मगरमच्छों का जालसाज़: कोटा के वीरेंद्र सिंह ने रिकॉर्ड 800 से ज्यादा मगरमच्छों को रेस्क्यू कर सुरक्षित किया
कोटा में वन्यजीवों का रेस्क्यू करने वाले वीरेंद्र सिंह ने 12 सालों में 800 से ज्यादा मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू किया है. राजस्थान के कोटा में हर साल 200 से 300 मगरमच्छों के रेस्क्यू होते हैं, लेकिन वीरेंद्र सिंह ने इस काम में अनूठी प्रतिभा दिखाई है.

सौजन्य से:- ETV Bharat
मैन VS क्रोकोडाइल: कोटा में वन्य जीवों का रेस्क्यू करने वाले जांबाज वीरेंद्र सिंह, अब तक 800 से ज्यादा मगरमच्छों को पकड़ा
कोटा में वन विभाग के वीरेंद्र सिंह पिछले 12 सालों में 800 से ज्यादा मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू किया है. पढ़िए मनीष गौतम की रिपोर्ट.
Published : July 23, 2026 at 2:56 PM IST
|Updated : July 23, 2026 at 3:23 PM IST
कोटा: राजस्थान का कोटा शहर इन दिनों शिक्षा नगरी के साथ-साथ एक अनोखी वन्यजीव चुनौती का केंद्र बन चुका है. चंबल नदी से निकलकर रिहायशी इलाकों, सड़कों और स्कूलों तक पहुंच रहे मगरमच्छों के कारण यहां 'मैन वर्सेस क्रोकोडाइल' जैसे हालात पैदा हो गए हैं. इस बेहद खतरनाक माहौल के बीच, कोटा वन विभाग के तकनीकी सहायक वीरेंद्र सिंह हाड़ा स्थानीय निवासियों के लिए संकटमोचक और वन्यजीवों के लिए रक्षक बनकर उभरे हैं. देश में सर्वाधिक 800 के आसपास मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू करने का अनोखा रिकॉर्ड बनाने वाले वीरेंद्र सिंह, आज कोटा में वन्यजीव संरक्षण की सबसे जांबाज मिसाल बन चुके हैं.
कोटा में रोजाना 2-3 रेस्क्यू: कैटल गार्ड के रूप में वन विभाग में अपना सफर शुरू करने वाले वीरेंद्र सिंह वर्तमान में तकनीकी सहायक के पद पर कार्यरत हैं. वे हर साल बारिश के सीजन में 100 से अधिक और रोजाना औसतन दो से तीन रेस्क्यू ऑपरेशनों को अंजाम देते हैं. कोटा की नहरों, खेतों और कॉलोनियों से 15 फीट तक के भारी-भरकम और आक्रामक मगरमच्छों को बिना किसी नुकसान के पकड़ना बेहद जोखिम भरा काम है, जिसे वीरेंद्र सिंह और उनकी टीम बेहद कुशलता से करती है. विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, पूरे देश में वीरेंद्र सिंह एकमात्र ऐसे जांबाज कर्मचारी हैं, जिन्होंने अकेले इतनी बड़ी संख्या में मगरमच्छों का रेस्क्यू कर उन्हें सुरक्षित दूसरी वाटर बॉडीज में पुनर्वासित किया है.
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हर सीजन में 200 से 300 रेस्क्यू: उप वन संरक्षक अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव बताते हैं कि कोटा में हर साल बड़ी संख्या में मगरमच्छों का रेस्क्यू किया जाता है. हर दिन कई कॉल्स आती हैं और टीम को तुरंत मौके पर भेजा जाता है. पूरे सीजन में कोटा जिले में 200 से 300 मगरमच्छों के रेस्क्यू हो जाते हैं. इसमें वीरेंद्र सिंह हाड़ा सबसे ज्यादा अनुभवी और एक्सपर्ट हैं. उन्होंने अब तक 800 से ज्यादा मगरमच्छों को पकड़कर सुरक्षित जगह पहुंचाया है.
परंपरागत तरीके से होता है रेस्क्यू: अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव के अनुसार, वीरेंद्र सिंह और उनकी टीम पूरी तरह परंपरागत तरीके से ही मगरमच्छों का रेस्क्यू करती है. टीम में धर्मेंद्र समेत अन्य सदस्य भी शामिल हैं. रेस्क्यू के लिए लंबे डंडे या बांस का इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही जूट की बोरी और मजबूत रस्सियों का सहारा लिया जाता है. उन्होंने बताया कि जैसे ही मगरमच्छ के करीब पहुंचकर उसकी आंखों पर जूट की बोरी डाल दी जाती है, वह थोड़ा शांत हो जाता है और हलचल कम कर देता है. इसी दौरान डंडे से उसे दबाया जाता है. ध्यान रखा जाता है कि उसे कोई चोट न लगे, फिर उसके पैरों के पंजों और मुंह को रस्सी से बांध दिया जाता है. इसके बाद मगरमच्छ को सावधानी से उठाकर वाहन में रखा जाता है और सुरक्षित बड़ी वाटर बॉडीज में छोड़ दिया जाता है. ज्यादातर मामलों में उन्हें चंबल नदी या सावन भादो डैम में छोड़ा जाता है.
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वीरेंद्र अकेले भी कर लेते हैं रेस्क्यू: वीरेंद्र सिंह मगरमच्छ रेस्क्यू में बेहद माहिर हो चुके हैं. उनका कहना है कि कई बार टीम को इकट्ठा होने में समय लगने या अन्य कारणों से उन्हें अकेले ही मौके पर जाना पड़ता है. खासकर जब मगरमच्छ किसी कॉलोनी या घर के आसपास पहुंच जाता है, तो लोगों में दहशत फैल जाती है. कभी-कभी लोग खुद उसे परेशान करने लगते हैं. दोपहर में टीम तैनात रहती है, लेकिन रात में सूचना मिलने पर टीम इकट्ठी होने में देरी हो सकती है. ऐसे में मगरमच्छ के भागने या घायल होने का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए वे अकेले ही स्थानीय लोगों की मदद से मगरमच्छ को काबू में कर लेते हैं.
आक्रोशित को कंट्रोल करना चुनौती: वीरेंद्र सिंह ने बताया कि कई बार मगरमच्छ भारी-भरकम 200 किलो तक और आक्रोशित होते हैं. वे हमला करने की मुद्रा में रहते हैं और इधर-उधर भागते भी हैं. उन्हें कंट्रोल करना बेहद मुश्किल होता है, फिर भी वीरेंद्र सिंह और उनकी टीम मेहनत से उन्हें पकड़ लेती है. मगरमच्छों के शहर में पहुंचने से न सिर्फ आम जनता को खतरा होता है, बल्कि मगरमच्छों को भी खतरा रहता है क्योंकि कई बार लोग उन पर हमला कर देते हैं.
वीरेंद्र सिंह ने बताया कि रेस्क्यू के दौरान वो कई बार घायल भी हो चुके हैं. उनके पंजों को चबाया गया, पंजों से चोटें लगीं, लेकिन फिर भी उन्होंने मगरमच्छों को सफलतापूर्वक पकड़ा. चोट लगने पर उन्होंने इलाज भी करवाया. उनका कहना है कि यह बेहद रिस्की काम है. खासकर बारिश के सीजन में जब मगरमच्छ पानी भरे खाली इलाकों में चले जाते हैं, तब जोखिम और बढ़ जाता है.
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2010 में शुरू हुआ वीरेंद्र का सफर: वीरेंद्र सिंह हाड़ा ने बताया कि उन्होंने 1986 में नौकरी जॉइन की थी. शुरू में अस्थायी तौर पर कैटल गार्ड के रूप में काम किया और 1988 में स्थायी हुए. उन्होंने बताया कि अब वे तकनीकी कार्य सहायक हैं. उनका पहला रेस्क्यू 2010 में कोटा शहर की एक कॉलोनी में हुआ था. काफी मशक्कत के बाद उन्होंने उस मगरमच्छ को काबू में किया. 2014 से उनकी ड्यूटी पूरी तरह रेस्क्यू टीम में लग गई है. वीरेंद्र औजारों के साथ ट्रेनिंग की जरूरत पर जोर देते हैं, लेकिन ज्यादातर काम जूट की बोरी, रस्सी, डंडे, बांस और बल्लियों से ही करते हैं. एक मगरमच्छ को पकड़ने में कभी 2 घंटे से ज्यादा समय लग जाता है, तो कभी 10-20 मिनट में काम हो जाता है. कई बार मगरमच्छ हिंसक होकर हमला भी कर चुके हैं.
200 किलो तक के मगरमच्छ पकड़े: चंबल नदी के इलाकों में भरपूर भोजन और अनुकूल वातावरण के कारण मगरमच्छों की आबादी तेजी से बढ़ रही है. चन्द्रलोई नदी, किशोर सागर, चंबल की नहरें और शहर के तालाब-नालों में वे पनप रहे हैं. वीरेंद्र सिंह 3 फीट से लेकर 15 फीट तक लंबे और 30 से 200 किलो वजन वाले मगरमच्छ पकड़ चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने बंदर, लंगूर, पैंथर, नीलगाय, सांभर, मोर और कबरबिज्जू जैसे अन्य वन्यजीवों का भी रेस्क्यू किया है. नान्ता, चन्द्रसेल, कालातालाब, कुन्हाड़ी, बोरखेड़ा, पूनम कॉलोनी, रायपुरा, देवली अरब रोड, नयानोहरा, हनुमंतखेड़ा, सोगरिया, किशोर सागर तालाब, बजरंग नगर, कंसुआ, थेकड़ा, सूरसागर समेत शहर और जिले के कई इलाकों में उनके रेस्क्यू ऑपरेशन हो चुके हैं.
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