणपति की पूजा की गई, साथ ही पीपल और बरगद के पेड़ का भी विधि-विधान से पूजन किया गया. ग्रामीणों ने इसे शुभ शुरुआत का प्रतीक माना.
बैंड-बाजे के साथ निकली बंदोली
दूसरे दिन देर रात बंदोली का आयोजन किया गया. बैंड-बाजे की धुन पर गांव के लोग नाचते-गाते नजर आए. यजमान रथ पर पीपल और बरगद का पौधा लेकर बैठे, जबकि पीछे ट्रैक्टर की ट्रॉली में सजे-धजे बछड़ा और बछड़ी को बैठाया गया. पूरे रास्ते महिलाएं लोकगीत गाती रहीं और पारंपरिक नृत्य करती हुई जुलूस के साथ चलीं. गांव का माहौल किसी बड़े विवाह समारोह जैसा दिखाई दिया.
मंदिर में वैदिक मंत्रों के बीच हुए फेरे
तीसरे दिन बारात बछड़ी के मंदिर तक पहुंची. यहां तोरण की रस्म पूरी करने के बाद विवाह की मुख्य रस्में शुरू हुईं. बछड़े को साफा पहनाया गया और बछड़ी को चुनरी ओढ़ाई गई. वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दोनों को फेरों के लिए बैठाया गया. विवाह के दौरान कन्यादान की रस्म भी निभाई गई, जिसमें श्रद्धालुओं ने हजारों रुपये की भेंट दी.
कन्यादान की पूरी राशि गौशाला को की गई समर्पित
आयोजकों ने बताया कि विवाह में कन्यादान के रूप में मिली पूरी राशि गौशाला को दान कर दी गई. इस धन का उपयोग गायों की देखभाल, चारा और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं के लिए किया जाएगा. विवाह के बाद सभी ग्रामीणों के लिए सामूहिक भोजन का आयोजन किया गया. अंत में पारंपरिक रीति से बछड़ा और बछड़ी की विदाई भी की गई.
पशु संरक्षण और लोक संस्कृति को बढ़ावा देने का संदेश
ग्रामीणों का मानना है कि ऐसे आयोजन केवल धार्मिक परंपरा निभाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पशुपालन और गौ संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक भी करते हैं. भारत के ग्रामीण जीवन में पशुधन आज भी आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है. दूध, घी और डेयरी उद्योग की नींव भी पशुपालन पर टिकी है. ऐसे आयोजनों के जरिए नई पीढ़ी को अपनी लोक संस्कृति, परंपराओं और पशुओं के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया जाता है.
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