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राजस्थान: निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण सही, आयोग ने घर-घर किया सर्वे; सरकार ने दी उच्च न्यायालय में दलील

राजस्थान: निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण सही, आयोग ने घर-घर किया सर्वे; सरकार ने दी उच्च न्यायालय में दलील राजस्थान सरकार ने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण को सही ठहराते हुए कहा कि आयोग की रिपोर्ट और जन…

Amar Ujala के अनुसार16 सितंबर 2026 को 03:04 pm बजे
राजस्थान: निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण सही, आयोग ने घर-घर किया सर्वे; सरकार ने दी उच्च न्यायालय में दलील

सौजन्य से:- Amar Ujala

राजस्थान: निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण सही, आयोग ने घर-घर किया सर्वे; सरकार ने दी उच्च न्यायालय में दलील

राजस्थान सरकार ने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण को सही ठहराते हुए कहा कि आयोग की रिपोर्ट और जनाधार डेटा के आधार पर आरक्षण दिया गया है। सरकार ने 50% सीमा का हवाला दिया, जबकि याचिकाकर्ता ने अनुपात बढ़ाने की मांग की।

विस्तार

राजस्थान सरकार ने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए तय आरक्षण को उच्च न्यायालय में सही ठहराया है। सरकार ने न्यायालय में पेश अपने जवाब में स्पष्ट किया कि उसने अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर लॉटरी प्रक्रिया के जरिये चुनावों में आरक्षण दिया है। सरकार का यह पक्ष ऐसे समय सामने आया है जब प्रदेश में प्रधान, पंचायत समिति सदस्य, सरपंच और पंच पदों के लिए लॉटरी निकाली जाना प्रस्तावित है।

इससे पहले, 13 अगस्त को जिला परिषद में 41 जिला प्रमुख पदों के लिए लॉटरी निकाली गई थी, जिसमें से 5 पद अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हुए थे। इसके बाद, आरक्षण कम दिए जाने को लेकर उठे विवाद के कारण आगे की लॉटरी प्रक्रिया स्थगित कर दी गई थी। सरकार ने 17 और 18 सितंबर को लॉटरी की तिथि तय की थी, लेकिन निकाय चुनावों का हवाला देकर इसे मंगलवार को एक बार फिर स्थगित कर दिया गया।

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जनाधार डेटा के विश्लेषण के बाद ही आरक्षण की सिफारिश

सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने घर-घर सर्वेक्षण करवाया और जनाधार डेटा का विश्लेषण करने के बाद ही आरक्षण की सिफारिश की। सरकार के अनुसार उसने सर्वोच्च न्यायालय की पचास प्रतिशत की अधिकतम सीमा के भीतर ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीमा के कारण अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण किसी भी स्थिति में बढ़ाया नहीं जा सकता।

यूं दिया आरक्षण

सरकार ने बताया कि कुल 41 जिला प्रमुख पदों में से अनुसूचित जाति को 18.51 प्रतिशत आरक्षण के साथ 8 पद और अनुसूचित जनजाति को 17.09 प्रतिशत आरक्षण के साथ 7 पद आरक्षित किए गए हैं। वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग को 16 प्रतिशत आरक्षण के तहत 5 पद दिए गए हैं। इस प्रकार कुल 41 में से 20 पद आरक्षित हुए हैं, जो 48.78 प्रतिशत है। यह संख्या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय पचास फीसदी की सीमा में है। इन आरक्षित पदों में जालौर, बूंदी और खैरथल-तिजारा सामान्य अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए तथा ब्यावर और सीकर महिला अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित हुए हैं।

पदों के अनुपात में आरक्षण बढ़ाने की मांग

उच्च न्यायालय में राधेराम गोदारा ने याचिका दायर कर जिला प्रमुख पदों की संख्या के अनुपात में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण बढ़ाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि जिला पुनर्गठन और नए जिलों के गठन के बाद जिला प्रमुख के कुल पद 33 से बढ़कर 41 हो गए हैं। जब पदों की संख्या 33 थी, तब भी अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 5 पद आरक्षित थे। अब पद बढ़कर 41 होने के बावजूद केवल 5 पद ही दिए गए हैं। ऐसे में नियमानुसार समानुपात में पद बढ़ाने की आवश्यकता है।

याचिकाकर्ता का पक्ष और राजनीतिक हलचल

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि सरकार ने अभी तक आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्ष 2020 में 18 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था, तो उस हिसाब से 7 पद मिलने चाहिए थे, लेकिन, इस बार 21 प्रतिशत की जगह मात्र 16 प्रतिशत आरक्षण ही दिया गया है। याचिकाकर्ता पक्ष ने सरकार के जवाब पर अपना प्रत्युत्तर (रिजॉइंडर) अदालत में पेश कर दिया है और इस मामले पर अगले सप्ताह सुनवाई होने की संभावना है।

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