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राजस्थान- मारपीट-ट्रैक्टर से कुचलकर हुई थी 5 दलितों की हत्या: मर्डर करने वालों को नहीं ढूंढ पाई CBI; जानें- क्यों छूट गए सारे आरोपी - Rajasthan News

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Dainik Bhaskar के अनुसार6 अगस्त 2026 को 11:15 am बजे
राजस्थान- मारपीट-ट्रैक्टर से कुचलकर हुई थी 5 दलितों की हत्या:  मर्डर करने वालों को नहीं ढूंढ पाई CBI; जानें- क्यों छूट गए सारे आरोपी - Rajasthan News

सौजन्य से:- Dainik Bhaskar

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भास्कर एक्सक्लूसिवराजस्थान- मारपीट-ट्रैक्टर से कुचलकर हुई थी 5 दलितों की हत्या:मर्डर करने वालों को नहीं ढूंढ पाई CBI; जानें- क्यों छूट गए सारे आरोपी

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राजस्थान के बहुचर्चित डांगावास हत्याकांड मामले में 11 साल बाद आए कोर्ट के फैसले में सभी 40 आरोपी बरी हो गए। करीब 23 बीघा जमीन को लेकर हुए विवाद में 5 दलितों की हत्या हुई थी। वहीं, दूसरे पक्ष से रामपाल पुरी नाम के शख्स की गोली लगने से मौत हो गई थी।

कोर्ट ने 245 पन्नों के अपने फैसले में साफ लिखा- पांचों मौतें 14 मई 2015 की हिंसक घटना में हुईं। लेकिन इसे कारित करने वाले कौन हैं? ये सीबीआई के जुटाए सबूतों से साबित नहीं हो पाया।

भास्कर ने कोर्ट के फैसले की कॉपी, सीबीआई की चार्जशीट का एनालिसिस किया। मामले में पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं से बात कर उन कारणों की पड़ताल की, जिनके चलते यह मामला कोर्ट में टिक नहीं पाया। पढ़िए ये इन्वेस्टिगेशन स्टोरी…

डांगावास हत्याकांड : 14 मई 2015 को क्या हुआ था?

नागौर के डांगावास गांव में 23 बीघा जमीन के कब्जे को लेकर दो पक्ष आमने-सामने आ गए। घायल अर्जुनराम मेघवाल ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि कानाराम, ओमाराम समेत 200-250 लोग ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल और हथियारों के साथ खेत में घुस आए। आरोप था- हमलावरों ने मारपीट की और ट्रैक्टर चढ़ा दिया, जिसमें अर्जुनराम पक्ष के रतनाराम, पोखरराम, पांचाराम, खेमाराम और गणपतराम मेघवाल की मौत हो गई।

वहीं, इस दौरान दूसरे पक्ष के रामपाल पुरी की गोली लगने से मौत हुई और एक अन्य व्यक्ति घायल हो गया। अर्जुनराम की रिपोर्ट पर पुलिस ने हत्या, हत्या के प्रयास, दंगा और एससी-एसटी एक्ट सहित कई धाराओं में मामला दर्ज किया था। मामले में CBI ने जांच पूरी कर चार्जशीट पेश की थी।

1. सबसे बड़ी कमजोरी- किसी गवाह ने नहीं बताया किसने किसकी हत्या की

कोर्ट के फैसले का सबसे अहम आधार यही रहा कि मृतकों के सबसे करीबी परिजन भी यह नहीं बता सके कि हमला किस आरोपी ने किया।

- मृतक रतनाराम के दोनों बेटे और पत्नी किसी हमलावर की पहचान नहीं कर सके।

- पांचाराम की पत्नी ने भी किसी आरोपी का नाम नहीं लिया, जबकि उनके बेटे ने पिता की मौत कमरे के ढहने से होना बताया।

- पोखरराम और गणपतराम के मामले में भी गवाह लगातार यही कहते रहे कि उन्हें नहीं पता कि किसने हमला किया।

- गणेशराम के मामले में तो किसी आरोपी पर प्रत्यक्ष हत्या का आरोप ही रिकॉर्ड में नहीं था।

ऐसी स्थिति में कोर्ट ने माना कि 14 मई को हुई इस घटना में 5 मौतें हुई जरूर हैं, लेकिन उन्हें किसी विशेष आरोपी से जोड़ना संभव नहीं है।

2. प्री प्लान हत्या के इरादे से आई थी भीड़? गवाहों के बयानों से नहीं हो पाया साबित

सीबीआई ने चार्जशीट में दावा किया था कि आरोपी पहले से हत्या की प्लानिंग कर ट्रैक्टरों- हथियारों के साथ खेत पर पहुंचे थे। लेकिन गवाहों के बयान इस कहानी को साबित नहीं कर पाए।

एक गवाह सोनकी देवी ने बताया कि पीड़ित पक्ष को पहले से सूचना थी कि गांव के लोग समझौते के लिए विवादित खेत पर जमा हो सकते हैं। इसी सूचना के बाद पीड़ित पक्ष का पूरा परिवार भी खेत पर पहुंच गया था।

उन्होंने यह भी बताया कि भीड़ आने के बाद करीब 20-25 मिनट तक खेमाराम और मुन्नाराम हाथ जोड़कर लोगों से झगड़ा नहीं करने की गुहार लगाते रहे।

कोर्ट ने कहा कि यदि दोनों पक्षों के बीच इतनी देर तक बातचीत और समझाने की कोशिश हुई तो यह मानना मुश्किल है कि भीड़ शुरू से ही केवल हत्या करने के इरादे से आई थी।

3. कोर्ट ने नहीं माना एकतरफा हमला, दो पक्षों के बीच संघर्ष

एक अन्य प्रमुख गवाह और हमले में घायल श्रवणराम ने बयान दिया कि करीब एक घंटे तक दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाजी होती रही और उसी दौरान वह घायल हुआ।

कोर्ट ने माना कि डांगावास प्रकरण एकतरफा हमला नहीं था। दोनों पक्षों के बीच हिंसक संघर्ष की ओर संकेत करता है। मामले में एक और गवाह ने कोर्ट को बताया कि बड़ी भीड़ खेत में नहीं बल्कि करीब डेढ़-दो किलोमीटर दूर बस स्टैंड पर मौजूद थी। इससे सीबीआई का यह दावा भी कमजोर पड़ गया कि 250-300 लोग सीधे खेत पर हमला करने पहुंचे थे।

4. हमले के 40 आरोपियों की पहचान ही नहीं हो सकी

सीबीआई ने चार्जशीट में जिन 40 लोगों पर हत्या, हत्या के प्रयास और दंगा फैलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए, गवाह उन सभी 40 आरोपियों की पहचान समान तरीके से नहीं कर पाए।

घटना के दो घंटे के भीतर जांच अधिकारी के पास केवल 13 लोगों के नाम थे। बाद में आरोपियों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन अदालत में उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं हो सकी।

कोर्ट ने कहा कि जब यह साबित ही नहीं हो पाया कि कौन व्यक्ति अवैध भीड़ का हिस्सा था, तब उसके खिलाफ सामूहिक अपराध का सबूत क्या है?

5. हथियार किसके हाथ में थे- यह साबित नहीं हुआ

कोर्ट ने माना कि घटनास्थल पर लाठियां, सरिए, कुल्हाड़ी, धारदार हथियार, मोटरसाइकिल की चेन और पत्थरों का इस्तेमाल हुआ था। लेकिन सीबीआई यह साबित नहीं कर सकी कि किस आरोपी के हाथ में कौन-सा हथियार था।

कोर्ट ने जजमेंट में कहा- केवल हथियारों का इस्तेमाल होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी साबित होना चाहिए कि किस आरोपी ने उनका इस्तेमाल किया।

6. ट्रैक्टर से कुचलने का आरोप भी साबित नहीं हुआ

मामले में आरोप था कि मानाराम डांगा ने ट्रैक्टर से झोपड़ी और कमरा तोड़ा और उसके बाद लोगों को कुचल दिया।

लेकिन जांच एजेंसी (सीबीआई) उस ट्रैक्टर को ही बरामद नहीं कर सकी, जिससे कुचलने का आरोप था। न ही कोई गवाह अदालत में यह साबित कर पाया कि ट्रैक्टर मानाराम चला रहा था।

7. आगजनी के आरोप भी बदलते रहे

CBI जांच के शुरुआती चरण में ओमाराम, कानाराम और अन्य लोगों पर आगजनी के आरोप लगाए थे। लेकिन बाद में यही आरोप दीपूराम, श्यामलाल और मानाराम पर शिफ्ट हो गए। कोर्ट ने माना कि आरोपियों के नाम बदलते रहने से अभियोजन की कहानी कमजोर हुई।

8. जमीन पर कब्जे का विवाद भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ

सीबीआई ने अपनी जांच में बताया था कि विवादित 23 बीघा पांच बिस्वा जमीन 1964 में 1500 रुपए में चिमनाराम जाट के पास गिरवी रखी गई थी।

चिमनाराम की मौत के बाद उसके बेटों कानाराम और ओमाराम का कब्जा बना रहा। बाद में रतनाराम मेघवाल ने जमीन वापस लेने की कोशिश की और वहीं झोपड़ी व कमरा बनाकर रहने लगा। इसी कब्जे को लेकर विवाद बढ़ता गया।

लेकिन कोर्ट ने कहा कि घटना के समय विवादित भूमि पर किसका वैधानिक कब्जा था, यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया।

9. डॉक्टरों की रिपोर्ट में भी साबित नहीं हुआ सच

डॉक्टरों की तैयार पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से यह जरूर साबित हुआ कि पांचों की मौत घटना के दौरान लगी चोटों से हुई। लेकिन डॉक्टरों ने रिपोर्ट में यह भी माना कि रतनाराम और पोखरराम को लगी चोटें कमरा गिरने से भी संभव हो सकती हैं।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में पांचाराम की मौत पत्थर लगने से बताई गई। लेकिन गवाहों ने पत्थर फेंकने वाले किसी व्यक्ति का नाम नहीं बताया। अदालत ने कहा कि जब सैकड़ों लोगों की भीड़ में पत्थर चले हों तो यह तय करना असंभव है कि जानलेवा पत्थर किसने फेंका।

कोर्ट की टिप्पणी- 5 मौतें हुईं, लेकिन साक्ष्य साबित नहीं कर सके

कोर्ट ने जजमेंट में टिप्पणी करते हुए लिखा कि हालांकि सभी आरोपी दोषमुक्त हो रहे हैं, लेकिन यह तथ्य निर्विवाद रूप से साबित है कि दिनांक 14 मई 2015 की घटना में 5 व्यक्तियों की मौत हुई। ऐसे में इस दोषमुक्ति का यह अर्थ नहीं हैं कि अपराध घटित ही नहीं हुआ। इसका अर्थ मात्र यह है कि उसे कारित करने वाले व्यक्ति विधि-सम्मत साक्ष्य द्वारा तय नहीं किए जा सके।

कोर्ट ने मृतक के आश्रितों तथा सभी घायलों को SC/ST नियम 1995 व राजस्थान पीड़ित प्रतिकर स्कीम के तहत मुआवजा दिलाने के निर्देश दिए हैं।

देशभर में सुर्खियों में आया था मामला, सरकार ने सीबीआई जांच कराई

14 मई 2015 की यह घटना पूरे देश में दलित अत्याचार के रूप में चर्चा में आई थी। दलित संगठनों और विपक्ष के दबाव के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने जांच सीबीआई को सौंप दी।

सीबीआई ने जून 2015 में नई एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की। पहली चार्जशीट 14 अगस्त 2015 को मेड़ता कोर्ट में पेश की थी। इसमें 6 लोगों को आरोपी बनाया था। 17 अक्टूबर 2016 को दूसरी चार्जशीट पेश की। इसमें 34 और आरोपियों को शामिल किया। इस तरह कुल 40 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश की।

रामपाल पुरी की मौत के मामले में सीबीआई पहले ही 2017 में एफआर लगा चुकी थी। अब पांच दलितों की हत्या के मामले में भी अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

हाईकोर्ट जाएगा पीड़ित पक्ष

पीड़ित पक्ष के वकील एडवोकेट अब्दुल सलीम अंसारी ने बताया कि कोर्ट के जजमेंट पर कोई टिप्पणी ठीक नहीं है। हम इसका सम्मान करते हैं। हालांकि पीड़ित पक्ष इससे संतुष्ट नहीं है और अब उनके पास हाईकोर्ट जाने का विकल्प है। न्यायिक प्रक्रिया में निर्णय मिलना ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आम जन में उस निर्णय से मिलने वाले न्याय का महसूस होना भी जरूरी होता है।

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नागौर के डांगावास में 11 साल पहले 23 बीघा जमीन को लेकर हुए विवाद में 5 दलितों की हत्या कर दी गई थी। बुधवार को मेड़ता के एससी-एसटी स्पेशल कोर्ट के जज आशीष बिजराणियां ने फैसला सुनाते हुए सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। (CLICK कर पढ़ें)

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