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राजस्थान निकाय चुनाव में टिकट की तस्वीर साफ; बागी और युवा तय करेंगे खेल

राजस्थान निकाय चुनाव में टिकट की तस्वीर साफ; बागी और युवा तय करेंगे खेल नामांकन के दौरान कई निकायों में टिकट को लेकर दोनों प्रमुख दलों में अंदरूनी खींचतान देखने को मिली। कई दावेदार टिकट नहीं मिलने से नाराज हैं और उन्होंन…

Hindustan के अनुसार1 सितंबर 2026 को 04:33 am बजे
राजस्थान निकाय चुनाव में टिकट की तस्वीर साफ; बागी और युवा तय करेंगे खेल

सौजन्य से:- Hindustan

राजस्थान निकाय चुनाव में टिकट की तस्वीर साफ; बागी और युवा तय करेंगे खेल

नामांकन के दौरान कई निकायों में टिकट को लेकर दोनों प्रमुख दलों में अंदरूनी खींचतान देखने को मिली। कई दावेदार टिकट नहीं मिलने से नाराज हैं और उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल कर दिया है।

राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव 2026 के लिए नामांकन की प्रक्रिया सोमवार, 31 अगस्त को पूरी हो गई। नामांकन खत्म होने के साथ ही 309 नगरीय निकायों के 10,245 वार्डों में चुनावी तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। हालांकि असली मुकाबले की तस्वीर 3 सितंबर को नाम वापसी के बाद सामने आएगी। अब बीजेपी और कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती अपने अधिकृत प्रत्याशियों के सामने खड़े बागियों को मनाने की है। इसके बाद 4 सितंबर को चुनाव चिन्ह आवंटित होते ही चुनाव पूरी तरह मैदान में उतर जाएगा।

राज्य में इस बार 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगर पालिकाओं में चुनाव होने हैं। करीब 1.44 करोड़ मतदाता इन चुनावों में वोट डालेंगे। ऐसे में निकाय चुनाव सिर्फ पार्षद चुनने का चुनाव नहीं है, बल्कि इसे बीजेपी और कांग्रेस के लिए जमीनी पकड़ और संगठन की ताकत परखने वाले बड़े राजनीतिक टेस्ट के तौर पर देखा जा रहा है।

टिकट बंटवारे के बाद अब बागियों की परीक्षा

नामांकन के दौरान कई निकायों में टिकट को लेकर दोनों प्रमुख दलों में अंदरूनी खींचतान देखने को मिली। कई दावेदार टिकट नहीं मिलने से नाराज हैं और उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल कर दिया है। अब बीजेपी और कांग्रेस दोनों का फोकस ऐसे नेताओं और कार्यकर्ताओं पर है, जो अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर गए हैं।

3 सितंबर तक नाम वापसी का समय राजनीतिक दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पार्टी नेतृत्व की कोशिश होगी कि बागियों को समझाकर नाम वापस कराया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बागी उम्मीदवार सीधे तौर पर अधिकृत प्रत्याशी के वोट काट सकते हैं। खासकर उन वार्डों में इसका असर ज्यादा हो सकता है, जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला पहले से ही कांटे का है।

जयपुर जैसे बड़े नगर निगमों में टिकट वितरण को लेकर आखिरी समय तक चली कवायद ने पार्टी नेतृत्व की चिंता और बढ़ा दी है। कई जगह उम्मीदवारों को सार्वजनिक सूची के बजाय सीधे पार्टी सिंबल देने की रणनीति अपनाई गई। इसके पीछे संभावित बगावत को नियंत्रित करने की कोशिश मानी जा रही है।

58 लाख युवा मतदाता बदल सकते हैं समीकरण

इस चुनाव में युवा वोटर भी बड़ा फैक्टर हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 18 से 25 साल के 21.30 लाख और 26 से 35 साल के 36.60 लाख मतदाता हैं। यानी 18 से 35 साल की उम्र के करीब 57.90 लाख मतदाता इन चुनावों में वोट डालेंगे।

स्थानीय चुनाव में सड़क, सफाई, पानी, सीवरेज, रोजगार और शहरी सुविधाएं जैसे मुद्दे युवा मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए सोशल मीडिया से लेकर वार्ड स्तर के प्रचार तक युवाओं को साधना बड़ी चुनौती होगी।

33% महिला आरक्षण से बदला चुनावी गणित

निकाय चुनाव में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण भी राजनीतिक समीकरण बदलने वाला है। 10,245 वार्डों में करीब 3,356 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। आरक्षण सामान्य वर्ग के साथ-साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य आरक्षित श्रेणियों में भी लागू है।

इसका मतलब है कि हजारों परिवारों और स्थानीय राजनीतिक समूहों में पहली बार महिलाओं की सीधी राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी। निकाय प्रमुख पदों के आरक्षण में भी महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिला है। करीब 101 निकाय प्रमुख पद महिलाओं के लिए आरक्षित बताए गए हैं।

चार बड़े निगमों में मेयर पद अनारक्षित

बड़े नगर निगमों में सबसे ज्यादा राजनीतिक दिलचस्पी जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और बीकानेर को लेकर है। इन चारों निगमों में महापौर पद अनारक्षित रखा गया है। ऐसे में यहां पुरुष और महिला दोनों उम्मीदवारों के लिए मेयर की दौड़ खुली है।

बाकी छह नगर निगमों में अलग-अलग आरक्षण श्रेणियां लागू हैं। यही वजह है कि इन बड़े शहरों के निकाय चुनाव को सिर्फ स्थानीय राजनीति के बजाय प्रदेश की राजनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

छोटे दल और निर्दलीय बिगाड़ेंगे खेल?

बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई वाले वार्डों में आरएलपी, भारत आदिवासी पार्टी, एआईएमआईएम, एसडीपीआई, आम आदमी पार्टी समेत अन्य दल और निर्दलीय उम्मीदवार मुकाबले को त्रिकोणीय या बहुकोणीय बना सकते हैं।

खासकर मुस्लिम बहुल शहरी क्षेत्रों, आदिवासी इलाकों और ऐसे वार्डों में जहां बीजेपी-कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर कम रहता है, छोटे दलों और निर्दलीयों की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

अब आगे क्या होगा?

- 1 सितंबर: नामांकन पत्रों की जांच

- 3 सितंबर: नाम वापसी की अंतिम तारीख

- 4 सितंबर: चुनाव चिन्हों का आवंटन

- 9 सितंबर: पहले चरण का मतदान

- 11 सितंबर: दूसरे चरण का मतदान

- 14 सितंबर: मतगणना

- 21 सितंबर: महापौर, सभापति और अध्यक्ष का चुनाव

- 22 सितंबर: उपाध्यक्ष, उपसभापति और उपाध्यक्ष का चुनाव

अब निकाय चुनाव में टिकट की जंग खत्म हो चुकी है। अगले तीन दिन बीजेपी और कांग्रेस के लिए डैमेज कंट्रोल के हैं। इसके बाद चुनाव पूरी तरह जनता के बीच पहुंच जाएगा। किस पार्टी का संगठन ज्यादा मजबूत है, कौन बागियों को साध पाता है, युवा और महिला वोटर किसके पक्ष में जाते हैं और निर्दलीय किसका खेल बिगाड़ते हैं—इन सवालों के जवाब 14 सितंबर को मतगणना के साथ सामने आएंगे। फिलहाल राजस्थान की शहरी राजनीति में मुकाबला टिकट से निकलकर सीधे वोट बनाम वोट पर पहुंच गया है।

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