चंद्रशेखर आजाद की पनाहगाह हवेली में लोगों ने याद किए अमर शहीद
जयपुर की पंडित मुक्ति नारायण शुक्ल की हवेली में चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश हुकूमत से बचने के लिए पनाह ली थी. आजाद ने शादी की रस्सी बनाकर हवेली के पिछले दरवाजे से नीचे उतरकर साइकिल पर बैठकर पहले कानोता स्टेशन गए और वहां से ट्रेन से इलाहाबाद चले गए थे. इस हवेली को पूरे राजस्थान के क्रांतिकारियों के लिए एक गुप्त ठिकाना माना जाता था.

सौजन्य से:- ETV Bharat
जयपुर की जिस हवेली में चंद्रशेखर आजाद ने ली थी पनाह, वहां जयंती पर 'अमर शहीद' को लोगों ने किया याद
जयपुर की पंडित मुक्ति नारायण शुक्ल की हवेली में ब्रिटिश हुकूमत से बचने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने कई दिनों तक पनाह ली थी.
Published : July 23, 2026 at 8:28 PM IST
जयपुर: अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद की जयंती के मौके पर गुरुवार देशभर में उन्हें याद किया जा रहा है. लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करके उन्हें याद कर रहे हैं और देश की आजादी में उनके योगदान और बलिदान को याद करते हुए लोगों से उनके जीवन से प्रेरणा लेने की अपील कर रहे हैं. वहीं राजधानी की वो हवेली एक बार फिर गुलजार हुई, जहां पर अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश हुकूमत से बचने के लिए कुछ दिनों तक पनाह ली थी.
'पुलिस की दबिश से पहले ही निकल चुके थे आजाद': यह हवेली है राजधानी के बाबा हरिशचंद्र मार्ग स्थित पंडित मुक्तिनारायण शुक्ल की हवेली, जहां पर आज लोगों ने चंद्रशेखर आजाद के चित्र पर पुष्पांजलि देकर याद किया. साथ ही उनके जयपुर से जुड़ाव और इस हवेली में रहने के किस्से को भी याद करते हुए भावुक हुए. वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र सिंह शेखावत ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि हम लोग पिछले कई सालों से चंद्रशेखर आजाद की जयंती मनाते हुए आ रहे हैं, अब लोग भी बढ़ते जा रहे हैं. लोगों को बता रहे हैं कि चंद्रशेखर आजाद इसी हवेली में रुके थे. यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि वह इस अंधेरी गली में इस हवेली में कई दिनों तक रुके थे. जब उनके जयपुर में रुकने की सूचना ब्रिटिश पुलिस को मिली थी, तब आजाद साड़ी की रस्सी बनाकर हवेली के पिछले दरवाजे से नीचे उतरकर साइकिल से पहले कानोता स्टेशन गए और वहां से ट्रेन पड़कर इलाहाबाद चले गए थे.
'साइकिल और लाठी को डिस्प्ले किया जाए': उन्होंने कहा कि पंडित मुक्ति नारायण शुक्ल की हवेली पूरे राजस्थान के क्रांतिकारियों के लिए एक गुप्त ठिकाना थी. उन्होंने कहा कि साल 2022 में शुक्ल परिवार ने आजाद की साइकिल और लाठी को तत्कालीन कांग्रेस सरकार के सुपुर्द कर दी थी जिसे जयपुर के अल्बर्ट हॉल म्यूजियम में रखा गया है. लेकिन दुर्भाग्य है कि इतने साल बीतने के बावजूद भी उसे लोगों के अवलोकन के लिए डिस्प्ले नहीं किया गया है. हम सरकार से मांग करेंगे कि उनकी साइकिल और लाठी को डिस्प्ले किया जाए जिससे कि आज की युवा पीढ़ी को पता चल सके कि चन्द्रशेखर आजाद का जीवन कैसा था. उन्होंने हमारे लिए त्याग और कुर्बानी दी थी. इस वजह से आज खुली सांस लेकर घूम रहे हैं.
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'सरकार से करेंगे डिस्प्ले की मांग': पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल ने कहा कि चंद्रशेखर आजाद का लगाव जयपुर से रहा है. हमें इस बात का भी गर्व है कि वो हमारी ही गली में इस हवेली में रुके थे. जहां तक उनकी साइकिल और लाठी की बात है हम सरकार से मिलकर प्रयास करेंगे कि उन्हें म्यूजियम में डिस्प्ले किया जाए. उन्होंने कहा कि जितने दिन भी चंद्रशेखर आजाद इस हवेली में रहे थे, तब शुक्ला परिवार पूरी-पूरी रात छत पर पहरा देते थे और हाथ में बंदूक और जहर की पुड़िया रखते थे ताकि उनकी वजह से चंद्रशेखर आजाद पर कोई परेशानी नहीं आए. उन्होंने कहा कि यह हवेली हमारे ही पास में होने पर हम सब गौरान्वित महसूस करते हैं.
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'काकोरी कांड के बाद रुके थे आजाद': दरअसल काकोरी कांड के बाद चंद्रशेखर आजाद ब्रिटिश हुकूमत से बचने के लिए लगातार अपने ठिकाने बदल रहे थे. तब जयपुर के राजवैध पंडित मुक्ति नारायण शुक्ल ने महान क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के आग्रह पर चंद्रशेखर आजाद को अपनी हवेली में पनाह दी थी. पंडित नारायण शुक्ला की जौहरी बाजार और बाबा हरिशचंद्र मार्ग स्थित शिव नारायण मिश्र की गली में पुश्तैनी हवेली थी. पंडित मुक्ति नारायण शुक्ल भले ही जयपुर रियासत के राजवैद्य थे, लेकिन वो हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे. बाबा हरिशचंद्र मार्ग की हवेली में चंद्रशेखर आजाद के रहने का पूरा घटनाक्रम मुक्ति नारायण शुक्ल के बेटे अवधेश नारायण शुक्ल ने अपनी किताब 'सत्यमेव जयते' में किया है.
'परिवार रात भर देता था पहरा': पंडित मुक्तिनाथ शुक्ल की पत्नी कल्याणी देवी और उनके परिवार क्रांतिकारियों ही गुप्त मदद भी करते थे. कई बार में मिठाइयों और साड़ियो में हथियार लपेटकर क्रांतिकारियों तक पहुंचाने थे. चंद्रशेखर आजाद जब तक इस हवेली में मेहमान बनकर ठहरे थे, तब तक शुक्ल परिवार इस हवेली में पहरा देता था. रात में भी कल्याणी देवी और उनके बेटे हथियार लेकर हवेली की पहरेदारी करते थे, जरा संदेह होने पर तुरंत चंद्रशेखर आजाद को हवेली के गुप्त दिखने में छुपा दिया जाता था.
'साइकिल को याद के तौर पर रखा': ब्रिटिश पुलिस बाबा हरिशचंद्र मार्ग वाली हवेली पर पहुंचती इससे पहले ही चंद्रशेखर आजाद हवेली की एक खिड़की तोड़कर साड़ियों की रस्सी की मदद से नीचे कूद गए. इसके बाद पंडित मुक्ति नारायण शुक्ल के 14 वर्षीय बेटे अवधेश नारायण शुक्ल के साथ साइकिल से परकोटे की तंग गलियों में से होते हुए पहले घाटगेट पहुंचे. उसके बाद कानोता स्टेशन पहुंचे, जहां पर चंद्रशेखर आजाद ट्रेन पड़कर इलाहाबाद के लिए निकल गए. इसके बाद अवधेश नारायण शुक्ल साइकिल लेकर वापस हवेली पहुंच गए. आजादी के बाद लंबे वक्त तक शुक्ल परिवार ने इस साइकिल को आजाद की निशानी के तौर पर हवेली में रखा था. जब परिवार इस हवेली से गया तो साइकिल भी अपने साथ ले गया था. बाद में साल 2022 में शुक्ल परिवार ने साइकिल और लाठी को सरकार के सुपुर्द कर दिया था. धरोहर बचाओ संघर्ष समिति से जुड़े भारत शर्मा सहित कई अन्य लोगों ने उनके जीवन पर प्रकाश डाला.
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