तीन दशक का इंतजार: राजस्थान के ढाई लाख शिक्षकों के लिए तबादला नीति क्यों बनी एक अंतहीन पहेली?
तीन दशक का इंतजार: राजस्थान के ढाई लाख शिक्षकों के लिए तबादला नीति क्यों बनी एक अंतहीन पहेली? राजस्थान शिक्षा विभाग पिछले 31 वर्षों से तृतीय श्रेणी शिक्षकों के लिए एक स्थायी तबादला नीति बनाने में विफल रहा है, जिससे ढाई ल…

सौजन्य से:- jaipurtimes.org
तीन दशक का इंतजार: राजस्थान के ढाई लाख शिक्षकों के लिए तबादला नीति क्यों बनी एक अंतहीन पहेली?
राजस्थान शिक्षा विभाग पिछले 31 वर्षों से तृतीय श्रेणी शिक्षकों के लिए एक स्थायी तबादला नीति बनाने में विफल रहा है, जिससे ढाई लाख से अधिक शिक्षक प्रभावित हैं।
जयपुर। राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था में एक ऐसा प्रशासनिक गतिरोध बना हुआ है, जिसने ढाई लाख से अधिक तृतीय श्रेणी शिक्षकों के भविष्य को फाइलों के बीच कैद कर दिया है। वर्ष 1994 से लेकर अब तक न जाने कितनी कमेटियां बनीं और कई बार ड्राफ्ट तैयार किए गए, लेकिन एक स्थायी स्थानांतरण नीति आज भी केवल कागजों तक ही सीमित है। सरकारी तंत्र की इस सुस्ती ने हजारों शिक्षकों के जीवन को मानसिक और आर्थिक तनाव के दौर में धकेल दिया है, जहां हर साल केवल वादों की बलि चढ़ती है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2018 के बाद से इस संवर्ग के लिए कोई नियमित स्थानांतरण प्रक्रिया नहीं अपनाई गई है। अन्य राज्यों में जहां स्थानांतरण के लिए स्पष्ट नियम लागू हैं, वहीं राजस्थान के शिक्षक एक ऐसी व्यवस्था की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो पिछले आठ वर्षों से पूरी तरह ठप पड़ी है। 2024 में भी एक नया ड्राफ्ट तैयार किया गया था, लेकिन वह भी सरकारी स्वीकृति की अंधेरी गलियों में कहीं खो गया है।
इस नीतिगत विफलता का सबसे दुखद पहलू शिक्षकों की व्यक्तिगत पीड़ा है। सरकारी सेवा में कार्यरत पति-पत्नी अलग-अलग जिलों में रहने को मजबूर हैं। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे शिक्षक, एकल महिलाएं और दिव्यांगजन भी अपनी विशेष परिस्थितियों के बावजूद स्थानांतरण के लिए तरस रहे हैं। कई शिक्षक अपनी वरिष्ठता छोड़ने का शपथ-पत्र देने को भी तैयार हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें राहत नहीं मिल पा रही है। बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर जैसे जिलों में लागू डार्क जोन व्यवस्था ने तो घर वापसी की बची-खुची उम्मीदों पर भी विराम लगा दिया है।
शिक्षक संगठनों ने इस स्थिति को भेदभावपूर्ण करार दिया है। प्राथमिक अध्यापक संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि यदि सरकार ने अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ी और जल्द ही स्थायी नीति लागू नहीं की, तो वे प्रदेश स्तर पर बड़ा आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे। उनका मानना है कि सरकार को शिक्षकों की जायज मांगों को नजरअंदाज करने के बजाय एक पारदर्शी और स्थायी नीति बनानी चाहिए।
वर्ष 2026 तक आते-आते शिक्षकों की संख्या और उनकी समस्याएं दोनों बढ़ चुकी हैं। एक स्थायी नीति न केवल शिक्षकों को व्यक्तिगत राहत देगी, बल्कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार आएगा। अब देखना यह है कि फाइलों का यह पहरा कब टूटेगा और शिक्षकों के तबादले का सपना हकीकत में कब बदलेगा। फिलहाल, यह अधूरा सपना सरकारी दावों की विश्वसनीयता पर एक बड़ा सवालिया निशान बना हुआ है।
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