भट्टी की तपिश में आखरी सांसे ले रही जयपुर की सदियों पुरानी परंपरा, जानिए क्या है 'कलई' कला
भट्टी की तपिश में आखरी सांसे ले रही जयपुर की सदियों पुरानी परंपरा, जानिए क्या है 'कलई' कला जयपुर की पारंपरिक कला 'कलई' अब विलुप्त होने की कगार पर है. पढ़िए फिरोज शैफी की रिपोर्ट... Published : September 22, 2026 at 11:27…

सौजन्य से:- ETV Bharat
भट्टी की तपिश में आखरी सांसे ले रही जयपुर की सदियों पुरानी परंपरा, जानिए क्या है 'कलई' कला
जयपुर की पारंपरिक कला 'कलई' अब विलुप्त होने की कगार पर है. पढ़िए फिरोज शैफी की रिपोर्ट...
Published : September 22, 2026 at 11:27 AM IST
जयपुर : राजधानी जयपुर अपनी स्थापत्य कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाओं के लिए दुनिया भर में अपनी एक अलग पहचान रखता है. कच्छवाहा शासक सवाई जय सिंह द्वितीय ने जब जयपुर बसाया था तब देश के अलग-अलग हिस्सों से विभिन्न कलाओं में निपुण कारीगरों को यहां लाकर बसाया था. इन्हीं पारंपरिक कलाओं में तांबे और पीतल के बर्तनों पर कलई करने की कला भी शामिल है. कभी जयपुर की गलियों में भट्टियों की तपिश और बर्तनों की खनक के बीच यह कला खूब फलती-फूलती थी, लेकिन आधुनिक दौर में स्टील-एल्यूमिनियम और नॉन स्टिक बर्तनों के बढ़ते चलन ने कलई करने वाले कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है.
जयपुर के त्रिपोलिया बाजार और हवामहल के मुख्य द्वार के आसपास आज भी कुछ कलई करने वाले कारीगर, जिन्हें 'कलईगर' भी कहा जाता है, अपनी पुश्तैनी कला को जीवित रखे हुए हैं. सड़क किनारे जलती भट्टी, तपते तांबे-पीतल के बर्तन और रांगे की चमक इस बात की गवाही देती है कि आधुनिकता के बीच जयपुर की यह पुरानी पारंपरिक कला सांसे ले रही है. कारीगरों की संख्या लगातार घट रही है और कलई का काम करने वाले कारीगर अब गिने चुने रह गए हैं.
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बर्तन की अंदरूनी सतह पर चढ़ती है रांगे की परत : कारीगर बताते हैं कि कलई की पारंपरिक प्रक्रिया में तांबे या पीतल के बर्तन की अंदरूनी सतह को साफ करने के बाद उसे भट्टी में तेज आग पर तपाया जा जाता है. इसके बाद रांगे यानी टिन की पतली परत बर्तन की अंदरूनी सतह पर चढ़ाई जाती है. ये रांगे की पतली परत बन जाती है. तांबे और पीतल की सतह पर अम्लीय या खट्टी खाद्य सामग्री के सीधे संपर्क को रोकने में यह परत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसी वजह से पारंपरिक रूप से दही, नींबू, टमाटर जैसी खट्टी चीजों को तांबे, पीतल के बिना कलई वाले बर्तनों में पकाने या रखने से बचा जाता रहा है. बर्तन की कलई इस धातु और भोजन के बीच एक अवरोध का काम करती है.
इस तरह होती है कलई : कलई करने से पहले तांबे-पीतल के बर्तनों को भट्टी की तेज आग पर पकाया जाता है, फिर उसमें हल्का तेजाब डालकर उसकी अंदरूनी सतह की गंदगी को साफ किया जाता है. इसके बाद उसे दोबारा आग पर पकाया जाता है. जब बर्तन बिल्कुल लाल हो जाते हैं तब उसमें रांगे को पिघला कर डाला जाता है और नौसादर और मोटी रुई से रगड़-रगड़ कर रांगे को पूरी सतह पर फैलाया जाता है, जिससे बर्तन की अंदरूनी सतह पूरी तरह चमकदार हो जाती है.
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आज की पीढ़ी नहीं जानती कलई क्या है : त्रिपोलिया गेट के पास सड़क किनारे तांबे-पीतल के बर्तनों पर कलई करने वाले कलईगर राजकुमार ठठेरा 45 वर्षों से यही काम कर रहे हैं. वे कहते हैं कि उनके परिवार में पीढ़ियों से बर्तन बनाने का काम होता आ रहा है. पहले तांबे और पीतल के बर्तनों का घर-घर में इस्तेमाल होता था और समय-समय पर उनकी कलई करवाना भी घरेलू जीवन का एक सामान्य हिस्सा थी. कलई किए हुए बर्तनों में खाना बनाने की परंपरा आज भी कई पुराने और बड़े परिवारों में कायम है. आज नई पीढ़ी नहीं जानती है कि कलई क्या होती है, क्योंकि आज तांबे-पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल कम हो गया है और अल्युमिनियम स्टील नॉन स्टिक बर्तनों का इस्तेमाल ज्यादा घरों में होने लगा है.
बगैर कलई के विषैला हो जाएगा भोजन : राजकुमार ठठेरा का कहना है कि तांबे पीतल के बर्तनों में कलई इसलिए करवाई जाती है, ताकि भोजन विषैला नहीं हो जाए. तांबे-पीतल के बर्तनों से एक हरे रंग का पदार्थ बर्तनों की सतह पर लग जाता है, जिससे भोजन विषैला हो जाता है और शरीर को नुकसान दे सकता है. वहीं, कलई करने के बाद वही भोजन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है. उनका कहना है कि आयुर्वेद में भी इसका उल्लेख है. कलई किए हुए बर्तनों में खाना पकाना स्वास्थ्य को कई तरह के फायदे देता है. यही वजह है कि सदियों से लोग तांबे पीतल के बर्तनों का ही इस्तेमाल करते आ रहे हैं और उनमें कलई कराने के बाद उन्हें इस्तेमाल किया जाता है.
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अब गिनती के कारीगर : उनका कहना है कि बर्तन के इस्तेमाल के आधार पर कलई की उम्र भी अलग-अलग होती है. सामान्य तौर पर किसी भगोने की कलई 1 साल तक चल सकती है, जबकि कढ़ाई में तेल और तेज गर्मी के कारण यह अवधि 6 महीने रह जाती है. चाय की दुकानों और रेस्टोरेंट में लगातार इस्तेमाल होने वाले भगोनो की कलई हर महीने करवानी पड़ती है. राजकुमार ठठेरा के मुताबिक चार दशक पहले राजधानी जयपुर में ही कलई करने वाले हजारों कारीगर थे. अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. अब कलई करने वाले कारीगर महज 8 से 10 बचे हैं, क्योंकि यह काम अब कम हो गया है.
कला को जिंदा रखने की जरूरत : राजकुमार ठठेरा का कहना है कि तांबे पीतल के बर्तनों की जगह अब स्टील एल्यूमिनियम और नॉन स्टिक बर्तनों ने ले ली है. अगर इसी तरह से चलता रहा तो आने वाले 8-10 सालों में यह कला पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगी, क्योंकि नई पीढ़ी इस काम को नहीं करना चाहती है. अब काम भी बहुत कम रह गया है. गिने-चुने परिवार ही तांबे पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए अगर इस कला को बचाया नहीं गया तो आने वाले सालों में यह कला विलुप्त हो जाएगी.
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चौथी पीढ़ी संभाल रही है विरासत : हवामहल के मुख्य द्वार के पास कलई करने वाले अजगर अंसारी भी इस कला को पीढ़ियों से आगे बढ़ा रहे हैं. उनका कहना है कि वो चौथी पीढ़ी हैं, जो यह काम कर रहे हैं. उनके पिता, दादा और परदादा भी यही काम करते थे. अजगर अंसारी बताते हैं कि जब तांबे-पीतल और कांसे के बर्तन घरों में बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होते थे तब कलईगरों के पास लगातार काम रहता था, लेकिन स्टील और एल्यूमीनियम के बढ़ते चलन ने इस पारंपरिक कला को काफी प्रभावित किया है. अब जयपुर में ही इस काम को करने वाले गिने-चुने कारीगर बचे हैं.
स्वास्थ्य से भी जुड़ी रही कलई की परंपरा : अजगर अंसारी बताते हैं कि कलई किए हुए बर्तनों में खाना बनाने से स्वास्थ्य भी ठीक रहता है. इससे पेट, लीवर स्वस्थ रहते हैं. हालांकि, स्टील के बर्तन से कोई नुकसान नहीं होता तो फायदा भी नहीं होता है. आधुनिक बर्तनों के दौर में कलई की मांग भले ही घट गई हो, लेकिन जयपुर की इस पारंपरिक कला के संरक्षण की जरूरत पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है. अगर कारीगरों की नई पीढ़ी इस हुनर से नहीं जुड़ी और पारंपरिक बर्तनों का इस्तेमाल पूरी तरह से खत्म होता गया तो ये कला भी गायब हो सकती है.
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