होमखेलसियासी चर्चा: जयपुर में अगर बना बीजेपी का बोर्ड, तो कौन बनेगा मेयर? पार्टी के सामने होंगे ये विकल्प
खेल

सियासी चर्चा: जयपुर में अगर बना बीजेपी का बोर्ड, तो कौन बनेगा मेयर? पार्टी के सामने होंगे ये विकल्प

सियासी चर्चा: जयपुर में अगर बना बीजेपी का बोर्ड, तो कौन बनेगा मेयर? पार्टी के सामने होंगे ये विकल्प जयपुर नगर निगम चुनाव में पार्षद प्रत्याशियों के नामांकन के साथ मेयर पद की सियासी चर्चा तेज हो गई है. Published : Septemb…

ETV Bharat के अनुसार1 सितंबर 2026 को 09:33 am बजे
सियासी चर्चा: जयपुर में अगर बना बीजेपी का बोर्ड, तो कौन बनेगा मेयर? पार्टी के सामने होंगे ये विकल्प

सौजन्य से:- ETV Bharat

सियासी चर्चा: जयपुर में अगर बना बीजेपी का बोर्ड, तो कौन बनेगा मेयर? पार्टी के सामने होंगे ये विकल्प

जयपुर नगर निगम चुनाव में पार्षद प्रत्याशियों के नामांकन के साथ मेयर पद की सियासी चर्चा तेज हो गई है.

Published : September 1, 2026 at 1:55 PM IST

जयपुर: जयपुर नगर निगम चुनाव के लिए भाजपा प्रत्याशियों के नामांकन दाखिल होने के साथ ही अब सियासी गलियारों में अगला बड़ा सवाल मेयर की कुर्सी को लेकर है. यदि चुनाव परिणाम में भाजपा नगर निगम में बहुमत हासिल करती है, तो पार्टी के सामने मेयर चयन में राजनीतिक, जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की चुनौती होगी. प्रत्याशियों की सूची में सामने आए प्रमुख चेहरों और पार्टी के पिछले राजनीतिक फैसलों को देखते हुए वैश्य समाज की दावेदारी फिलहाल मजबूत मानी जा रही है, हालांकि ब्राह्मण और राजपूत समाज के चेहरे भी पार्टी के विकल्पों में रहेंगे. मेयर का फैसला केवल जातीय समीकरण से नहीं होगा. पार्षदों की संख्या, संगठन में भूमिका, पार्टी नेतृत्व से समीकरण, वरिष्ठता, क्षेत्रीय संतुलन, महिला प्रतिनिधित्व और सबसे महत्वपूर्ण जीतने की क्षमता भी निर्णायक फैक्टर होंगे.

क्यों मजबूत हो रही वैश्य समाज की दावेदारी?: जयपुर की राजनीति में वैश्य समाज का पारंपरिक प्रभाव रहा है. इस बार भाजपा ने परकोटे और आसपास के इलाकों में वैश्य समाज के कई प्रमुख राजनीतिक चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा है. इसे केवल वार्ड स्तर की रणनीति नहीं बल्कि विधानसभा स्तर के समीकरण साधने की कवायद के तौर पर भी देखा जा रहा है. भाजपा ने पूर्व शहर अध्यक्ष सुनील कोठारी को वार्ड 112 से मैदान में उतारा है. कोठारी संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं और शहर भाजपा की राजनीति में उनका अनुभव महत्वपूर्ण माना जाता है. उनके साथ कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुई पूर्व मेयर ज्योति खंडेलवाल को वार्ड 110 से टिकट दिया गया है. खंडेलवाल पहले कांग्रेस के टिकट पर जयपुर की मेयर रह चुकी हैं और जयपुर की शहरी राजनीति का लंबा अनुभव उनके पक्ष में जाता है. इसके अलावा विकास कोठारी को वार्ड 116 से टिकट दिया गया है.

वहीं विमल अग्रवाल को लेकर भी पार्टी का फैसला चर्चा में रहा. विधायक स्तर पर विरोध की चर्चाओं के बावजूद उन्हें टिकट दिया गया. माना जा रहा है कि किशनपोल और आदर्श नगर विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के मजबूत राजनीतिक आधार को देखते हुए भाजपा ने सामाजिक समीकरणों को साधने की रणनीति अपनाई है. इन चेहरों को एक साथ देखें, तो वैश्य समाज की राजनीतिक मौजूदगी इस बार निगम में पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली हो सकती है. यही वजह है कि भाजपा का बोर्ड बनने की स्थिति में मेयर पद के लिए वैश्य समाज से किसी मजबूत चेहरे को मौका मिलने की चर्चा ने जोर पकड़ा है.

पढ़ें: छोटा चुनाव, बड़ा सियासी संदेश: जयपुर नगर निगम में BJP की टिकट रणनीति में महिला-मुस्लिम फैक्टर

प्रमुख नेताओं के राजनीतिक दावेदारी:

सुनील कोठारी : संगठन का अनुभव सबसे बड़ा प्लस पॉइंट

सुनील कोठारी भाजपा के पूर्व शहर अध्यक्ष रह चुके हैं. संगठन में उनकी लंबी सक्रियता और शहर की राजनीति की समझ उन्हें संभावित दावेदारों में अलग स्थान देती है. वार्ड 112 में उन्हें निवर्तमान मेयर कुसुम यादव का टिकट काटकर मैदान में उतारा गया है. यदि वे चुनाव जीतते हैं और भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता है तो संगठनात्मक अनुभव उनके पक्ष में बड़ा फैक्टर हो सकता है. हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व और निर्वाचित पार्षदों के समीकरण पर निर्भर करेगा.

ज्योति खंडेलवाल : मेयर का अनुभव सबसे बड़ी ताकत

ज्योति खंडेलवाल का नाम इस रेस में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे पहले ही जयपुर की मेयर रह चुकी हैं. उन्होंने प्रत्यक्ष मेयर चुनाव में भाजपा की सुमन शर्मा को हराकर मेयर पद हासिल किया था. हालांकि उस समय नगर निगम बोर्ड भाजपा का था. 2023 में विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुई ज्योति खण्डेलवाल को विधानसभा और लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाने की चर्चाओं ने खूब जोर पकड़ा था, लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया था. वार्ड 110 से मैदान में उतरने के बाद यदि वे जीतती हैं, तो उनके पास मेयर पद का पूर्व अनुभव एक मजबूत राजनीतिक आधार हो सकता है. महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी उनका नाम पार्टी के सामने एक विकल्प बन सकता है. हालांकि प्रदेश के 10 नगर निगम में 6 महिलाओं के लिए आरक्षित है, ऐसे में शेष चार में भी महिला को मेयर बनाया जाए इसको लेकर अड़चन आ सकती है.

पुनीत कर्णावत : टिकट विवाद से चर्चा में आया चेहरा

पूर्व डिप्टी मेयर पुनीत कर्णावत का नाम भी मेयर पद की संभावित रेस में चर्चा में है. वार्ड 76 में टिकट को लेकर अंतिम समय तक चले घटनाक्रम ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया. पहले कुलदीप मिश्रा के नाम पर अधिकृत सिंबल दिए जाने और नामांकन दाखिल होने के बाद पार्टी नेतृत्व द्वारा पुनीत कर्णावत का नाम तय किए जाने का घटनाक्रम भाजपा की अंदरूनी चुनावी प्रक्रिया को लेकर चर्चा का विषय बना. कर्णावत का पूर्व डिप्टी मेयर का अनुभव उनके पक्ष में जाता है. यदि वे चुनाव जीतते हैं तो निगम की कार्यप्रणाली और शहरी राजनीति का उनका अनुभव मेयर पद की दावेदारी में महत्वपूर्ण हो सकता है.

विमल अग्रवाल और विमल कटियार भी विकल्प:

वैश्य समाज से विमल अग्रवाल और विमल कटियार के नाम भी में हैं. विमल अग्रवाल का टिकट स्थानीय राजनीतिक विरोध के बावजूद होना पार्टी के भीतर उनके महत्व की ओर संकेत करता है. वहीं विमल कटियार भी पार्टी के संभावित विकल्पों में रह सकते हैं. हालांकि मेयर पद की वास्तविक रेस चुनाव परिणाम के बाद ही स्पष्ट होगी. जिस चेहरे के पीछे निर्वाचित पार्षदों का समर्थन और संगठन का भरोसा सबसे अधिक होगा, उसका दावा मजबूत होगा.

ब्राह्मण-राजपूत फैक्टर को भी नजरअंदाज नहीं करेगी बीजेपी: मेयर के समीकरण में ब्राह्मण समाज को भी पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती. राजस्थान में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और जयपुर के सांसद मंजू शर्मा, ब्राह्मण समाज से हैं. ऐसे में एक राजनीतिक तर्क यह भी है कि प्रदेश और लोकसभा स्तर पर ब्राह्मण प्रतिनिधित्व होने के कारण स्थानीय सरकार में पार्टी किसी दूसरे सामाजिक समूह को प्रतिनिधित्व देकर संतुलन बना सकती है. लेकिन यदि चुनाव परिणाम या पार्षदों के समीकरण में ब्राह्मण समाज के किसी मजबूत चेहरे की स्थिति बनती है तो पार्टी इस विकल्प को भी खुला रख सकती है.

राजपूत समाज भी मेयर की रेस से बाहर नहीं है. राज्य की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी और जयपुर ग्रामीण सांसद राव राजेंद्र सिंह राजपूत समाज से आते हैं. ऐसे में पार्टी के पास इस समाज को स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व देने का विकल्प भी मौजूद रहेगा. इसलिए मेयर चयन में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि किस समाज के कितने पार्षद जीते हैं, बल्कि पार्टी यह भी देखेगी कि राजधानी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का व्यापक सामाजिक संतुलन किस दिशा में जाता है.

पढ़ें: आरक्षण लॉटरी से खत्म हुआ इंतजार, साफ हुई जयपुर के वार्डों की चुनावी तस्वीर, 63 वार्ड अनारक्षित

जातीय समीकरण से ज्यादा जरूरी राजनीतिक संतुलन: वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक श्यामसुंदर शर्मा के मुताबिक मेयर का चुनाव हमेशा केवल जातीय गणित से तय नहीं होता. भाजपा के सामने जयपुर में कई स्तरों पर संतुलन बनाने की चुनौती होगी. एक तरफ पार्टी को संगठन के पुराने और अनुभवी चेहरों को महत्व देना होगा, दूसरी तरफ नए सामाजिक समीकरणों और विधानसभा क्षेत्रों की राजनीतिक जरूरतों को भी देखना होगा. ब्राह्मण समाज से मुख्यमंत्री और जयपुर शहर सांसद है, इसी तरह से राजपूत समाज से डिप्टी सीएम और जयपुर ग्रामीण सांसद है. ऐसे में पार्टी वैश्य समाज पर दांव खेल सकती है. वैश्य समाज से कई मजबूत चेहरे चुनाव जीतकर निगम में आते हैं तो उनकी सामूहिक संख्या और संगठन में स्वीकार्यता मेयर की रेस को प्रभावित कर सकती है.

अंतिम फैसला चुनाव परिणाम के बाद: फिलहाल भाजपा के सामने पहला लक्ष्य नगर निगम में बहुमत हासिल करना है. इसके बाद मेयर पद के लिए असली सियासी कवायद शुरू होगी. कौन सा समाज सबसे अधिक पार्षद देता है, किस चेहरे की जीत कितनी बड़ी होती है, किसके पीछे कितने पार्षद खड़े होते हैं और पार्टी नेतृत्व किस नाम पर सहमत होता है—इन सभी फैक्टर का असर होगा. इस लिहाज से सुनील कोठारी, ज्योति खंडेलवाल, पुनीत कर्णावत, विमल अग्रवाल, विमल कटियार, शैलेन्द्र भार्गव और दीपा नाथावत जैसे नाम चर्चा में हैं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक संकेतों में वैश्य समाज की दावेदारी सबसे ज्यादा चर्चा में है. अब 9 और 11 सितंबर के मतदान और 14 सितंबर के परिणाम के बाद ही तय होगा कि जयपुर की शहरी सरकार की कमान किस सामाजिक और राजनीतिक चेहरे के हाथों में जाती है.

Powered by Reporting Rajasthan Files

संबंधित ख़बरें