कोटा का अंत या घर-घर में कोटा? AI बदल रहा भारत की 58000 करोड़ की कोचिंग इंडस्ट्री | भारत में कोचिंग - Jansatta
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आज हर सेक्टर में बदलाव ला रहा है। हेल्थ, एजुकेशन, बैंकिंग, फाइनेंस, रियल एस्टेट, स्किल डिवेलपमेंट और टूरिज्म में एआई ने क्रान्तिकारी बदलाव किए हैं। शिक्षा की बात करें तो एआई के साथ हर सवाल…

सौजन्य से:- Jansatta
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आज हर सेक्टर में बदलाव ला रहा है। हेल्थ, एजुकेशन, बैंकिंग, फाइनेंस, रियल एस्टेट, स्किल डिवेलपमेंट और टूरिज्म में एआई ने क्रान्तिकारी बदलाव किए हैं। शिक्षा की बात करें तो एआई के साथ हर सवाल का जवाब हमारी मोबाइल स्क्रीन पर है। कभी बिहार के किसी गांव, उत्तर प्रदेश के छोटे शहर या मध्य प्रदेश के कस्बे में रहने वाले छात्र के लिए IIT, NEET या UPSC की तैयारी का सपना एक बड़े फैसले के साथ आता था- घर छोड़ना पड़ेगा। परिवार को कोटा, दिल्ली या प्रयागराज जैसे शहरों में कमरा तलाशना होगा। कोचिंग की फीस देनी होगी। हॉस्टल या पीजी, खाना और आने-जाने का खर्च अलग।
अब उसी छात्र के हाथ में एक स्मार्टफोन है। स्क्रीन पर लाइव और रिकॉर्डेड क्लास हैं। सवाल की तस्वीर खींचकर समाधान खोजने वाले टूल हैं। ऑनलाइन टेस्ट हैं। और अब ऐसे AI ट्यूटर भी हैं जिनसे छात्र आधी रात को पूछ सकता है- ”मुझे यह सवाल फिर से समझाओ। या इस सवाल का जवाब डिटेल में दो”
बस यहीं से भारत की कोचिंग इंडस्ट्री के लिए नया सवाल पैदा होता है। क्या AI कोटा का अंत लिख रहा है? या फिर कोटा खत्म नहीं होगा बल्कि लाखों स्मार्टफोन के जरिए घर-घर पहुंच जाएगा?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि भारत में कोचिंग कोई छोटी अर्थव्यवस्था नहीं है। रिपोर्ट्स के अनुसार देश की कोचिंग इंडस्ट्री का सालाना रेवेन्यू करीब 58,000 करोड़ रुपये बताया गया था। यह मार्केट-साइज़ अनुमान नहीं है इसलिए इसे अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता। लेकिन यह उस बाजार के आकार का संकेत जरूर देता है जिसे अब सस्ता इंटरनेट, ऑनलाइन लर्निंग और जेनरेटिव AI चुनौती दे रहे हैं।
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पहला बदलाव: तैयारी के लिए अब शहर बदलना
कोचिंग की असली कीमत सिर्फ उसकी फीस नहीं होती। बिहार-राजस्थान-यूपी या किसी अन्य राज्य से कोटा-दिल्ली जाकर पढ़ने वाले छात्र के परिवार को ट्यूशन फी के साथ रहने की जगह का खर्च भी वहन करना पड़ता है। हॉस्टल या पीजी, खाना-पीना, स्थानीय परिवहन और घर आने-जाने का खर्च भी उठाना पड़ता है। इसलिए रेजिडेंशयल कोचिंग की लागत और देशभर में प्राइवेट कोचिंग पर होने वाले औसत खर्च को महज एक ही आंकड़े से नहीं समझा जा सकता।
इस बहस में सबसे नया सरकारी डेटा राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी NSO के Comprehensive Modular Survey: Education 2025 रिपोर्ट से आता है। अप्रैल से जून 2025 के बीच हुए सर्वे के मुताबिक, प्राइवेट कोचिंग पर प्रति छात्र औसत सालाना घरेलू खर्च (household expenditure) शहरी क्षेत्रों में 3988 रुपये और ग्रामीण क्षेत्रों में 1793 रुपये था। हायर सेकंडरी स्तर पर यह औसत शहरी भारत में 9950 रुपये और ग्रामीण भारत में 4548 रुपये दर्ज किया गया।
ये राष्ट्रीय औसत हैं। इनकी तुलना सीधे कोटा के JEE-NEET रेजिडेंशियल मॉडल से नहीं की जा सकती। लेकिन डेटा एक जरूरी बात बताता है- भारत में कोचिंग पर खर्च का अनुभव एक जैसा नहीं है। एक तरफ स्थानीय ट्यूशन है तो दूसरी तरफ महंगे रेजिडेंशियल कोचिंग हब।
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एआई कहां बना रहा अपनी पैठ?
AI और डिजिटल लर्निंग इसी अंतर के बीच जगह बना रहे हैं। अब छात्र के पास पेड ऑनलाइन बैच के साथ फ्री विकल्प भी हैं। आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) और शिक्षा मंत्रालय से जुड़ा SATHEE JEE, NEET और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त लर्निंग रीसोर्सेज उपलब्ध कराता है। 2026 में इसका एआई-इनेबल्ड वर्जन conversational tutor, instant doubt support, personalised learning paths और performance analytics जैसी सुविधाओं के साथ सामने आया है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर छात्र की तैयारी का खर्च 3 लाख रुपये से घटकर 5000 रुपये हो गया है। फिलहाल ऐसा कोई डेटा मौजूद नहीं है। असली बदलाव यह है कि अच्छी तैयारी तक पहुंचने की शुरुआती लागत नीचे आई है। पहली बार छात्र के सामने विकल्प है कि वह शहर बदले बिना भी लेक्चर, टेस्ट, डाउट सपोर्ट और एआई-बेस्ड असिस्टेंट तक पहुंच सके।
दूसरा बदलाव: एक क्लास, एक टीचर, सैकड़ों बच्चे- क्या यह मॉडल टिकेगा?
भारत की कोचिंग इंडस्ट्री एक स्केल पर बनी।
एक शिक्षक। एक सिलेबस। एक टाइमटेबल। एक तय रफ्तार। पूरी क्लास उसी रफ्तार पर आगे बढ़ती है।
लेकिन हर छात्र की कमजोरी अलग होती है। एक छात्र मेकैनिक्स में अटकता है। दूसरा ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में। तीसरा कैलकुलस समझता है लेकिन कैलकुलेशन में गलती करता है। चौथे छात्र को कॉन्सेप्ट तो आता है मगर एग्जाम के प्रेशर में उसकी स्पीड कम हो जाती है।
ट्रेडिशनल क्लासरूम में शिक्षक के लिए हर छात्र की ऐसी माइक्रो-लेवल लर्निंग प्रोफाइल बनाना कठिन है। बड़े बैच में यह चुनौती और बढ़ती है। यहीं AI पुराने कोचिंग मॉडल की सबसे कमजोर नस पकड़ता है।
एडेप्टिव लर्निंग सिस्टम्स और लार्ज लैंग्वेज मॉड्यूल्स (Large Language Models) का लक्ष्य सिर्फ यह बताना नहीं है कि छात्र का जवाब गलत है। वे यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि गलती किस तरह की है। क्या कॉन्सेप्ट कमजोर है? क्या फॉर्मूला गलत चुना गया? क्या छात्र बार-बार एक ही पैटर्न में गलती कर रहा है?
2025 में माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च और फिजिक्सवाला (PhysicsWallah) ने AI-बेस्ड टयूशन को बेहतर बनाने के लिए साझेदारी का ऐलान किया था। इसका फोकस ऐसे ट्यूशन सिस्टम पर था जो छात्र के सवाल और लर्निंग कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से मदद कर सकें। सरकारी SATHEE प्लेटफॉर्म का AI-इनेबल्ड मॉडल भी इसी दिशा की ओर इशारा करता है।
यहां बदलाव बहुत बुनियादी है। पुरानी कोचिंग क्लास में शिक्षक पूछता है – ”किसे समझ नहीं आया?” AI-बेस्ड सिस्टम का वादा है- छात्र के पूछने से पहले उसकी गलतियों के पैटर्न से पता लगाया जाए कि उसे कहां दिक्कत है।
हालांकि दावे और हकीकत के बीच फर्क रखना जरूरी है। अभी ऐसा कोई सार्वजनिक राष्ट्रीय डेटा नहीं है जो साबित करे कि AI-बेस्ड पर्सनलाइज़ेशन से हर छात्र के परीक्षा परिणाम बेहतर हो रहे हैं। तकनीक की क्षमता मौजूद है लेकिन उसका असर प्लेटफॉर्म की क्वॉलिटी, डेटा, डिजाइन और छात्र के इस्तेमाल पर निर्भर करेगा।
तीसरा बदलाव: इंटरनेट की तरह क्या AI भी सबके पास पहुंचा?
AI ट्यूशन की कहानी स्मार्टफोन के बिना अधूरी है। NSO के Comprehensive Modular Survey: Telecom 2025 के मुताबिक भारत में करीब 86.3 प्रतिशत घरों में इंटरनेट का एक्सेस था। करीब 85.5 प्रतिशत घरों में कम-से-कम एक स्मार्टफोन था।
पहली नजर में यह AI-बेस्ड एजुकेशन के लिए बहुत बड़ा बाजार दिखाई देता है। लेकिन यहीं एक दूसरा आंकड़ा कहानी बदल देता है। ASER 2024 के मुताबिक ग्रामीण भारत में 14 से 16 साल के 89.1 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि उनके घर में स्मार्टफोन उपलब्ध है। 82.2 प्रतिशत ने कहा कि वे स्मार्टफोन इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन स्मार्टफोन इस्तेमाल कर सकने वाले बच्चों में सिर्फ 31.4 प्रतिशत के पास अपना फोन था। यानी घर में स्मार्टफोन होना और बच्चे के पास पढ़ाई के लिए अपना डिवाइस होना अलग बातें हैं।
एक ही फोन पिता के काम, मां के डिजिटल पेमेट और बच्चे की ऑनलाइन क्लास और घर में एंटरटेनमेंट के लिए इस्तेमाल हो सकता है। इसके अलावा यह भी संभावना है कि घर मेंं इंटरनेट उपलब्ध हो सकता है लेकिन कनेक्शन कमजोर हो।
AI ट्यूटर मौजूद हो सकता है लेकिन वह अंग्रेजी में बेहतर और स्थानीय भाषा में कमजोर हो सकता है कि कमजोर हो। इसलिए AI कोचिंग की लागत घटा सकता है लेकिन बराबरी नहीं ला सकता।
संभव है कि पुरानी असमानता- ‘कौन कोटा जा सकता है?’ की जगह नई असमानता पैदा हो जाए- ‘किसके पास अपना डिवाइस, बेहतर इंटरनेट और बेहतर AI टूल है?’
कोटा का प्रेशर कुकर और रात दो बजे का AI ट्यूटर
कोटा की कहानी सिर्फ कोचिंग की नहीं है। यह प्रेशर की भी कहानी है। 2023 और 2024 में कोचिंग के लिए आने वाले छात्रों की आत्महत्या ने देशभर में चिंता बढ़ाई। जुलाई 2024 में हुई राज्यसभा की चर्चा में कोटा में 2023 के दौरान 26 आत्महत्याओं की जानकारी दी गई। 2024 में उस समय तक 13 मामलों का जिक्र किया गया था।
इन मौतों का सिर्फ एक कारण नहीं है। पढ़ाई का दबाव, परिवार की उम्मीद, अकेलापन, पैसे की परेशानी के अलावा लगातार की जाने वाली तुलना और पहले से मौजूद मानसिक तनाव जैसे कई कारण इन मौतों के जिम्मेदार माने गए।
लेकिन कोचिंग क्लासरूम की एक छोटी-सी समस्या भी महत्वपूर्ण है- सवाल पूछने का डर। कई छात्र भरी क्लास में हाथ नहीं उठाते। उन्हें लगता है कि सवाल आसान हुआ तो दूसरे हंसेंगे। शिक्षक नाराज होगा। बैच की रफ्तार रुक जाएगी या बाकी छात्रों को लगेगा कि वह कमजोर है।
AI ट्यूटर इस झिझक को कम कर सकता है। छात्र एक ही सवाल दस बार पूछ सकता है। वह लिख सकता है- ‘मुझे बिल्कुल बेसिक से समझाओ।’ भाषा बदल सकता है। रात दो बजे सवाल पूछ सकता है, दोपहर के दो बजे भी। उसे यह चिंता नहीं होती कि क्लास में बैठे अन्य छात्र क्या सोचेंगे। यह AI की ऐसी ताकत है जिसे सिर्फ मार्क्स में नहीं मापा जा सकता।
लेकिन एक बात ध्यान देने वाली है कि एआई की लिमिट भी साफ है। AI ट्यूटर मेंटल-हेल्थ प्रोफेशनल नहीं है। वह गंभीर भावनात्मक परेशानी को गलत समझ सकता है। गलत सलाह दे सकता है। इसके अलावा प्राइवेसी का जोखिम हो सकता है। इसलिए AI को कोटा के मेंटल-हेल्थ परेशानी का समाधान कहना गलत होगा। लेकिन सीखने से जुड़ी झिझक और पढ़ाई से जुड़ी किसी भी तरह की तुरंत मदद की कमी को कुछ हद तक कम कर सकता है।
सबसे बड़ा खतरा: AI कम कर रहा सोचने की क्षमता?
वो कहते हैं ना कि जो चीज बहुत ज्यादा फायदा देती है, उसके कुछ नुकसान भी होते ही हैं। एआई भी इससे परे नहीं है। एआई की सबसे बड़ी ताकत उसका सबसे बड़ा खतरा भी है-तुरंत जवाब। एआई और इंटरनेट के आने से पहले ऐसा कोई साधन नहीं था कि किसी सवाल का जवाब बिना सोचे या सीखे मिल जाए। कभी कठिन फिजिक्स, केमिस्ट्री या मैथ्स के सवाल पर छात्र लंबे समय तक कोशिश करता था। फॉर्मूला गलत लग जाता था। एक बार सॉल्यूशन नहीं मिलता तो दोबारा कोशिश होती, डायग्राम बनाए जाते। लेकिन अब यह तस्वीर बदल गई है।
एआई पर किसी सावल की एक फोटो अपलोड की और कुछ ही सेकंड में स्टेप-बाय-स्टेप पूरा जवाब आपके सामने। ना केवल जवाब बल्कि उस जवाब को कैसे निकला गया, पूरा फॉर्मूला और समझाने की स्टाइल में उत्तर मिल जाता है। दिमाग लगाए बिना जवाब मिल गया।
यानी बात एकदम साफ है कि सुविधा तो है लेकिन खतरा भी है।
अगर छात्र हर मुश्किल सवाल पर तुरंत AI खोलता है तो वह जवाब देख सकता है लेकिन प्रॉब्लम-सॉल्विंग प्रोसेस से नहीं गुजरता। उसे सॉल्यूशन समझ में आया हुआ महसूस हो सकता है लेकिन अगली अनदेखी समस्या में वही कॉन्सेप्ट लागू करना कठिन हो सकता है।
UNESCO ने generative AI in education पर अपनी गाइडेंस में ह्यूमन-सेंटर्ड अप्रोच,प्राइवेसी, उम्र के हिसाब से सुरक्षित जवाब और ह्यूमन एजेंसी बनाए रखने पर जोर दिया है। AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को लेकर एजुकेशन रिसर्चर भी सवाल उठा रहे हैं।
तो क्या खत्म हो जाएगा कोटा?
इस सवाल का जवाब है- शायद नहीं।
कोटा सिर्फ कन्टेन्ट नहीं बेचता। वह अनुशासन देता है। कॉम्पटिशन देता है। टाइमटेबल देता है। पीयर ग्रुप देता है। टेस्ट प्रेशर देता है। कई छात्रों को मेंटरशिप भी देता है।
घर बैठे छात्र के पास दुनिया का सबसे अच्छा AI ट्यूटर हो सकता है। लेकिन वह हर सुबह उसे टेस्ट देने नहीं बैठा सकता। वह हमेशा यह नहीं समझ सकता कि छात्र कॉन्सेप्ट में कमजोर है या पिछले कई दिनों से भावनात्मक तौर पर थका हुआ है। इसीलिए कोचिंग का भविष्य पूरी तरह ऑफलाइन या पूरी तरह ऑनलाइन होने की संभावना कम है।
नया मॉडल फिजिकल + AI हो सकता है। थियोरी और रोजमर्रा की दुविधा का बड़ा हिस्सा डिजिटल सिस्टम संभालें। एआई परफॉर्मेंस डेटा में कमजोरी पहचाने। ह्यूमन टीचर का काम मेंटरशिप, मोटिवेशन, स्ट्रेटजी और कठिन वैचारिक हस्तक्षेप की तरफ बढ़े।
इस बदलाव में कोचिंग इंस्टीट्यूट खत्म नहीं होंगे। लेकिन उनका काम बदल सकता है। आज छात्र कॉन्टेन्ट के लिए टीचर को पैसे देता है। कल वह शायद ह्यूमन अटेंशन के लिए पैसे दे और तब भारत की 58,000 करोड़ रुपये की कोचिंग इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होगा- जब एक गांव का छात्र भी अपने फोन पर पर्सनलाइज्ड ट्यूटर खोल सकता है तो क्या तैयारी का भूगोल अब भी कोटा और दिल्ली तय करेंगे? या फिर अगला ‘कोटा’ किसी शहर में नहीं, हर छात्र की जेब में होगा?
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