हाईकोर्ट से दो बड़ी खबरें: जिला प्रमुख ओबीसी आरक्षण और रेंट कंट्रोल एक्ट पर सरकार से मांगा जवाब
हाईकोर्ट से दो बड़ी खबरें: जिला प्रमुख ओबीसी आरक्षण और रेंट कंट्रोल एक्ट पर सरकार से मांगा जवाब हाईकोर्ट ने जिला प्रमुख पदों पर ओबीसी आरक्षण और रेंट कंट्रोल एक्ट में एसडीएम को न्यायिक शक्तियां देने पर सरकार से जवाब मांगा…

सौजन्य से:- ETV Bharat
हाईकोर्ट से दो बड़ी खबरें: जिला प्रमुख ओबीसी आरक्षण और रेंट कंट्रोल एक्ट पर सरकार से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने जिला प्रमुख पदों पर ओबीसी आरक्षण और रेंट कंट्रोल एक्ट में एसडीएम को न्यायिक शक्तियां देने पर सरकार से जवाब मांगा.
Published : September 2, 2026 at 10:40 PM IST
जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने जिला प्रमुख के पदों पर अन्य पिछड़ा वर्ग के कम आरक्षण के निर्धारण को लेकर राज्य सरकार और पंचायती राज विभाग सहित अन्य से जवाब तलब किया है. जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह आदेश राधेराम गोदारा की ओर से दायर याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए. अदालत ने इन पक्षकारों से पूछा है कि जब जिला प्रमुखों के कुल पद बढ़ाए गए हैं तो ओबीसी के लिए आरक्षित पदों की संख्या में बढ़ोतरी क्यों नहीं की गई है.
याचिका में अधिवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि साल 2020 में जिला प्रमुखों के 33 पदों में से ओबीसी के लिए पांच सीटें आरक्षित रखी गई थीं. वहीं अब जिला प्रमुखों के पद बढ़कर 41 हो गए हैं. इसके बावजूद ओबीसी वर्ग के लिए पूर्व की तरह पांच सीटें ही आरक्षित रखी गई हैं. याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय 50 फीसदी आरक्षण की संवैधानिक सीमा के भीतर रहते हुए ही जिला प्रमुख पदों पर ओबीसी आरक्षण की नए सिरे से पुनर्गणना की जाए और इस वर्ग को पंचायती राज व्यवस्था में उनका उचित व न्यायसंगत प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए. जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है.
कौन होता है जिला प्रमुख? जिला प्रमुख पंचायती राज व्यवस्था के तहत जिला परिषद का सर्वोच्च राजनीतिक मुखिया होता है. यह ग्रामीण विकास और स्थानीय स्वशासन की त्रि-स्तरीय प्रणाली का सबसे शीर्ष पद है. जिला प्रमुख का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं किया जाता है, बल्कि यह एक अप्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया है. सबसे पहले ग्रामीण जनता अपने-अपने वार्ड से जिला परिषद सदस्यों को चुनती है. इसके बाद ये जीते हुए सभी सदस्य आपस में मतदान करके अपने बीच से किसी एक को जिला प्रमुख और एक को उप-जिला प्रमुख चुनते हैं. इस पद पर चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का जिला परिषद सदस्य होना जरूरी है और उसकी न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए. सामान्य परिस्थितियों में जिला प्रमुख का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है. जिला प्रमुख के पास जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए व्यापक शक्तियां और कार्य होते हैं. वह जिला परिषद की सभी बैठकों का आयोजन करता है और उनकी अध्यक्षता करता है.
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रेंट कंट्रोल एक्ट पर सरकार से मांगा जवाब: वहीं, एक दूसरे मामले की सुनवाई में हाईकोर्ट ने मकान मालिक व किराएदार के बीच आकस्मिक झगड़ों की सुनवाई के लिए एसडीएम को अधिकृत करने और रेंट कंट्रोल एक्ट 2001 की धारा 22-ए व 23(3) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने से जुड़े मामले में राज्य सरकार व जेवीवीएनएल से जवाब तलब किया है. जस्टिस इन्द्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने यह आदेश विपिन सिंह की याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए.
याचिका में अधिवक्ता सत्येन्द्र सिंह राघव ने बताया कि रेंट कंट्रोल एक्ट-2001 के अनुसार मकान मालिक और किराएदार के बीच विवादों के लिए सभी उपखंड मजिस्ट्रेटों को अधिकृत किया गया है. एसडीएम पहले से ही अन्य कई जिम्मेदारियों से जुड़े रहते हैं. याचिकाकर्ता ने आगरा रोड पर तीन मंजिला भवन किराए पर लिया था, लेकिन एक साल पहले मकान मालिक ने दुकानों का बिजली का कनेक्शन काट दिया. उसने बिजली कनेक्शन बहाली के लिए एसडीएम के यहां पर प्रार्थना पत्र दायर किया था, लेकिन अभी तक उसके प्रार्थना पत्र पर एक भी बार सुनवाई नहीं हुई है. राज्य सरकार द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों को किराया मामलों की सुनवाई एवं निस्तारण की न्यायिक प्रकृति की शक्तियां देना सही नहीं है.
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याचिका में कहा गया कि ये अधिकारी पहले से ही विभिन्न प्रशासनिक कार्यों में अत्यधिक व्यस्त रहते हैं. ऐसे में किराया संबंधी मामलों का समयबद्ध एवं प्रभावी निस्तारण नहीं हो रहा और पक्षकारों को परेशानी हो रही है. याचिकाकर्ता के प्रार्थना पत्रों पर सुनवाई नहीं होने से वह बिजली कनेक्शन से वंचित है. याचिका में कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति को जरूरी विद्युत सुविधा से गलत तौर पर वंचित नहीं किया जा सकता. जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया है.
क्या है रेंट कंट्रोल एक्ट: यह एक महत्वपूर्ण कानून है जो मकान मालिकों और किराएदारों के बीच के संबंधों, अधिकारों और विवादों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है. संविधान के तहत यह राज्य सूची का विषय है, इसलिए हर राज्य का अपना अलग किराया नियंत्रण अधिनियम होता है, जैसे राजस्थान में 'राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001' लागू है. इस कानून का मुख्य उद्देश्य किराएदारों को मकान मालिकों द्वारा किए जाने वाले अनावश्यक शोषण और मनमाने ढंग से किराया बढ़ाने से बचाना है, और साथ ही मकान मालिकों को उनकी संपत्ति पर कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है.
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