राजस्थान निकाय चुनाव: बीजेपी-कांग्रेस दोनों के लिए चिंता
Sign In Advertisement X राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव 2026 के परिणाम सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए जीत का उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है. कुल वार…

सौजन्य से:- AajTak
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राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव 2026 के परिणाम सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए जीत का उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है. कुल वार्डों के हिसाब से भाजपा आगे रही है. दस हजार से अधिक वार्डों में पार्टी ने चार हजार से अधिक सीटें जीतीं, कांग्रेस साढ़े तीन हजार के आसपास रही और निर्दलीय दो हजार से अधिक वार्डों पर काबिज हुए. यानि आंकड़ों के इस खेल में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी जरूर दिखती है, पर बीजेपी से अधिक उसके विरोधियों को सीट मिलती नजर आ रही है. दस नगर निगमों का नक्शा पार्टी की असली चिंता उजागर करता है. पांच निगमों पर भाजपा का नियंत्रण या मजबूत स्थिति बनी, तीन पर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और जोधपुर में दोनों प्रमुख दलों के बीच बराबरी का समीकरण बन गया. भरतपुर में तो निर्दलीय हावी रहे. जाहिर है कि इस तरह के रिजल्ट को सत्ताधारी दल के लिए सामान्य नहीं माना जा सकता.
स्थानीय निकाय चुनावों में सत्ता का फायदा हमेशा रहता है. सरकारी अमला, विकास कार्यों का प्रचार, अनुदान और प्रशासनिक मशीनरी सत्तारूढ़ दल के पक्ष में काम करती है. राजस्थान में भाजपा सरकार दो साल से अधिक समय से है. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में पार्टी ने इन चुनावों को अपनी लोकप्रियता की परीक्षा के रूप में लिया था. इसके बावजूद बड़े शहरों में वह अपेक्षित दबदबा नहीं बना सकी. उदयपुर, भीलवाड़ा और कोटा में भाजपा ने बहुमत हासिल किया. जयपुर में भी वह आगे रही. पर बीकानेर में कांग्रेस ने दस साल बाद स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर वापसी की. अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. जोधपुर में 44-44 का टाई दोनों दलों की ताकत को दिखाता है. भरतपुर, जो मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र है, में निर्दलीयों का दबदबा सत्ताधारी दल के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है.
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यह परिणाम भाजपा सरकार की लोकप्रियता में गिरावट के संकेत देते हैं. महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर नागरिक सुविधाओं की शिकायतें मतदाताओं को प्रभावित कर रही हैं. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गढ़ झालावाड़ में कांग्रेस की बड़ी जीत इसी का प्रमाण है. पाली जैसे क्षेत्रों में भी भाजपा को झटका लगा. दिग्गज नेताओं के अपने वार्ड भी नहीं बच सके. अशोक गहलोत और गजेंद्र सिंह शेखावत के गृह वार्डों में हार व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से अधिक पार्टी की जमीनी पकड़ पर सवाल उठाती है. निकाय चुनाव अक्सर आगामी विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माने जाते हैं. 2028 के राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले ये नतीजे भाजपा के लिए आरामदायक नहीं हैं.
कांग्रेस के लिए भी ये परिणाम पूरी तरह संतोषजनक नहीं कहे जा सकते. पार्टी कुछ महत्वपूर्ण निगमों और परिषदों में आगे रही, पर समग्र रूप से वह भाजपा के करीब भी नहीं पहुंच सकी. विपक्ष की एकजुटता का अभाव साफ दिख रहा है. आम आदमी पार्टी ने बारां नगर परिषद में 60 में से 31 वार्ड जीतकर बहुमत हासिल किया. यह राजस्थान में आप की पहली बड़ी स्थानीय सफलता है. माकपा ने नोखा नगरपालिका में 45 में से 29 वार्ड जीते और कांग्रेस को शून्य पर सिमटा दिया. उदयपुर निगम में भी माकपा को एक सीट मिली. ये सफलता कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध का संकेत हैं. अगर विपक्षी का वोट आप, माकपा, आरएलपी और निर्दलीयों में बंटता रहा तो भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा. कांग्रेस के लिए यह चिंता का विषय है कि वह खुद को एकमात्र मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित नहीं कर पा रही.
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निर्दलीय प्रत्याशियों की बड़ी संख्या एक और महत्वपूर्ण पहलू है. दो हजार से अधिक वार्डों पर उनकी जीत कई निकायों में उन्हें किंगमेकर बना देगी. जोधपुर, पाली, अजमेर, अलवर और भरतपुर जैसे स्थानों पर बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों का समर्थन निर्णायक होगा. यह स्थिति स्थानीय राजनीति को और अधिक जटिल बनाने वाली है. पार्टियां अब मेयर और अध्यक्ष पद के चुनाव में सौदेबाजी करेंगी. 21 सितंबर को होने वाले इन चुनावों में नए समीकरण बन सकते हैं.
ये नतीजे राजस्थान की राजनीति को तीन संदेश देते हैं. पहला, सत्ताधारी दल को अहंकार छोड़कर जमीनी मुद्दों पर ध्यान देना होगा. विकास के दावे पर्याप्त नहीं, अगर नागरिकों को रोजमर्रा की सुविधाएं नहीं मिल रही हों. दूसरा, कांग्रेस को अपनी संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक कलह दूर करनी होगी, वरना तीसरे मोर्चे का उदय उसके लिए घातक सिद्ध होगा. तीसरा, मतदाता अब केवल राष्ट्रीय मुद्दों या चेहरों से प्रभावित नहीं हो रहे. स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि और कामकाज ज्यादा मायने रख रहे हैं.
राजस्थान निकाय चुनाव 2026 भाजपा की बढ़त के बावजूद उसके लिए चिंता का कारण हैं. कांग्रेस के लिए भी यह चेतावनी है कि विपक्षी जगह खाली नहीं रखेगी. जनता ने साफ संकेत दिया है कि सत्ता का दुरुपयोग या विपक्ष की निष्क्रियता दोनों स्वीकार्य नहीं. अब दोनों प्रमुख दल इस जनादेश को कितनी गंभीरता से लेते हैं, यही आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगा. निकाय चुनाव छोटे लग सकते हैं, पर ये लोकतंत्र की सबसे करीबी परीक्षा होते हैं. राजस्थान के मतदाताओं ने इस बार सत्ता और विपक्ष दोनों को आईना दिखाया है.
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