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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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जयपुर में बंपर वोटिंग ने बीजेपी-कांग्रेस की बढ़ाई धड़कन:वोटिंग पैटर्न पर पार्टियों के अपने-अपने कयास; निर्दलीय बन सकते किंग मेकर
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जयपुर नगर निगम बनाने के 22 साल बाद पहली बार लोगों ने शहरी सरकार चुनने के लिए बंपर वोटिंग की। जयपुर नगर निगम का गठन साल 1994 में हुआ था, लेकिन इससे पहले कभी 60 प्रतिशत से ज्यादा मतदान नहीं हुआ था।
जयपुर में 150 वार्डों में शुक्रवार को पार्षद चुनने के लिए पहली बार सबसे ज्यादा 63.55 फीसदी वोटिंग हुई है। वहीं इस बंपर वोटिंग ने दोनों पार्टियों की धड़कन बढ़ा दी हैं। अब सियासी चर्चाएं इस बात को लेकर हो रही हैं कि इस बंपर वोटिंग के मायने क्या हैं?
दोनों ही पार्टियां इसे अपने-अपने तरीके से डिकोड करने में लगी हैं। बीजेपी इसे सुशासन और सरकार के कामकाज पर मुहर के तौर पर देख रही हैं। वहीं कांग्रेस बढ़े हुए मतदान प्रतिशत को सरकार की नाराजगी से जोड़ रही हैं।
वहीं राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जेन-जी आंदोलन, यूजीसी रोलबैक और बीजेपी-कांग्रेस के बागियों के चलते यह बढ़ा हुआ वोटिंग प्रतिशत दोनों पार्टियों के खिलाफ भी जा सकता है। इससे निगम में बोर्ड बनाने में निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका किंग मेकर के तौर पर भी हो सकती है।
इतिहास बीजेपी के साथ, क्या कांग्रेस बदलेगी नैरेटिव
जयपुर नगर निगम चुनाव में इस बार का वोटिंग पैटर्न भले ही चौंकाने वाला हो, लेकिन इतिहास बीजेपी को इस बार भी सपोर्ट कर रहा है। जयपुर नगर निगम की स्थापना के बाद से वोटिंग प्रतिशत घटता-बढ़ता रहा है, लेकिन बोर्ड हमेशा बीजेपी का ही बना है।
पिछली बार दो नगर निगम होने से कांग्रेस ने हेरिटेज में बोर्ड बनाया था। इसमें भी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया था। इस बार भी आंकड़े बीजेपी के समर्थन में हैं।
जयपुर निगम में 9 विधानसभा सीटें: 7 भाजपा, 2 कांग्रेस विधायक
जयपुर नगर निगम क्षेत्र में 9 विधानसभा सीटें हैं। शहर की 9 विधानसभा सीटों में से 7 पर बीजेपी के विधायक हैं। इनमें कांग्रेस के 2 विधायक हैं। हालांकि आमेर विधानसभा क्षेत्र में भी 3 वार्ड हैं, जिसमें कांग्रेस विधायक हैं।
जयपुर के सांगानेर, विद्याधर नगर, मालवीय नगर, झोटवाड़ा विधानसभा क्षेत्र बीजेपी के मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। बीजेपी को इन इलाकों में इस बार भी पुराना प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद है। वहीं शहरी निकाय चुनावों में आम तौर पर सत्ताधारी पार्टी की तरफ रहने का पुराना ट्रेंड भी रहा है। सरकार में होने का सियासी फायदा सत्ताधारी दल उठाते रहे हैं।
वहीं कांग्रेस इस बार बढ़े हुए वोटिंग प्रतिशत को जेन-जी, यूजीसी रोलबैक, स्थानीय समस्याओं का समाधान नहीं होने और उभरती नाराजगी को वजह मान रही हैं।
निर्दलीयों की भूमिका से इनकार नहीं
दरअसल, वोटिंग के इस बार के पैटर्न को देखकर जयपुर नगर निगम में बोर्ड बनाने में निर्दलीयों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है। साल 2020 में जयपुर नगर नगम को हेरिटेज और ग्रेटर, दो भागों में बांटकर वोटिंग करवाई गई थी। हेरिटेज में 58.31% और ग्रेटर 57.82% वोटिंग हुई थी।
हेरिटेज में 100 में से 47 वार्ड कांग्रेस ने और 42 बीजेपी ने और 11 वार्ड निर्दलीयों ने जीते थे। इसके बाद कांग्रेस ने निर्दलीयों के समर्थन से बोर्ड बनाया था। इधर, ग्रेटर में 150 में से बीजेपी ने 88 वार्ड जीतकर बोर्ड बना लिया था। वहीं कांग्रेस और निर्दलीयों ने 49 वार्ड जीते थे।
इस बार दोनों निगमों को फिर से एक करके 250 की जगह 150 वार्डों में वोटिंग करवाई गई। वोटिंग प्रतिशत पहले से करीब 5 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस एक बार फिर निर्दलीय किंग मेकर की भूमिका में रह सकते हैं।
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