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जयपुर: तबेले के बाद अब पिंजरे में स्कूल! कूड़े के पास पढ़ रहे 86 बच्चे, सिर्फ 1 है टीचर

जयपुर: तबेले के बाद अब पिंजरे में स्कूल! कूड़े के पास पढ़ रहे 86 बच्चे, सिर्फ 1 है टीचर जयपुर में कई सरकारी स्कूलों के हालात काफी खराब हैं. जहां कुछ दिन पहले हमने तबेले बन चुके स्कूल की हालत दिखाई थी वहीं अब एक ऐसे स्कूल…

ABP News के अनुसार25 अगस्त 2026 को 11:55 am बजे
जयपुर: तबेले के बाद अब पिंजरे में स्कूल! कूड़े के पास पढ़ रहे 86 बच्चे, सिर्फ 1 है टीचर

सौजन्य से:- ABP News

जयपुर: तबेले के बाद अब पिंजरे में स्कूल! कूड़े के पास पढ़ रहे 86 बच्चे, सिर्फ 1 है टीचर

जयपुर में कई सरकारी स्कूलों के हालात काफी खराब हैं. जहां कुछ दिन पहले हमने तबेले बन चुके स्कूल की हालत दिखाई थी वहीं अब एक ऐसे स्कूल की कहानी बता रहे हैं जो कूड़े के बीच पिंजरानुमा बना है.

राजस्थान में सरकारी स्कूलों की बदहाली इन दिनों खूब सुर्खियों में है. चार दिन पहले हमने राजधानी जयपुर के रामपुरा कंवरपुरा इलाके में गाय भैंसों के तबेले में चलने वाले सरकारी स्कूल की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट दिखाई थी, लेकिन बदहाली और लापरवाही सिर्फ यही तक सीमित नहीं है. तबेले के बाद आज आपको जयपुर शहर के बीचो-बीच कूड़े खाने में बनाए गए पिंजरे में चलने वाले सरकारी स्कूल की तस्वीरें दिखाते हैं. आपको शायद आसानी से यकीन नहीं होगा, लेकिन हकीकत यही है कि यह सरकारी स्कूल कूड़ेखाने के बीच बने पिंजरे में ही संचालित हो रहा है.

राजस्थान की राजधानी जयपुर में मुख्यमंत्री कार्यालय, शिक्षा विभाग के हेड क्वार्टर, शिक्षा मंत्री के सरकारी आवास और विधानसभा सचिवालय से तकरीबन पांच से छह किलोमीटर की दूरी पर शास्त्री नगर के भट्टा बस्ती इलाके का यह मैदान कूड़ा घर में तब्दील है. पूरे इलाके के लोग इसी मैदान में कूड़ा फेंकते हैं. मैदान के बीचो-बीच बना पिंजरे नुमा यह कमरा गाय भैंसों का तबेला नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल है. यहां एक से पांचवी क्लास तक के छियासी बच्चे पढ़ाई करते हैं. इन बच्चों को पढ़ाने के लिए यहां दो टीचर्स की तैनाती है, लेकिन एक बीएलओ की ड्यूटी पर हैं, लिहाजा पांच क्लास के बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा सिर्फ एक टीचर पर है.

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पिंजरे के अंदर बच्चे, बाहर जानवर

एक नजर में यह जगह अजायब घर की तरह लगती है. फर्क सिर्फ इतना है कि चिड़ियाघर में जानवर पिंजरे के अंदर होते हैं और इंसान बाहर. यहां बच्चे पिंजरे के अंदर बैठकर पढ़ाई करते हैं और गाय भैंस व दूसरे जानवर पिंजरे से सट कर बाहर खड़े रहते हैं. एक तरफ पिंजरे के बाहर जानवर अंदर बैठे बच्चों को परेशान करते और चोट पहुंचाते दिखाई देते हैं तो वहीं दूसरी तरफ इलाके के बेरोजगार नशेड़ी युवक झुंड बनाकर यहां झांकते - नशा करते और बच्चों को डिस्टर्ब करते नजर आते हैं.

बारिश में टपकता है पानी

पहली से पांचवी क्लास तक का यह स्कूल सिर्फ़ एक कमरे के पिंजरेनुमा कमरे में चलता है. पूरे स्कूल को जिस इकलौते ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाया जाता है, वह कई जगहों से टूटा हुआ है. पिंजरे की कोई छत नहीं है और ऊपर टिन शेड लगा हुआ है. टिन शेड भी जर्जर हालत में है. बारिश में इस पर से पानी टपकता है. बारिश में पूरा मैदान तालाब बन जाता है और स्कूल तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है. स्कूल के इकलौते टीचर यज्ञ शर्मा के मुताबिक अधिकारियों को प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है और जल्द ही यहां नई बिल्डिंग बनाने की मंजूरी मिल जाएगी.

नहीं है बिजली का कनेक्शन

कूड़े की दुर्गंध अक्सर बच्चों व टीचर को बीमार कर देती हैं. तमाम बच्चे कूड़े के ढेर से होकर स्कूल आने और जाने को मजबूर होते हैं. पिंजरे में वैसे तो तीन पंखे भी लगे हुए हैं, लेकिन बिजली का कनेक्शन नहीं होने से यह शोपीस बनकर रहते हैं. कई बार पड़ोस के मंदिर वाले यहां एक तार खींच देते हैं तो उधार की बिजली से एक पंखा चल जाता है. कहने को अंदर के हिस्से में एक शौचालय भी है लेकिन उसमें ना तो दरवाजा है और ना ही पानी होता है. पिंजरे वाले स्कूल में बच्चे कुर्सी या बेंच पर नहीं बल्कि फटी हुई दरी पर बैठकर पढ़ाई करते हैं. पिंजरे के बाहर नशे के सामान और गंदगी की भरमार रहती है. चारों तरफ कचरा फैला हुआ दिखाई देता है.

सिस्टम पर खड़े हो रहे सवाल

शिक्षक नेता अमीन कायमखानी का कहना है कि राजधानी जयपुर के शहरी इलाके का यह स्कूल हमारे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है. समझा जा सकता है कि अगर राजधानी जयपुर में मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के दफ्तर के पास के स्कूल का यह हाल है तो दूर दराज के जिलों के ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों की हालत क्या होगी.

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