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राजस्थान : डांगावास दलित संहार मामले में ‘न्याय’ की हत्या

सबसे पहले यह जानते हैं कि राजस्थान के नागौर जिले के एक गांव डांगावास में आखिर उस दिन हुआ क्या था? जमीन के विवाद से शुरू हुई वह हिंसा कैसे दलित संहार में बदली और फिर न्याय की तलाश किस तरह एक लंबी लड़ाई बन गई। इसके बाद अंत…

forwardpress.in के अनुसार8 अगस्त 2026 को 04:15 pm बजे
राजस्थान : डांगावास दलित संहार मामले में ‘न्याय’ की हत्या

सौजन्य से:- forwardpress.in

सबसे पहले यह जानते हैं कि राजस्थान के नागौर जिले के एक गांव डांगावास में आखिर उस दिन हुआ क्या था? जमीन के विवाद से शुरू हुई वह हिंसा कैसे दलित संहार में बदली और फिर न्याय की तलाश किस तरह एक लंबी लड़ाई बन गई। इसके बाद अंततः 11 साल बाद आया अदालत का एक फैसला अब नाइंसाफी की नजीर बनता प्रतीत हो रहा है।

डांगावास दलित संहार को केवल दो पक्षों के बीच जमीन का विवाद कह देना उस पूरे घटनाक्रम के साथ अन्याय होगा। अगर हम सभी घटनाक्रमों की कड़ियों को एक साथ जोड़ कर देखें तो सामने एक ऐसी भयावह कहानी आती है जिसमें जमीन पर कब्जे का पुराना विवाद, जातिगत वर्चस्व, प्रशासनिक निष्क्रियता, खुलेआम धमकियां, गांव की अवैध पंचायत की विवादित भूमिका, हथियारबंद भीड़, ट्रैक्टर से कुचलना, गोलीबारी, महिलाओं के साथ कथित यौन एवं शारीरिक हिंसा और उसके बाद अस्पताल में भी पीड़ितों पर हमला, सब एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि 14 मई, 2015 को जो हुआ, वह क्या अचानक हुआ सामुदायिक झगड़ा था या पहले से बनते आ रहे तनाव और धमकियों का गंभीर नतीजा?

डांगावास नागौर जिले के मेड़ता सिटी क्षेत्र का एक गांव है। सन् 2011 की जनगणना के मुताबिक, इस गांव में तब 1,578 परिवार रहते थे और कुल आबादी लगभग 7,470 थी। दलितों की आबादी करीब 16.59 प्रतिशत थी। गांव में दलितों की जमीन पर गैर-दलितों के कब्जे और काश्तकारी अधिकारों को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहे थे। जिस जमीन का विवाद बाद में डांगावास नरसंहार की पृष्ठभूमि बना, वह 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन है। यह जमीन सरकारी रिकार्ड में शुरू से ही दलित मेघवाल परिवार के नाम रही है। बाद में उसके कथित खरीद-बिक्री, हस्तांतरण तथा कब्जे को लेकर विवाद पैदा हुआ। कब्जेधारी जाट परिवार के अनुसार उन्होंने यह जमीन खरीद ली थी, बस कागजों में दलितों के नाम पर थी। वहीं, दलित परिवार के अनुसार वह जमीन गिरवी रखी गई थी, जिसे उचित भुगतान करके वापस ले ली गई थी। लेकिन जाट परिवार ने अवैध कब्जा कर रखा था, जिसके खिलाफ पीड़ित दलित पक्ष ने न्यायालय और प्रशासन के दरवाजे खटखटाए और अंततः उपखंड अधिकारी के समक्ष कार्यवाही में दलित परिवार के पक्ष में निर्णय आया और जमीन का भौतिक कब्जा सौंपने के आदेश दिए गए।

यहीं से यह कहानी और गंभीर हो जाती है। कागज पर जमीन दलितों की थी, लेकिन जमीन पर कब्जा दूसरे पक्ष का था। कानून एक बात कह रहा था और जमीन पर सत्ता दूसरी बात कह रही थी। इसे एक दिन की घटना से नहीं समझा जा सकता है। यह घटनाओं की पूरी शृंखला है। मसलन, 20 अप्रैल, 2015 को विवादित जमीन पर पेड़ काटने और तालाब बनाने की कोशिश का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 21 अप्रैल को एक दलित विधवा के साथ बलात्कार के प्रयास और मारपीट की घटना दर्ज हुई। पुलिस द्वारा मामला दर्ज नहीं किए जाने पर पीड़िता को अदालत जाना पड़ा था। इसके बाद दलितों को दी जा रहीं धमकियां बढ़ती गईं।

11 मई को दलितों ने स्थानीय प्रशासन से सुरक्षा की मांग की। विवादित जमीन पर रह रहे दलित परिवारों को हटाने की धमकियां मिल रही थीं और स्थानीय प्रशासन के अनेक अधिकारी विवाद से परिचित थे। उसी दिन जाट समुदाय के लोगों द्वारा एक ज्ञापन स्थानीय प्रशासन को दिया गया, जिसमें दलित परिवारों को जमीन से हटाने की मांग और कार्रवाई नहीं होने पर स्वयं उन्हें हटाने की चेतावनी दी गई थी। दलित परिवारों ने फिर स्थानीय प्रशासन से सुरक्षा मांगी, लेकिन स्थानीय प्रशासन मौन रहा।

यानी 14 मई की हिंसा से पहले खतरे के संकेत मौजूद थे। 14 मई, 2015 की सुबह विवादित जमीन को लेकर गांव में जाट समुदाय के लोगों के द्वारा अवैध पंचायत बुलाई गई थी, जिसमें बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे हुए। वहां से दलितों को सबक सिखाने के लिए यह उन्मादी भीड़ हरवे-हथियारों से लैस होकर ट्रैक्टर, मोटरसाइकिलों और अन्य वाहनों से विवादित जमीन पर पहुंचे, जहां दलित परिवार अपने रिश्तेदारों के साथ मौजूद थे।

सैंकड़ों लोगों की भीड़ ने वहां मौजूद दलित स्त्री-पुरुषों को निशाना बनाया और उनको मारना शुरू कर दिया। हिंसक भीड़ ने न केवल दलितों को घेरा और जातिसूचक गालियां दीं, बल्कि लाठियों, सरियों, कुल्हाड़ियों और अन्य हथियारों से उनके ऊपर हमला किया। उनकी झोपड़ियों और मकानों में आग लगा दी गई। उनके वाहन जलाए गए। लेकिन हिंसा का सबसे भयावह हिस्सा था– ट्रैक्टर न्याय। दलितों की देह पर ट्रैक्टर चढ़ा दिए गए। कई लोग ट्रैक्टर की चपेट में आए। दो दलितों रतनाराम और पोखरराम की मौत घटनास्थल पर ही हो गई और लगभग एक दर्जन लोग गंभीर रूप से घायल हुए। बाद में पंचाराम ने भी दम तोड़ दिया। गणेशराम और गणपतराम की मृत्यु अस्पताल में इलाज के दौरान हुई। इस तरह 14 मई, 2015 की मॉब लिंचिंग में एक साथ पांच दलितों की हत्या कर दी गई।

डांगावास की घटना को केवल ‘हत्या’ कहना भी उसके पूरे स्वरूप को छोटा कर देना होगा। जो घायल थे, उनमें कइयों के हाथ-पैर तोड़ दिए गए थे, उनके सिर पर चोटें थी। शरीर के कई हिस्सों में गंभीर घाव और अन्य चोटें भी थीं। जब मैं घटना के बाद डांगावास के पीड़ितों से मिलने गया तो उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जातिसूचक गालियों के अलावा महिलाओं के साथ मारपीट की गई, उनके कपड़े फाड़े गए और यौन हिंसा की कोशिश की गई थी। यानी हमला सिर्फ शरीरों पर नहीं था। उनकी गरिमा और स्वाभिमान पर भी गहरी चोट थी।

डांगावास दलित संहार का एक और भयावह अध्याय मेड़ता सिटी और अजमेर के अस्पतालों से जुड़ा है। घटना के बाद घायलों को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन पुलिस के घटनास्थल पर देर से पहुंचने और अस्पताल में भी तनावपूर्ण स्थिति के चलते मेड़ता अस्पताल में भीड़ ने घायलों को निशाना बनाया। सबसे अहम बात यह थी कि जिन लोगों को अस्पताल में सुरक्षा मिलनी चाहिए थी, उन्हें वहां भी भय से गुजरना पड़ा।

14 मई की हिंसा के बीच रामपाल गोस्वामी की गोली लगने से मौत का मामला भी सामने आया। रामपाल के परिजनों ने आरोप लगाया कि उसे जबरन भीड़ के साथ ले जाया गया था। बाद में उसकी गोली लगने से मृत्यु हो गई। इस हत्या का आरोप दलित पक्ष पर लगाया गया। मृतक गोस्वामी के मामले की रिपोर्ट के अनुसार वह डांगावास के ग्रामीणों की अवैध पंचायत का दूत बन कर दलितों को बुलाने गया था, जिसे दलितों द्वारा गोली मार दी गई। हालांकि, सीबीआई जांच में यह आरोप प्रमाणित नहीं हो पाया। लेकिन सवाल शेष बना रहा कि आखिर रामपाल गोस्वामी कैसे मारा गया, उसके ऊपर गोली किसने चलाई? जिस बंदूक से उसकी हत्या हुई, वह कहां गई? उसका शव कहां मिला? उसके हत्यारों की आज तक पहचान क्यों नहीं हो पाई? दलित पक्ष का आरोप है कि रामपाल गोस्वामी की हत्या को आधार बनाकर दलित पीड़ितों और उनके परिवारों को भी आरोपी बनाने की कोशिश हुई। बाद में सीबीआई जांच में रामपाल गोस्वामी की हत्या के आरोप से दलितों को मुक्त कर दिया गया।

डांगावास मामले की प्रारंभिक जांच राजस्थान पुलिस ने शुरू की, लेकिन बाद में जांच सीआईडी को सौंप दी गई। लेकिन मजबूत प्रतिरोध, आंदोलन और जन-दबाव के बाद राज्य सरकार ने डांगावास कांड की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दी। सीबीआई की जांच में घटनास्थल से लाठी, सरिया, धारदार हथियार आदि बरामद होने, एक बंदूक का हैमर और लोड करने वाला हिस्सा मिलने की पुष्टि का उल्लेख है। सीबीआई ने पांच दलितों की हत्या के आरोपियों के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया। कुल 40 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र पेश हुआ। इनमें 13 आरोपी फरार बताए गए और 27 गिरफ्तार किए गए। राजस्थान हाईकोर्ट का डंडा चला तो सब आरोपी गिरफ्तार होकर जेल भी पहुंचे।

यह तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे कम-से-कम यह बात स्पष्ट होती है कि सीबीआई ने घटना को महज दो परिवारों के बीच मामूली झगड़ा मानकर समाप्त नहीं किया था। फिर ‘दो परिवारों का झगड़ा’ कौन कह रहा था? डांगावास के इस जघन्य हत्याकांड के बाद एक कहानी सोशल मीडिया के जरिए तेजी से फैलाने की कोशिश हुई कि यह जातिगत हिंसा नहीं, बल्कि दो पक्षों का जमीन विवाद था, तब भी यह सवाल उठता है कि यदि यह सिर्फ दो परिवारों का झगड़ा था तो सैकड़ों लोग किस पक्ष की ओर से और क्यों पहुंचे? इतने लोग हथियार लेकर क्यों आए? दलितों के घर और झोपड़ियां क्यों जलाई गईं? उनकी देह पर ट्रैक्टर क्यों चलाए गए? किसी जमीन विवाद का अस्तित्व यह सिद्ध नहीं करता कि हिंसा जातिगत नहीं थी, बल्कि यह देखना पड़ता है कि विवाद के दौरान कौन-सी सामाजिक शक्ति किसके खिलाफ इस्तेमाल हुई?

डांगावास दलित संहार प्रकरण में नागौर पुलिस और मेड़ता प्रशासन की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। घटनास्थल, जहां दलितों पर कहर ढाया गया, थाने से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर था। दलित पक्ष का दावा है कि पुलिस को गांव में होने जा रही अवैध पंचायत और संभावित हमले की सूचना पहले ही लिखित में दी गई थी। इसके बावजूद पुलिस का घटनास्थल पर देर से पहुंचने का क्या कारण रहा होगा? इसके पहले 11 मई को दलितों द्वारा सुरक्षा मांगी गई थी और यह इस कारण से कि गांव में लगातार तनाव की स्थिति बन चुकी थी। इसलिए यह महत्वपूर्ण और असहज कर देने वाला प्रश्न उठता है कि क्या डांगावास में दलित संहार अचानक हुआ या प्रशासन ने उस हिंसा को जान-बूझकर नहीं रोका? यदि दलितों को धमकियां पहले से दी जा रही थीं, जमीन को लेकर तनाव व्याप्त था, पंचायत में विवाद था, पुलिस प्रशासन को जानकारी दी गई थी और सुरक्षा की मांग की जा चुकी थी तो 14 मई को राज्य की पुलिस व्यवस्था कहां थी?

घटना के बाद दलित संगठनों, मानवाधिकार समूहों और प्रगतिशील राजनीतिक संगठनों ने व्यापक आंदोलन किया। अजमेर में अस्पताल के बाहर धरना हुआ। राजस्थान सहित देश भर के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन हुए। जयपुर, जोधपुर, नागौर, बाड़मेर और अन्य जगहों पर ज्ञापन और विरोध कार्यक्रम हुए। आंदोलन की मुख्य मांगें थीं– सीबीआई जांच, घायलों का बेहतर इलाज, मृतकों के परिवारों को मुआवजा, आरोपियों की गिरफ्तारी और दलित परिवारों की सुरक्षा। अंततः 29 मई, 2015 को केंद्र सरकार की अधिसूचना के माध्यम से सीबीआई जांच का रास्ता खुला। लेकिन क्या सीबीआई जांच के बाद सब ठीक हो गया?

तत्काल राहत के अलावा राज्य में तब सत्तासीन वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ने पीड़ितों की अनेक मांगों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की। आंदोलनकारियों और राजस्थान सरकार के मध्य 18 सूत्रीय समझौता हुआ। इसमें सीबीआई जांच के अलावा मुआवजा, पुनर्वास, जमीन पर से कब्जा हटाने, सुरक्षा, आरोपियों की गिरफ्तारी, पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही, महिलाओं के साथ हिंसा के अलग मुकदमे आदि की मांगें थीं। इस संघर्ष का सवाल केवल यह नहीं था कि किसने मारा? सवाल यह भी था कि वे कौन थे जो दलितों को बार-बार चेतावनी और धमकियां दे रहे थे? वे कौन थे जिन्होंने दलितों की गुहार के बाद भी उन्हें सुरक्षा नहीं दी? वे कौन थे जिन्होंने दलितों की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की और दलितों के संहार को होने दिया? और वे कौन थे जिन्होंने बाद में पीड़ित दलितों को न्याय दिलाने में देरी की? उनकी जवाबदेही क्या होगी?

डांगावास की असली कहानी क्या है? निस्संदेह इसके मूल में जमीन का विवाद था, लेकिन केवल जमीन का विवाद नहीं था। यह जातिगत शक्ति-संबंधों से प्रभावित विवाद था। दलितों की जमीन पर जबरन कब्जा और सामाजिक वर्चस्व इसके केंद्र में थे। हिंसा अचानक नहीं हुई। यह ऊपरवर्णित घटनाक्रमों से स्पष्ट है। 14 मई को हिंसा ने सामूहिक हिंसा का रूप ले लिया। भीड़, हथियार, ट्रैक्टर, आगजनी, मारपीट और दलित स्त्रियों के साथ यौन हिंसा ने इसे सामान्य विवाद से अलग कर दिया। घटना के बाद न्याय की लड़ाई भी उतनी ही कठिन रही। पुलिस की शुरुआती कार्रवाई, एफआईआर में आरोपों की दिशा, अस्पताल की घटनाएं, प्रशासनिक प्रतिक्रिया और बाद में सीबीआई जांच और अब अनुसूचित जाति, जनजाति विशेष न्यायालय के निर्णय ने इस मामले को और जटिल बना दिया है।

इस दलित संहार के प्रकरण का दूसरा अध्याय इसके साथ शुरू हुआ कि किसे आरोपी बनाया जाए और किसे बचाया जाए? रामपाल गोस्वामी की मौत के मामले में अनेक दलितों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन सीबीआई जांच में उन आरोपों से 19 दलितों को मुक्त किया गया। दूसरी तरफ पांच दलितों की हत्या मामले में बड़ी संख्या में दूसरे आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुआ। करीब 11 वर्षों तक अनुसूचित जाति, जनजाति विशेष न्यायालय में केस चला। अब इस अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। इसलिए डांगावास की सबसे बड़ी त्रासदी केवल यह नहीं थी कि लोग मारे गए। त्रासदी यह भी थी कि जिनके अपने मारे गए, उन्हें न्याय पाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी और अंतत: उनको न्याय नहीं मिला। शायद डांगावास का सबसे बड़ा सबक यही है कि जब जमीन पर कब्जा कानून से नहीं, सामाजिक ताकत से तय होने लगे, जब धमकियों को प्रशासन गंभीरता से न ले, जब पीड़ितों की सुरक्षा समय पर न हो, और जब हिंसा के बाद न्याय की प्रक्रिया भी संदेहों से घिर जाए तब नरसंहार केवल एक दिन की घटना भर नहीं रह जाता। वह व्यवस्था की परीक्षा बन जाता है।

डांगावास दलित संहार को इसलिए याद रखना जरूरी है कि उसे ‘दो परिवारों का झगड़ा’ कहकर इतिहास से मिटाया न जा सके। इसे भूलना केवल पांच मृतकों को भूलना नहीं है। यह उस पूरे सवाल को भूल जाना है कि इस देश में दलित अपनी जमीन, अपनी देह और अपने जीवन पर बराबर का अधिकार कब सुरक्षित महसूस करेंगे।

लेकिन 5 अगस्त, 2026 को मेड़ता की एससी/एसटी विशेष अदालत ने इस मामले के सभी 40 अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। अदालत का निष्कर्ष है कि घटना सिद्ध है और इसके कर्ता असिद्ध हैं। अदालत का यही वह एक वाक्य है, जिसमें डांगावास दलित संहार की पूरी त्रासदी समा गई है। मतलब यह कि हत्याएं हुईं, यह न्यायालय मानता है, लोग मरे, यह सिद्ध है। लोग घायल हुए, सामूहिक हिंसा हुई, यह भी सिद्ध है। लेकिन मारने वाला कोई नहीं मिला! तो फिर सवाल है कि उस दिन मारे गए वे पांच दलित और एक पिछड़े वर्ग के व्यक्ति समेत कुल छह लोगों को किन लोगों ने मारा?

क्या रतनाराम, पोखरराम, पंचाराम, गणपतराम और गणेशराम (सभी दलित) और रामपाल गोस्वामी (ओबीसी) की मौत अपने आप हो गई? क्या उनके शरीर पर लगी चोटें किसी अदृश्य हाथ की थीं? क्या खेत में हुई हिंसा का कोई कर्ता नहीं था? और अगर कर्ता थे, तो दस साल से अधिक समय तक चली पुलिस, सीबीआई और न्यायिक प्रक्रिया आखिर उन तक क्यों नहीं पहुंच सकी? यही सवाल आज डांगावास के उन परिवारों की आंखों में है, जिन्होंने अपने लोगों को खोया और यही सवाल भारतीय लोकतंत्र की न्याय-व्यवस्था से भी पूछा जाना चाहिए।

यहां कानून की तकनीकी कसौटी अपनी जगह है। किसी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। मैं भी इस सिद्धांत से असहमत नहीं हूं, लेकिन मेरा सवाल इससे आगे का है कि अगर अदालत के सामने पांच मौतें सिद्ध थीं, सामूहिक हिंसा सिद्ध थी और गंभीर चोटें सिद्ध थीं तो फिर जांच एजेंसियों ने ऐसा साक्ष्य क्यों नहीं जुटाया जिससे हिंसा के वास्तविक दोषियों तक पहुंचा जा सके?

यह सवाल अदालत से अधिक जांच और अभियोजन व्यवस्था से है, क्योंकि अदालत ने खुद अपने निर्णय में लिखा है कि अभियोजन की विफलता उसके अपने साक्ष्यों से सामने आई। कई गवाहों ने आरोपित व्यक्तियों की पहचान से इनकार किया। कुछ ने कहा कि वे अभियुक्तों को पहले से नहीं जानते थे। कुछ मामलों में नाम बाद में सामने आए और एक अभियुक्त के संबंध में तो उसके मिथ्या समावेशन को स्वयं अभियोजन पक्ष के साक्षी ने स्वीकार किया। तो फिर सवाल यह है कि इतने बड़े सामूहिक हत्याकांड में गवाहों की सुरक्षा, पहचान और साक्ष्य संग्रह की जिम्मेदारी किसकी थी? यह कोई ऐसा मामला नहीं था जिसमें स्थानीय पुलिस ने केवल खानापूर्ति की और मामला वहीं दब गया। दो एफआईआर दर्ज किए गए। बाद में दोनों मामले सीबीआई को सौंपे गए। सीबीआई ने जांच की और आरोप पत्र प्रस्तुत किए। कुल 40 अभियुक्त इस मुकदमे में विचारण के दायरे में आए, लेकिन ग्यारह वर्ष बाद न्यायालय के सामने जो स्थिति बनी, वह भयावह है।

अदालत ने पाया कि कई बरामदगियां विधिक रूप से प्रमाणित नहीं हो सकीं; सीरोलॉजी निर्णायक नहीं थी; डीएनए परीक्षण नहीं हुआ; कोई डाइंग डिक्लीरिएशन नहीं था और रक्तरंजित हथियारों को मौतों से जोड़ने वाली पर्याप्त वैज्ञानिक कड़ी नहीं बनी। यह केवल अभियोजन की हार नहीं है। यह जांच की पूरी संरचना पर सवाल है। किसी बड़े सामूहिक हिंसा कांड में अगर ग्यारह साल बाद अदालत कहे कि वैज्ञानिक कड़ी ही नहीं बनी, तो यह पूछना लोकतांत्रिक समाज का अधिकार है कि किसने जांच की? कैसे जांच की? क्या जांच पर्याप्त थी? क्या गवाहों को संरक्षण मिला? क्या साक्ष्य को सुरक्षित रखा गया और अगर नहीं रखा गया तो उसकी जवाबदेही किसकी है?

डांगावास दलित संहार का यह फैसला हमें एक और भयावह सच बताता है कि भारत में न्याय पाने में सबसे कमजोर व्यक्ति अक्सर वही होता है जिसके पास सबसे कम संसाधन होते हैं। गरीब दलित परिवार के लिए अदालत तक पहुंचना ही कठिन है। वर्षों तक मुकदमा लड़ना कठिन है। गवाहों को सुरक्षित रखना कठिन है। दस्तावेज जुटाना कठिन है। जांच पर निगरानी रखना कठिन है और जब अंततः फैसला आता है और आरोपी दोषमुक्त हो जाते हैं, तब उस परिवार के पास क्या बचता है? कुछ कागज, कुछ पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कुछ पुराने फोटो, कुछ गवाहियां, कुछ तारीखें और मृतकों की तस्वीरें? क्या यही न्याय है?

(संपादन : नवल/अनिल)

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